चुनाव आयोग पर घमासान के बीच सीएम साय का राहुल गांधी पर हमला, बोले- संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाना गलत
रायपुर। चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच चल रहा राजनीतिक विवाद अब छत्तीसगढ़ तक पहुंच गया है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने रविवार को राहुल गांधी और कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि चुनावी मुद्दों पर राजनीतिक असहमति जताने के बजाय संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
भाजपा प्रदेश कार्यालय में आयोजित पत्रकार वार्ता में साय ने कहा कि चुनाव आयोग और न्यायपालिका जैसी संस्थाओं की साख पर सवाल उठाने से लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति जनता का भरोसा प्रभावित हो सकता है। उन्होंने राहुल गांधी से अपने आरोपों को लेकर देश और चुनाव आयोग से माफी मांगने की मांग भी की। ये मुख्यमंत्री साय के राजनीतिक आरोप और उनका पक्ष हैं; कांग्रेस की ओर से इन आरोपों पर अलग प्रतिक्रिया आना इस विवाद का दूसरा पक्ष होगा।
विवाद की असली वजह क्या है?
मौजूदा राजनीतिक टकराव की पृष्ठभूमि में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े राहुल गांधी के सवाल हैं। राहुल गांधी ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली तथा मतदाता सूची को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। भाजपा और चुनाव आयोग इन आरोपों को स्वीकार नहीं करते और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता का बचाव कर रहे हैं।
चुनाव आयोग की आधिकारिक व्यवस्था के अनुसार SIR-2026 के तहत मतदाता अपनी जानकारी से संबंधित सेवाओं का इस्तेमाल कर सकते हैं और आयोग ने मतदाता सूची में नाम खोजने तथा आवश्यक दस्तावेज जमा करने की सुविधाएं भी उपलब्ध कराई हैं।
यानी विवाद केवल नेताओं के आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में यह सवाल है कि मतदाता सूची को अपडेट करने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है, उसमें किसी पात्र मतदाता का नाम प्रभावित न हो और गलत या अपात्र प्रविष्टियों को हटाने की प्रक्रिया किस तरह की जाए।
साय ने चुनाव आयोग की भूमिका पर क्या कहा?
मुख्यमंत्री साय ने चुनाव आयोग की संस्थागत भूमिका का बचाव करते हुए कहा कि आयोग की विश्वसनीयता पर लगातार सवाल उठाना उचित नहीं है। उन्होंने आयोग की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस और उसके स्पष्टीकरण का उल्लेख करते हुए दावा किया कि इससे कांग्रेस के कई आरोपों पर स्थिति स्पष्ट हुई है।
उन्होंने EVM से जुड़े राहुल गांधी के पुराने सवालों का भी जिक्र किया। साय का तर्क था कि कांग्रेस के कई निर्वाचित सांसद और विधायक उसी चुनावी व्यवस्था के माध्यम से सदनों तक पहुंचे हैं, जिस पर पार्टी के नेता सवाल उठाते रहे हैं। उनके अनुसार चुनावी प्रक्रिया पर अविश्वास जताने के साथ उसी प्रक्रिया से मिले जनादेश को स्वीकार करने को लेकर कांग्रेस को अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए।
संवैधानिक संस्था पर सवाल और लोकतांत्रिक बहस की सीमा
भारत में चुनाव आयोग चुनाव प्रक्रिया के संचालन के लिए जिम्मेदार संवैधानिक प्राधिकरण है। आयोग लोकसभा, राज्य विधानसभाओं तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों का संचालन करता है। मतदाता पंजीकरण, मतदाता सूची में संशोधन और चुनाव संबंधी शिकायतों के लिए भी आयोग की आधिकारिक व्यवस्थाएं मौजूद हैं।
यही वजह है कि चुनाव आयोग पर लगाए गए किसी भी आरोप का महत्व सामान्य राजनीतिक बयान से अधिक होता है। दूसरी तरफ लोकतंत्र में चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवाल उठाना भी राजनीतिक दलों और नागरिकों के अधिकारों का हिस्सा है। वास्तविक कसौटी यह है कि ऐसे आरोप दस्तावेज, आंकड़ों और सत्यापन योग्य तथ्यों के साथ कितने स्पष्ट रूप से सामने रखे जाते हैं और संबंधित संस्थाएं उनका जवाब किस तरह देती हैं।
आगे बढ़ सकता है राजनीतिक टकराव
SIR और चुनावी प्रक्रिया को लेकर कांग्रेस तथा भाजपा के बीच बयानबाजी आने वाले समय में और तेज हो सकती है। मतदाता सूची जैसे मुद्दे सीधे मतदाताओं से जुड़े होने के कारण राजनीतिक बहस का प्रभाव व्यापक होता है।
ऐसे में आने वाले दिनों में तीन चीजें महत्वपूर्ण रहेंगी—मतदाता सूची में बदलाव से जुड़े वास्तविक आंकड़े, चुनाव आयोग की ओर से जारी आधिकारिक स्पष्टीकरण और राजनीतिक दलों द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले दस्तावेजी प्रमाण। इन तीनों के आधार पर ही यह स्पष्ट होगा कि विवाद केवल राजनीतिक आरोपों तक सीमित रहता है या चुनावी प्रक्रिया में किसी ठोस सुधार की मांग तक पहुंचता है।



