छह महीने के बच्चे पर पिटबुल का हमला
सोनीपत। हरियाणा के सोनीपत की सिक्का कॉलोनी में छह महीने के बच्चे पर पालतू पिटबुल के हमले ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि रिहायशी इलाकों में बड़े और शक्तिशाली कुत्तों को रखने की जिम्मेदारी आखिर कितनी गंभीरता से निभाई जा रही है। 14 सितंबर को हुई घटना में बच्चा अपनी बुआ की गोद में था, तभी कुत्ते ने हमला कर दिया। घटना सीसीटीवी में रिकॉर्ड हुई और बच्चे को गंभीर चोटें आने के बाद रोहतक के पीजीआईएमएस में इलाज के लिए ले जाया गया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार परिवार ने अभी पुलिस में लिखित शिकायत नहीं दी है।
यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में कुत्तों के काटने की समस्या का दायरा केवल कुछ चर्चित नस्लों तक सीमित नहीं है। केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक 2024 में देशभर में 37,15,713 डॉग-बाइट मामले IDSP/IHIP में दर्ज हुए थे। जनवरी 2025 में ही 4,29,664 मामले दर्ज किए गए। ये आंकड़े दर्ज मामलों के हैं, इसलिए इन्हें देश में होने वाले हर हमले की पूर्ण संख्या नहीं माना जा सकता।
क्या पिटबुल पर भारत में प्रतिबंध है?
यह सवाल इस घटना के बाद सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है। मार्च 2024 में पशुपालन एवं डेयरी विभाग ने कुछ नस्लों को मानव जीवन के लिए खतरनाक बताते हुए उनके आयात, प्रजनन और पालतू पशु के रूप में बिक्री पर रोक संबंधी निर्देश जारी किए थे। सूची में Pitbull Terrier के अलावा कई अन्य नस्लें और उनके क्रॉस-ब्रीड भी शामिल थे।
लेकिन इस आदेश की कानूनी स्थिति को सरल शब्दों में “पिटबुल पूरी तरह बैन है” कहना ठीक नहीं होगा। आदेश को विभिन्न उच्च न्यायालयों में चुनौती दी गई थी और इसके बाद केंद्र ने संबंधित विषय पर हितधारकों से वैज्ञानिक आधार पर टिप्पणियां और आपत्तियां भी मांगी थीं। इसलिए किसी खास शहर या राज्य में पिटबुल रखने की वर्तमान कानूनी स्थिति स्थानीय निकाय, अदालतों के आदेश और लागू नियमों पर निर्भर कर सकती है।
असली सवाल नस्ल से आगे का है
कुत्ते के हमले के बाद पूरी बहस को केवल किसी एक नस्ल को दोष देने तक सीमित करना समस्या का पूरा समाधान नहीं देता। पालतू कुत्ते का व्यवहार, प्रशिक्षण, समाजीकरण, मालिक का नियंत्रण, सार्वजनिक जगह पर सुरक्षा उपाय और स्थानीय नियमों का पालन भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
केंद्र के मौजूदा पशु कल्याण नियमों में कुत्तों के स्वास्थ्य, टीकाकरण, देखभाल और सुरक्षित वातावरण से संबंधित प्रावधान मौजूद हैं। Dog Breeding and Marketing Rules में पशु की स्वास्थ्य देखभाल और पशु चिकित्सकीय निगरानी से जुड़े दायित्व भी निर्धारित हैं।
इसका अर्थ यह है कि किसी रिहायशी कॉलोनी में ऐसा कुत्ता रखना केवल निजी पसंद का विषय नहीं रह जाता, जब उसकी वजह से आसपास के लोगों की सुरक्षा प्रभावित होने लगे। खासकर छोटे बच्चों, बुजुर्गों और ऐसे लोगों के लिए जोखिम अधिक गंभीर हो सकता है जो अचानक हुए हमले से खुद को बचाने की स्थिति में नहीं होते।
आगे क्या जरूरी है?
सोनीपत जैसी घटनाएं यह सवाल भी उठाती हैं कि पालतू कुत्तों के लिए स्थानीय स्तर पर पंजीकरण, जिम्मेदार स्वामित्व, सुरक्षित हैंडलिंग, शिकायत पर त्वरित कार्रवाई और हमले के बाद स्पष्ट जवाबदेही की व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने हालिया आदेशों में कुत्तों से जुड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा के सवालों को व्यापक नियमन के संदर्भ में देखा है। मई 2026 के फैसले में अदालत ने Animal Birth Control Rules, 2023 को वैज्ञानिक तरीके से कुत्तों की आबादी के नियंत्रण, टीकाकरण और सार्वजनिक सुरक्षा से जोड़कर समझाया।
इसलिए बहस का केंद्र केवल यह नहीं होना चाहिए कि “कौन सी नस्ल खतरनाक है”, बल्कि यह भी होना चाहिए कि जिस व्यक्ति के पास शक्तिशाली कुत्ता है, वह उसे नियंत्रित रखने और दूसरे लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या कर रहा है। सोनीपत का मामला इसी बड़े सवाल को फिर सामने लाता है।



