Bastar Dussehra 2026: बस्तर के लिए बड़ी उम्मीद, राष्ट्रपति मुर्मु ने सराही जनजातीय संस्कृति; मांझी-चालकी का बढ़ा मानदेय
Bastar Dussehra 2026: छत्तीसगढ़ के बस्तर में दशहरा केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही जनजातीय परंपराओं, सामूहिक निर्णय और सामाजिक एकता की पहचान है। 23 अक्टूबर 2026 को जगदलपुर में आयोजित बस्तर दशहरा उत्सव में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की उपस्थिति ने इसी विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दी। इस अवसर पर उन्होंने बस्तर की सांस्कृतिक परंपराओं, मुरिया दरबार और जनजातीय समाज की प्रकृति के प्रति आस्था की सराहना की।
इस आयोजन का महत्व केवल राष्ट्रपति की मौजूदगी तक सीमित नहीं है। बस्तर में सुरक्षा, विकास, रोजगार और सांस्कृतिक संरक्षण को एक साथ आगे बढ़ाने की चर्चा के बीच यह उत्सव क्षेत्र की उस पहचान को सामने लाता है, जिसे केवल संघर्ष या पिछड़ेपन के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। साथ ही, पारंपरिक मांझियों और चालकी के मानदेय में बढ़ोतरी का फैसला उन लोगों के योगदान को मान्यता देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, जो पीढ़ियों से स्थानीय सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाओं को संभालते आए हैं।
Bastar Dussehra: 75 दिनों का उत्सव, जिसमें पूरा समाज निभाता है भूमिका
बस्तर दशहरा अपनी लंबी अवधि और विशिष्ट परंपराओं के कारण देश के दूसरे दशहरा आयोजनों से अलग पहचान रखता है। लगभग 75 दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में मां दंतेश्वरी के प्रति आस्था के साथ स्थानीय समुदायों की भागीदारी केंद्र में रहती है।
रथ के निर्माण से लेकर उसे खींचने और अलग-अलग धार्मिक अनुष्ठानों को पूरा करने तक अनेक समुदाय अपनी पारंपरिक जिम्मेदारियां निभाते हैं। यहां उत्सव की भव्यता केवल सजावट या भीड़ से नहीं मापी जाती, बल्कि उस सामूहिक श्रम से भी जुड़ी है, जिसके कारण परंपराएं आज तक जीवित हैं।
इस व्यवस्था की खासियत यह है कि संस्कृति किसी एक व्यक्ति या संस्था के भरोसे नहीं चलती। इसमें गांवों, पारंपरिक प्रतिनिधियों, कारीगरों और स्थानीय समुदायों की भूमिका होती है। यही सहभागिता बस्तर की सांस्कृतिक विरासत को सामाजिक जीवन से जोड़े रखती है।
मुरिया दरबार में छिपा है जनसंवाद का महत्वपूर्ण संदेश
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने मुरिया दरबार की परंपरा को जमीनी स्तर पर लोकतांत्रिक मूल्यों की महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति बताया। इस परंपरा में समुदायों के प्रतिनिधि एक साथ बैठकर सामाजिक समस्याओं, आवश्यकताओं और स्थानीय विषयों पर चर्चा करते हैं।
आज जब शासन व्यवस्था में लोगों की भागीदारी, स्थानीय जरूरतों की पहचान और प्रशासन तक आम नागरिक की आवाज पहुंचाने पर जोर दिया जाता है, तब मुरिया दरबार जैसी परंपराएं विशेष महत्व रखती हैं। यह दिखाती हैं कि सामूहिक चर्चा और आपसी सहमति भारतीय समाज की स्थानीय व्यवस्थाओं में लंबे समय से मौजूद रही हैं।
हालांकि, पारंपरिक संवाद और आधुनिक लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिकाएं अलग-अलग हैं। फिर भी स्थानीय अनुभवों और समुदायों की जरूरतों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना किसी भी विकास कार्यक्रम को अधिक प्रभावी बनाने में मदद कर सकता है।
बस्तर के लिए इसका व्यावहारिक अर्थ भी स्पष्ट है। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से जुड़ी योजनाएं तभी बेहतर परिणाम दे सकती हैं, जब स्थानीय समुदायों की जरूरतों और उनके अनुभवों को पर्याप्त महत्व मिले।
मांझी और चालकी का मानदेय बढ़ना क्यों है महत्वपूर्ण?
बस्तर दशहरा के अवसर पर राज्य सरकार की ओर से पारंपरिक प्रतिनिधियों के मानदेय में बढ़ोतरी की जानकारी दी गई। मांझियों का मासिक मानदेय 2,000 रुपये से बढ़ाकर 5,000 रुपये और चालकी का मानदेय 1,500 रुपये से बढ़ाकर 3,500 रुपये किया गया है।
यह फैसला आर्थिक सहायता के साथ सांस्कृतिक जिम्मेदारियों को निभाने वाले लोगों के सम्मान से भी जुड़ा है। पारंपरिक व्यवस्थाओं में मांझी और चालकी जैसे प्रतिनिधि समुदायों के बीच संवाद, सामाजिक समन्वय और परंपराओं के निर्वहन में भूमिका निभाते हैं।
मानदेय में वृद्धि उनके योगदान को औपचारिक मान्यता देने की दिशा में सकारात्मक कदम है। हालांकि, इसका दीर्घकालिक प्रभाव इस बात पर भी निर्भर करेगा कि भुगतान नियमित हो, पात्र लोगों तक समय पर पहुंचे और परंपरागत संस्थाओं की भूमिका को सम्मानपूर्वक बनाए रखा जाए।
जनजातीय संस्कृति के संरक्षण के लिए केवल उत्सव आयोजित करना पर्याप्त नहीं है। उन लोगों की आजीविका और सामाजिक स्थिति पर भी ध्यान देना जरूरी है, जिनके ज्ञान और श्रम से ये परंपराएं पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती हैं।
माओवाद के बाद बस्तर के सामने अब विकास की चुनौती
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि माओवाद से मुक्त बस्तर अब नवनिर्माण और विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है। सुरक्षा की स्थिति में सुधार को लेकर सरकारी प्रयासों के साथ क्षेत्र में सड़क, रेल, स्वास्थ्य, शिक्षा और आजीविका से संबंधित योजनाओं पर भी जोर दिया जा रहा है।
लेकिन किसी क्षेत्र में स्थायी बदलाव का आकलन केवल सुरक्षा संबंधी उपलब्धियों से नहीं किया जा सकता। विकास का वास्तविक असर तब दिखाई देता है, जब दूरस्थ गांवों तक सरकारी सेवाएं पहुंचें, बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले, मरीजों को समय पर इलाज उपलब्ध हो और युवाओं के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार के विकल्प बढ़ें।
बस्तर जैसे भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से विशिष्ट क्षेत्र में विकास की रणनीति बनाते समय स्थानीय समुदायों की जरूरतों और परंपरागत जीवनशैली को समझना भी आवश्यक है। सड़क और परिवहन संपर्क से बाजार तक पहुंच आसान हो सकती है, लेकिन इसका लाभ तभी व्यापक होगा जब स्थानीय उत्पादकों, किसानों, वन उपज संग्राहकों और छोटे उद्यमियों को भी आर्थिक अवसर मिलें।
इसीलिए सुरक्षा के बाद विकास का अगला चरण लोगों के दैनिक जीवन में दिखाई देने वाले बदलावों से तय होगा।
सड़क, रेल, अस्पताल और शिक्षा: विकास का असली पैमाना
मुख्यमंत्री ने बस्तर में बुनियादी सुविधाओं के विस्तार से संबंधित कई पहलों का उल्लेख किया। इनमें दूरस्थ इलाकों तक सरकारी योजनाओं की पहुंच, ग्रामीण सड़कों और परिवहन सुविधाओं का विस्तार, रेल संपर्क पर काम, स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना तथा शिक्षा से जुड़े बुनियादी ढांचे का विकास शामिल है।
जगदलपुर में सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल और गीदम में मेडिकल कॉलेज के संचालन का उल्लेख भी क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के संदर्भ में किया गया। इसके अलावा ओरछा और जगरगुंडा में एजुकेशन सिटी विकसित करने की दिशा में काम का जिक्र हुआ।
इन पहलों का महत्व इसलिए है क्योंकि दुर्गम क्षेत्रों में अस्पताल, कॉलेज और परिवहन की कमी का असर सीधे परिवारों की आय, बच्चों की शिक्षा और इलाज की उपलब्धता पर पड़ता है। बेहतर संपर्क से लोगों का जिला मुख्यालयों और बाजारों तक पहुंचना आसान हो सकता है।
फिर भी योजनाओं की सफलता का मूल्यांकन उनके घोषित होने से आगे बढ़कर करना होगा। कितने गांवों को नियमित परिवहन मिला, स्वास्थ्य संस्थानों में विशेषज्ञ सेवाएं कितनी उपलब्ध हैं, विद्यार्थियों को कितने अवसर मिल रहे हैं और स्थानीय युवाओं को कितनी नौकरियां मिल रही हैं—ऐसे सवाल विकास की वास्तविक तस्वीर सामने लाते हैं।
बस्तर पंडुम और बस्तर ओलंपिक से युवाओं को मिल सकता है नया मंच
राष्ट्रपति ने जनजातीय समाज की प्रतिभाओं को पर्याप्त अवसर देने की आवश्यकता पर जोर दिया। बस्तर पंडुम जैसे सांस्कृतिक आयोजन स्थानीय कला, परंपराओं और लोक अभिव्यक्तियों को सामने लाते हैं, जबकि बस्तर ओलंपिक युवाओं को खेल प्रतिभा दिखाने का मंच प्रदान करता है।
इन आयोजनों की उपयोगिता केवल प्रतियोगिता या उत्सव तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यदि स्थानीय कलाकारों को नियमित मंच, उनके उत्पादों को बाजार और खिलाड़ियों को बेहतर प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाए, तो सांस्कृतिक पहचान के साथ आर्थिक और पेशेवर अवसर भी बढ़ सकते हैं।
जनजातीय युवाओं के लिए शिक्षा, खेल, तकनीक, उद्यमिता और रोजगार के रास्ते खोलना क्षेत्र के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है। प्रतिभा को आगे बढ़ाने के लिए अवसरों के साथ प्रशिक्षण, संसाधन, मार्गदर्शन और निरंतर सहयोग की भी जरूरत होती है।
जंगल और प्रकृति का संरक्षण भी विकास का हिस्सा
राष्ट्रपति ने जनजातीय समाज की प्रकृति के प्रति आस्था और जंगलों के संरक्षण की परंपरा की सराहना की। बस्तर में वन केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं; वे अनेक समुदायों की आजीविका, भोजन, औषधीय ज्ञान और सांस्कृतिक जीवन से जुड़े हैं।
इसलिए विकास और पर्यावरण संरक्षण को एक-दूसरे के विरोध में देखने के बजाय दोनों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। वनों का जिम्मेदारी से उपयोग, स्थानीय समुदायों की भागीदारी, पौधरोपण और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण आने वाली पीढ़ियों के हित में महत्वपूर्ण हैं।
वन उपज का उचित मूल्य मिलने से स्थानीय परिवारों की आय बेहतर हो सकती है। इसके लिए बाजार तक पहुंच, उचित मूल्य निर्धारण और संग्रहण से लेकर बिक्री तक प्रभावी व्यवस्था भी आवश्यक है। सांस्कृतिक संरक्षण और आर्थिक सशक्तिकरण को साथ लेकर चलने से विकास अधिक टिकाऊ बन सकता है।
बस्तर की पहचान अब संस्कृति, अवसर और भागीदारी से भी बने
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की बस्तर दशहरा में उपस्थिति ने जनजातीय संस्कृति, सामुदायिक परंपराओं और स्थानीय प्रतिभाओं को राष्ट्रीय विमर्श में स्थान दिया। वहीं मांझियों और चालकी के मानदेय में वृद्धि ने परंपरागत प्रतिनिधियों के योगदान को आर्थिक मान्यता देने का संदेश दिया।
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि सांस्कृतिक सम्मान और विकास की घोषणाएं आम लोगों के जीवन में कितनी स्थायी राहत और नए अवसर पैदा करती हैं। बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुरक्षित परिवहन, स्थानीय रोजगार और वन उपज का उचित मूल्य बस्तर के भविष्य को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाएंगे।
बस्तर दशहरा की सबसे बड़ी सीख सामूहिकता है। जब गांव, समुदाय, प्रशासन और सरकार साझा जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ते हैं, तब विकास को अधिक व्यापक और टिकाऊ बनाया जा सकता है। बस्तर की समृद्ध विरासत को संरक्षित रखते हुए स्थानीय लोगों को नए अवसर देना ही इस क्षेत्र की प्रगति का सबसे सार्थक रास्ता होगा।
निष्कर्ष: बस्तर दशहरा 2026 ने जनजातीय संस्कृति के सम्मान, पारंपरिक प्रतिनिधियों के मानदेय में वृद्धि और क्षेत्र के विकास की दिशा में जारी प्रयासों को एक साथ सामने रखा। इन पहलों का वास्तविक महत्व आने वाले समय में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और स्थानीय समुदायों की आर्थिक स्थिति में होने वाले सुधार से तय होगा।




