झोलाछाप डॉक्टर का खतरनाक इलाज: मामूली चोट से मौत तक पहुंचा मामला, सिस्टम पर भी उठे गंभीर सवाल
छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में 28 साल के हर प्रसाद सोनवानी की मौत ने ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य व्यवस्था की एक गंभीर तस्वीर सामने रख दी है। शुरुआत एक मामूली सड़क हादसे से हुई थी। बाइक से गिरने के बाद घुटने में चोट लगी, लेकिन इलाज के बाद मामला इतना बिगड़ा कि युवक की जान चली गई।
परिजनों का आरोप है कि तरदा गांव में इलाज करने वाले मुरली मनोहर उर्फ महाराज ने उसे इंजेक्शन लगाया था। इसके दो दिन बाद इंजेक्शन वाली जगह पर तेज दर्द, सूजन और नीला निशान दिखाई देने लगा। हालत बिगड़ने पर उसे अस्पताल ले जाया गया। बाद में परिवार ने रायपुर के एम्स और मेकाहारा तक पहुंचने की कोशिश की, लेकिन बेड नहीं मिलने की बात सामने आने का दावा किया गया।
अब पुलिस ने पोस्टमॉर्टम के बाद जांच शुरू कर दी है और जिस व्यक्ति पर इलाज में लापरवाही का आरोप है, वह फरार बताया जा रहा है।
मामूली चोट के इलाज ने कैसे लिया गंभीर मोड़?
हर प्रसाद के परिवार के मुताबिक, अगस्त के अंत में बाइक चलाते समय सड़क पर अचानक कुत्ता आ जाने के कारण हादसा हुआ। वह गिरा और उसके घुटने में चोट लगी। चोट गंभीर नहीं बताई गई थी।
यहीं से इस पूरे मामले का पहला बड़ा सवाल सामने आता है—क्या मामूली चोट के लिए किसी प्रशिक्षित चिकित्सक के बजाय ऐसे व्यक्ति से इलाज कराया गया, जिसकी चिकित्सकीय योग्यता संदिग्ध थी?
परिजनों के अनुसार, हर प्रसाद तरदा में मुरली मनोहर के पास गया। वहां उसकी कमर में इंजेक्शन लगाया गया। इसके करीब दो दिन बाद दर्द और सूजन शुरू हुई तथा इंजेक्शन वाली जगह पर नीला निशान पड़ गया।
ऐसे लक्षणों को सामान्य मानकर नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है। इंजेक्शन के बाद होने वाला संक्रमण, गलत तरीके से इंजेक्शन लगना या किसी अन्य चिकित्सकीय जटिलता की स्थिति में समय पर विशेषज्ञ उपचार बेहद जरूरी होता है।
हालांकि हर प्रसाद की मौत वास्तव में किस चिकित्सकीय कारण से हुई, इसका अंतिम निष्कर्ष जांच और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के आधार पर ही निकलेगा।
इलाज के लिए अस्पताल-दर-अस्पताल भटकता रहा परिवार
हर प्रसाद की स्थिति बिगड़ने के बाद परिवार उसे कोरबा मेडिकल कॉलेज अस्पताल लेकर पहुंचा। इसके बाद उसे निजी अस्पताल में भी भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने स्थिति गंभीर होने पर रायपुर ले जाने की सलाह दी थी।
परिवार का दावा है कि मरीज को रायपुर एम्स और बाद में मेकाहारा ले जाया गया, लेकिन वहां बेड उपलब्ध नहीं होने की बात कहकर इलाज नहीं मिल सका।
यही इस मामले को सिर्फ एक कथित गलत इलाज की घटना से आगे ले जाता है।
अगर किसी मरीज की हालत गंभीर है और उसे उच्च स्तरीय चिकित्सा की जरूरत है, तो उसके लिए रेफरल व्यवस्था कितनी प्रभावी है? क्या अस्पतालों के बीच बेड की वास्तविक समय पर उपलब्धता की जानकारी रहती है? और यदि बेड उपलब्ध नहीं है, तो गंभीर मरीज के लिए वैकल्पिक व्यवस्था कौन सुनिश्चित करता है?
इन सवालों के जवाब स्वास्थ्य व्यवस्था की जवाबदेही तय करने के लिए महत्वपूर्ण होंगे।
ग्रामीण इलाकों में क्यों बढ़ता है ऐसे इलाज का खतरा?
ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की दूरी अक्सर मरीजों को स्थानीय स्तर पर तुरंत इलाज लेने के लिए मजबूर करती है। कई जगह लोग वर्षों से किसी स्थानीय व्यक्ति को ही डॉक्टर मानकर उसके पास इलाज कराने पहुंचते हैं।
समस्या तब गंभीर हो जाती है जब सामान्य बीमारी या चोट का इलाज करने वाला व्यक्ति बिना पर्याप्त चिकित्सकीय प्रशिक्षण के इंजेक्शन, दवा या अन्य उपचार करने लगे।
इंजेक्शन को ग्रामीण इलाकों में अक्सर ‘तुरंत असर करने वाला इलाज’ माना जाता है। लेकिन हर दर्द या चोट में इंजेक्शन जरूरी नहीं होता। गलत दवा, गलत मात्रा, गलत जगह इंजेक्शन लगना या संक्रमण—इनमें से कोई भी स्थिति मरीज के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती है।
इसलिए सिर्फ कथित झोलाछाप डॉक्टर पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत करना और लोगों को यह बताना भी जरूरी है कि किन परिस्थितियों में तुरंत योग्य डॉक्टर या अस्पताल की जरूरत होती है।
सबसे बड़ा सवाल: जिम्मेदारी किसकी?
हर प्रसाद की मौत की जांच में सबसे पहले यह स्पष्ट होना जरूरी है कि उसकी तबीयत बिगड़ने की वास्तविक वजह क्या थी। क्या इंजेक्शन से संक्रमण हुआ? संक्रमण कितना गंभीर था? इलाज में कितनी देरी हुई? और अस्पताल पहुंचने के बाद उपचार में क्या-क्या किया गया?
इन सभी सवालों का जवाब मेडिकल रिकॉर्ड, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और विशेषज्ञ चिकित्सकीय जांच से सामने आना चाहिए।
पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है। आरोपी व्यक्ति के फरार होने की बात भी सामने आई है। ऐसे में जांच एजेंसियों के सामने यह सुनिश्चित करने की चुनौती होगी कि इलाज से जुड़े सभी दस्तावेज, दवाइयां, इंजेक्शन और अन्य संभावित साक्ष्य सुरक्षित किए जाएं।
यह सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं
हर प्रसाद अपने परिवार में कमाने वाला सदस्य था। पीछे पत्नी और दो बच्चे हैं। एक मामूली दुर्घटना के बाद परिवार ने शायद यह सोचा भी नहीं होगा कि चोट का इलाज करवाने के बाद स्थिति इतनी गंभीर हो जाएगी।
यही इस घटना का सबसे चिंताजनक पहलू है।
किसी ग्रामीण परिवार के लिए स्वास्थ्य व्यवस्था की पहली सीढ़ी भरोसा होती है। जब आसपास कोई योग्य डॉक्टर आसानी से उपलब्ध नहीं होता, तो लोग स्थानीय उपचारकर्ताओं पर निर्भर हो जाते हैं। लेकिन अगर वही उपचार गलत साबित हो जाए और बाद में बड़े अस्पताल तक पहुंचने में भी बाधाएं सामने आएं, तो मरीज के पास विकल्प बहुत कम बचते हैं।
इस घटना की निष्पक्ष जांच केवल दोषी व्यक्ति तक पहुंचने के लिए नहीं, बल्कि यह पता लगाने के लिए भी जरूरी है कि हर प्रसाद को समय पर उचित उपचार क्यों नहीं मिल सका।
आगे क्या होना चाहिए?
इस मामले में तीन स्तरों पर कार्रवाई जरूरी दिखाई देती है।
पहला, कथित अवैध चिकित्सा प्रैक्टिस की जांच और दोष साबित होने पर कड़ी कानूनी कार्रवाई।
दूसरा, ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे क्लिनिकों और बिना मान्यता चिकित्सा करने वालों की नियमित जांच।
तीसरा, गंभीर मरीजों के रेफरल और बेड उपलब्धता की ऐसी व्यवस्था, जिसमें परिवार को अस्पताल-दर-अस्पताल भटकना न पड़े।
हर प्रसाद की मौत का अंतिम कारण जांच से स्पष्ट होगा, लेकिन इस घटना ने एक बड़ा सवाल जरूर छोड़ दिया है—अगर एक मामूली चोट के बाद मरीज को इलाज के कई स्तरों से गुजरना पड़े और अंत में उसकी जान चली जाए, तो स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे कमजोर कड़ी आखिर कहां है?
इस सवाल का जवाब केवल एक व्यक्ति की जिम्मेदारी तय करके नहीं मिलेगा। इसके लिए ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था, निजी चिकित्सा प्रैक्टिस और सरकारी अस्पतालों की रेफरल प्रणाली—तीनों की गंभीर समीक्षा जरूरी है।



