छत्तीसगढ़ के लिए बड़ी खुशखबरी! बस्तर के ढोकरा शिल्पकार बानूराम बैद को मिलेगा शिल्प गुरु अवार्ड 2025
रायपुर, 15 अक्टूबर 2026। बस्तर की मिट्टी में रची-बसी पारंपरिक कला को राष्ट्रीय पहचान दिलाने की दिशा में कोंडागांव के शिल्पकार बानूराम बैद ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। ग्राम बरकई निवासी बैद का चयन वर्ष 2025 के प्रतिष्ठित शिल्प गुरु अवार्ड के लिए किया गया है। देशभर से चुने गए छह शिल्प गुरुओं में उनका नाम शामिल होना छत्तीसगढ़ की पारंपरिक हस्तशिल्प विरासत के लिए गौरवपूर्ण उपलब्धि है।
यह सम्मान केवल एक कलाकार की व्यक्तिगत सफलता नहीं है। इसके पीछे उस सांस्कृतिक परंपरा का योगदान भी है, जिसे पीढ़ियों से कारीगर अपने हुनर, अनुभव और मेहनत के सहारे जीवित रखे हुए हैं। बस्तर की ढोकरा शिल्पकला इसी विरासत का हिस्सा है, जिसमें धातु को आकार देकर स्थानीय जीवन, प्रकृति, लोक आस्था और आदिवासी संस्कृति की कहानियां उकेरी जाती हैं।
पीढ़ियों के हुनर को मिला राष्ट्रीय मंच
भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय के विकास आयुक्त, हस्तशिल्प कार्यालय की अंतिम चयन सूची में बानूराम बैद को शामिल किया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, केंद्रीय स्तर की चयन समिति ने 18 जुलाई 2026 को आयोजित बैठक में उनके चयन को अंतिम रूप दिया।
बैद का योगदान पारंपरिक ढोकरा कला को आगे बढ़ाने, उसकी विशिष्ट तकनीक को संरक्षित रखने और नई पीढ़ी को इसका प्रशिक्षण देने से जुड़ा है। ऐसे कलाकार पारंपरिक शिल्प को केवल अपनी कलाकृतियों के माध्यम से नहीं बचाते, बल्कि उस ज्ञान को भी आगे पहुंचाते हैं जो अक्सर पुस्तकों में दर्ज नहीं होता।
धातु का चुनाव, मोम से आकृति तैयार करना, मिट्टी का आवरण बनाना और ताप के माध्यम से अंतिम कलाकृति को आकार देना—इन प्रक्रियाओं में अनुभव और बारीक समझ की बड़ी भूमिका होती है। यही कारण है कि पारंपरिक शिल्प में दक्षता केवल उपकरणों से नहीं, बल्कि लंबे अभ्यास और पीढ़ियों से संचित ज्ञान से विकसित होती है।
क्या है बस्तर की ढोकरा कला की खासियत?
ढोकरा, जिसे बेल मेटल शिल्प के नाम से भी जाना जाता है, अपनी पारंपरिक लॉस्ट-वैक्स यानी मधुच्छिष्ट तकनीक के लिए प्रसिद्ध है। इस विधि में मोम की सहायता से आकृति तैयार की जाती है। इसके ऊपर मिट्टी की परत चढ़ाई जाती है और फिर विशेष प्रक्रिया के माध्यम से मोम को बाहर निकालकर उसके स्थान पर पिघली हुई धातु भरी जाती है। ठंडा होने और बाहरी आवरण हटाने के बाद कलाकृति का मूल रूप सामने आता है।
इस तकनीक की एक विशेषता यह है कि इसमें तैयार होने वाली आकृतियों में हस्तनिर्माण की पहचान दिखाई देती है। लोकजीवन से जुड़े पात्र, पशु-पक्षी, देवी-देवताओं की आकृतियां और दैनिक जीवन के दृश्य इस शिल्प के सामान्य विषयों में शामिल हैं।
बानूराम बैद की कलाकृतियों में भी बस्तर के आदिवासी जनजीवन, लोक संस्कृति, प्रकृति और धार्मिक आस्थाओं की झलक मिलती है। इन रचनाओं का महत्व केवल सजावटी वस्तुओं तक सीमित नहीं है। वे स्थानीय समुदायों की सांस्कृतिक स्मृतियों और जीवन-दृष्टि को धातु के रूप में संरक्षित करती हैं।
शिल्प गुरु अवार्ड क्यों है महत्वपूर्ण?
पारंपरिक हस्तशिल्प के क्षेत्र में किसी कलाकार को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलना कई मायनों में महत्वपूर्ण होता है। इससे कलाकार की प्रतिष्ठा बढ़ने के साथ उसकी कला को नए दर्शकों, संभावित खरीदारों और शिल्प जगत से जुड़े संस्थानों तक पहुंचने का अवसर मिल सकता है।
शिल्प गुरु अवार्ड जैसे सम्मान पारंपरिक तकनीकों में उत्कृष्ट योगदान और शिल्प ज्ञान को आगे बढ़ाने वाले कारीगरों की भूमिका को सामने लाते हैं। बानूराम बैद का चयन कोंडागांव और बस्तर के उन कलाकारों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है, जो सीमित संसाधनों के बीच अपनी पारंपरिक कला को जीवित रखने में जुटे हैं।
हालांकि, किसी सम्मान का दीर्घकालिक प्रभाव तभी दिखाई देता है, जब उसके बाद कलाकारों को प्रशिक्षण, बाजार तक पहुंच, उचित पारिश्रमिक और अपने उत्पादों की पहचान मजबूत करने के अवसर भी मिलें।
परंपरा बचाने के साथ आजीविका की चुनौती
पारंपरिक हस्तशिल्प के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है कला को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना। शिल्प निर्माण में समय, मेहनत और तकनीकी दक्षता की जरूरत होती है। दूसरी ओर, कारीगरों को अपने उत्पादों की लागत के अनुरूप कीमत मिलना हमेशा आसान नहीं होता।
यदि युवा पीढ़ी को इस काम में स्थिर आजीविका की संभावना नहीं दिखती, तो पारंपरिक हुनर सीखने वालों की संख्या घट सकती है। ऐसे में वरिष्ठ शिल्पकारों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। वे केवल कलाकृतियां नहीं बनाते, बल्कि नई पीढ़ी को वह व्यावहारिक ज्ञान भी देते हैं जिसे सीखने में वर्षों लगते हैं।
बानूराम बैद द्वारा नई पीढ़ी को ढोकरा शिल्प का प्रशिक्षण देना इसी संदर्भ में अहम है। उनके चयन से इस बात पर भी ध्यान जाने की संभावना है कि पारंपरिक शिल्प को संरक्षित करने के लिए प्रशिक्षण और बाजार से जुड़ी सहायता को किस तरह मजबूत किया जा सकता है।
कोंडागांव और बस्तर की पहचान को मिल सकती है नई मजबूती
बस्तर अपनी समृद्ध आदिवासी संस्कृति, लोक परंपराओं और हस्तशिल्प के लिए जाना जाता है। ढोकरा कला इस सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जब इस क्षेत्र का कोई कलाकार राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान के लिए चुना जाता है, तो उसकी उपलब्धि के साथ पूरे क्षेत्र की कला परंपरा को पहचान मिलने का अवसर बनता है।
जिले के प्रभारी मंत्री लखनलाल देवांगन ने बानूराम बैद को इस उपलब्धि पर बधाई और शुभकामनाएं दी हैं।
आगे इस उपलब्धि का लाभ स्थानीय शिल्पकार समुदाय तक पहुंचाने के लिए प्रदर्शनियों, शिल्प प्रशिक्षण, कारीगरों के लिए विपणन सहायता और सीधे ग्राहकों तक पहुंच बनाने जैसी पहल उपयोगी हो सकती हैं। इससे पारंपरिक कलाकृतियों की पहचान बढ़ाने के साथ शिल्पकारों की आय को भी सहारा मिल सकता है।
सम्मान से आगे विरासत को बचाने की जिम्मेदारी
बानूराम बैद का शिल्प गुरु अवार्ड 2025 के लिए चयन छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह उस हुनर की पहचान है, जो आधुनिक समय में भी पारंपरिक तकनीकों और स्थानीय संस्कृति को जीवित रखे हुए है।
लेकिन इस उपलब्धि का वास्तविक महत्व तभी और बढ़ेगा, जब ढोकरा शिल्प को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के प्रयास लगातार जारी रहें। कारीगरों को प्रशिक्षण के साथ उचित बाजार, बेहतर आय और अपनी कला को स्वतंत्र रूप से विकसित करने के अवसर मिलना भी जरूरी है।



