पशुपालकों के लिए बड़ा बदलाव: सरकार लॉन्च करेगी Livestock Insurance Portal, अब बीमा और क्लेम प्रक्रिया होगी डिजिटल
नई दिल्ली। पशु की मौत या बीमारी से होने वाला आर्थिक नुकसान छोटे पशुपालक के लिए केवल एक पशु का नुकसान नहीं होता, बल्कि कई बार उसकी नियमित आय पर सीधा असर पड़ता है। इसी जोखिम को कम करने के लिए केंद्र सरकार पशुधन बीमा व्यवस्था को डिजिटल रूप देने की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रही है। पशुपालन एवं डेयरी विभाग Livestock Insurance Portal शुरू करेगा, जिसके जरिए पशुधन बीमा से जुड़ी विभिन्न सेवाओं को एक ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाने की योजना है।
यह पहल राष्ट्रीय पशुधन मिशन (NLM) के तहत संचालित पशुधन बीमा गतिविधि से जुड़ी है। विभाग के अनुसार पोर्टल पर पॉलिसी जारी करने, बीमा कवरेज, क्लेम प्रक्रिया, निगरानी और रिपोर्टिंग जैसे कामों को अधिक व्यवस्थित करने में मदद मिलेगी।
पशुपालकों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह पोर्टल?
पशुधन ग्रामीण परिवारों के लिए आय का महत्वपूर्ण साधन है। दूध देने वाला पशु, बकरी, भेड़ या अन्य पशुधन अचानक मर जाए तो परिवार को सीधे आर्थिक झटका लग सकता है। ऐसे जोखिम के लिए बीमा सुरक्षा उपलब्ध है, लेकिन किसी योजना का वास्तविक लाभ तभी व्यापक स्तर पर पहुंचता है जब उसके बारे में जानकारी, पंजीकरण और क्लेम की प्रक्रिया किसानों के लिए आसान हो।
नए पोर्टल का उद्देश्य इसी प्रक्रिया को अधिक डिजिटल और पारदर्शी बनाना है। एकीकृत व्यवस्था होने से बीमा से जुड़े रिकॉर्ड, पॉलिसी और क्लेम की निगरानी में भी सुधार की उम्मीद है।
सरकार पहले ही पशुधन बीमा को बढ़ावा देने के लिए लाभार्थी के प्रीमियम हिस्से को घटाकर 15 प्रतिशत किया है। शेष प्रीमियम केंद्र और राज्य सरकारें निर्धारित हिस्सेदारी के अनुसार वहन करती हैं।
11 क्षेत्रीय भाषाओं में भी उपलब्ध होगी सुविधा
पोर्टल की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसका बहुभाषी स्वरूप होगा। हिंदी और अंग्रेजी के अलावा इसे 11 क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध कराने की योजना है। ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल सरकारी सेवाओं की पहुंच के लिहाज से यह अहम कदम है, क्योंकि भाषा की बाधा कई बार योजनाओं की जानकारी और ऑनलाइन प्रक्रियाओं तक पहुंच को सीमित कर देती है।
हालांकि केवल पोर्टल शुरू कर देना पर्याप्त नहीं होगा। गांवों में इंटरनेट कनेक्टिविटी, डिजिटल जानकारी, पशुपालकों की जागरूकता और स्थानीय स्तर पर सहायता व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी।
बीमा का लाभ लेने के लिए पशुपालकों को कितना खर्च करना होगा?
मौजूदा व्यवस्था में पात्र लाभार्थी को बीमा प्रीमियम का 15 प्रतिशत हिस्सा देना होता है। बाकी राशि केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा साझा की जाती है। सामान्य राज्यों में केंद्र और राज्य की हिस्सेदारी 60:40 है, जबकि पहाड़ी और पूर्वोत्तर राज्यों में यह अनुपात 90:10 है। केंद्र शासित प्रदेशों के लिए केंद्र सरकार की ओर से 100 प्रतिशत हिस्सेदारी का प्रावधान है।
इससे छोटे और सीमांत पशुपालकों के लिए पशुधन बीमा की लागत अपेक्षाकृत कम करने का प्रयास किया गया है।
किन पशुओं को मिल सकता है बीमा कवरेज?
राष्ट्रीय पशुधन मिशन के बीमा घटक के तहत विभिन्न प्रकार के पशुधन को कवरेज देने का प्रावधान है। इसमें दुधारू पशुओं के साथ घोड़े, गधे, खच्चर, ऊंट, टट्टू और अन्य पात्र पशुओं के अलावा भेड़, बकरी, सूअर और खरगोश जैसे छोटे पशु भी शामिल हैं। योजना के नियमों के अनुसार विभिन्न पशुओं के लिए सब्सिडी की सीमा अलग हो सकती है।
यानी पोर्टल केवल बड़े पशुपालकों के लिए नहीं, बल्कि छोटे पशुधन पर निर्भर परिवारों के लिए भी उपयोगी हो सकता है।
क्लेम सेटलमेंट में तकनीक की भूमिका बढ़ेगी
पशुधन बीमा में सबसे महत्वपूर्ण चरणों में से एक क्लेम का सत्यापन और भुगतान है। पशु की पहचान, बीमा पॉलिसी और नुकसान की पुष्टि जैसी प्रक्रियाओं में देरी होने पर किसान को आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
सरकार पशुओं की पहचान और क्लेम प्रक्रिया को बेहतर बनाने के लिए रेडियो-फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन (RFID) टैगिंग जैसी तकनीक के इस्तेमाल की संभावना पर भी विचार कर रही है। इससे भविष्य में बीमित पशु की पहचान और उसके रिकॉर्ड को डिजिटल रूप से जोड़ने में मदद मिल सकती है।
नई परिचालन व्यवस्था में बीमा कंपनियों के चयन और क्लेम सेटलमेंट के लिए भी निर्धारित प्रक्रियाएं रखी गई हैं।
आंकड़े बताते हैं कि जरूरत बड़ी है
सरकार के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक राष्ट्रीय पशुधन मिशन के तहत मौजूदा वित्तीय वर्ष में 21.01 लाख पशुओं का बीमा किया जा चुका था। विभाग ने पशुधन बीमा के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए राज्यों के साथ सेमिनार, शिविर और प्रचार गतिविधियां चलाने का भी उल्लेख किया है।
यह आंकड़ा यह भी दिखाता है कि पशुधन बीमा की पहुंच बढ़ाने की अभी पर्याप्त गुंजाइश है। खासकर उन ग्रामीण परिवारों तक योजना पहुंचाना चुनौती होगी, जो पशुपालन तो करते हैं लेकिन बीमा की प्रक्रिया या उपलब्ध सरकारी सहायता से पूरी तरह परिचित नहीं हैं।
पोर्टल से आगे क्या बदलेगा?
डिजिटल पोर्टल की सबसे बड़ी उपयोगिता तभी सामने आएगी जब इसका इस्तेमाल केवल रिकॉर्ड रखने तक सीमित न रहे। यदि पॉलिसी, पशु की पहचान, प्रीमियम, क्लेम और भुगतान की जानकारी एक ही सिस्टम में जुड़ती है, तो विभागों और बीमा कंपनियों के बीच समन्वय बेहतर हो सकता है।
इसके साथ ही वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्लेम कितनी जल्दी निपटते हैं, गलत या अपूर्ण जानकारी की समस्या कितनी कम होती है और ग्रामीण पशुपालकों को डिजिटल प्रक्रिया में कितनी सहायता मिलती है।



