UPI शुल्क पर बड़ा बवाल::
नई दिल्ली। डिजिटल भुगतान को देश की रोजमर्रा की अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनाने में UPI की भूमिका बेहद बड़ी रही है। ऐसे में ₹2,000 से अधिक के UPI लेन-देन पर संभावित शुल्क को लेकर व्यापारिक संगठनों की चिंता सामने आना महत्वपूर्ण है। चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री (CTI) ने इस तरह के शुल्क का विरोध करते हुए चेतावनी दी है कि इसका असर केवल दुकानदारों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अंततः कीमतों और ग्राहकों के भुगतान व्यवहार पर भी पड़ सकता है।
CTI चेयरमैन बृजेश गोयल का तर्क है कि यदि बड़े UPI लेन-देन पर MDR यानी Merchant Discount Rate लागू होता है, तो कम मार्जिन पर कारोबार करने वाले छोटे व्यापारियों के लिए डिजिटल भुगतान की लागत बढ़ सकती है।
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हालांकि, यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि खबर में जिस शुल्क की चर्चा है, उसे अंतिम रूप से लागू सरकारी फैसला नहीं माना जाना चाहिए। फिलहाल व्यापारियों की आपत्ति और संभावित प्रभावों को लेकर बहस सामने आई है।
व्यापारी क्यों जता रहे हैं विरोध?
व्यापारियों की सबसे बड़ी चिंता भुगतान की लागत को लेकर है। CTI का कहना है कि भले ही शुल्क सीधे ग्राहक से लेने की बात न हो, लेकिन व्यापारी के लिए यह अतिरिक्त लागत होगी।
मसलन, यदि किसी ₹2,000 के भुगतान पर 1 प्रतिशत शुल्क लागू हो, तो व्यापारी को ₹20 की अतिरिक्त लागत उठानी पड़ सकती है। बड़े कारोबार के लिए यह राशि मामूली लग सकती है, लेकिन छोटे दुकानदार के लिए, जिसका मुनाफा पहले ही सीमित है, लगातार होने वाले ऐसे खर्च का असर महत्वपूर्ण हो सकता है।
व्यापारी संगठन का कहना है कि ऐसी स्थिति में दुकानदार के पास दो रास्ते हो सकते हैं—या तो डिजिटल भुगतान को सीमित किया जाए या अतिरिक्त लागत को उत्पाद की कीमत में शामिल किया जाए।
यही वजह है कि CTI का कहना है कि शुल्क व्यापारी के नाम पर लगाया गया हो, उसका अप्रत्यक्ष असर ग्राहक तक पहुंच सकता है।
₹2,000 की सीमा पर इतना जोर क्यों?
इस बहस का एक महत्वपूर्ण पहलू लेन-देन की संख्या और उसकी कुल रकम के बीच का अंतर है।
CTI के मुताबिक, ₹2,000 से अधिक के UPI लेन-देन संख्या के लिहाज से सीमित हो सकते हैं, लेकिन इनका कुल भुगतान मूल्य काफी बड़ा है। व्यापारियों का कहना है कि मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक्स, कपड़े, फर्नीचर, ज्वेलरी और थोक कारोबार जैसी खरीदारी में ₹2,000 से ऊपर के भुगतान आम हैं।
इसलिए व्यापारियों की नजर में यह केवल छोटे-मोटे डिजिटल भुगतान का मुद्दा नहीं है। इसका संबंध उस हिस्से से है जहां UPI का इस्तेमाल बड़ी खरीदारी के लिए होता है।
सबसे बड़ा खतरा: नकदी की वापसी?
भारत में UPI की सफलता का एक बड़ा कारण इसकी सरलता रही है। ग्राहक के पास नकदी न हो तो भी वह छोटे दुकानदार से लेकर बड़े स्टोर तक तुरंत भुगतान कर सकता है।
CTI का डर है कि यदि व्यापारियों पर भुगतान शुल्क का दबाव बढ़ता है, तो कुछ दुकानदार बड़े मूल्य के UPI भुगतान को हतोत्साहित कर सकते हैं। इसका एक संभावित रूप यह हो सकता है कि दुकान पर ₹2,000 से अधिक के भुगतान के लिए नकद मांगने जैसी व्यवस्था शुरू हो जाए।
यदि ऐसा व्यापक स्तर पर होता है, तो डिजिटल भुगतान की आदत को नुकसान पहुंच सकता है।
हालांकि, यह भी ध्यान रखना होगा कि ग्राहक और व्यापारी का व्यवहार केवल शुल्क से तय नहीं होता। सुविधा, बैंकिंग पहुंच, नकदी उपलब्धता, सुरक्षा और डिजिटल भुगतान की आदत जैसे कई दूसरे कारक भी भूमिका निभाते हैं। इसलिए नकदी की ओर बड़े पैमाने पर वापसी को अभी संभावित जोखिम के रूप में देखना चाहिए, निश्चित परिणाम के रूप में नहीं।
MSME कारोबार के लिए मामला ज्यादा संवेदनशील
बड़े कॉरपोरेट कारोबार और छोटे व्यापारियों की लागत संरचना एक जैसी नहीं होती। छोटे और मध्यम व्यापारी अक्सर सीमित मार्जिन पर काम करते हैं। ऐसे कारोबार में भुगतान माध्यम से जुड़ी अतिरिक्त लागत सीधे लाभ को प्रभावित कर सकती है।
यही कारण है कि CTI ने खास तौर पर MSME व्यापारियों का मुद्दा उठाया है। उनका तर्क है कि यदि बैंकों और भुगतान व्यवस्था को UPI संचालन की लागत की भरपाई की जरूरत है, तो उसका समाधान व्यापारी से शुल्क लेने के बजाय किसी वैकल्पिक प्रोत्साहन व्यवस्था के जरिए किया जाना चाहिए।
CTI की मांग क्या है?
व्यापारी संगठन की मांग है कि UPI और RuPay डेबिट कार्ड भुगतान को MDR से मुक्त रखा जाए। CTI का कहना है कि यदि बैंकों या भुगतान प्रणाली से जुड़े संस्थानों को संचालन लागत की समस्या है तो सरकार सीधे इंसेंटिव के माध्यम से उसका समाधान करे।
इस मांग के पीछे मूल विचार यह है कि डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने की लागत का भार उस व्यापारी पर नहीं डाला जाना चाहिए, जिसे पहले ही डिजिटल व्यवस्था अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया है।
आगे सरकार के लिए क्या चुनौती होगी?
यदि बड़े UPI लेन-देन पर किसी तरह का शुल्क लगाने का प्रस्ताव आगे बढ़ता है, तो सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती डिजिटल भुगतान की वृद्धि और भुगतान प्रणाली की आर्थिक स्थिरता के बीच संतुलन बनाने की होगी।
एक तरफ बैंकों और भुगतान नेटवर्क की वास्तविक लागत है, तो दूसरी तरफ करोड़ों व्यापारियों और ग्राहकों के लिए मुफ्त डिजिटल भुगतान की सुविधा है। किसी भी नीति का असर तय करते समय केवल प्रति ट्रांजैक्शन लागत देखना पर्याप्त नहीं होगा; यह भी देखना होगा कि शुल्क का असर छोटे कारोबार, कीमतों और डिजिटल भुगतान की स्वीकार्यता पर कितना पड़ता है।
फिलहाल CTI ने साफ संकेत दिया है कि व्यापारी संगठन इस मुद्दे को लेकर पीछे हटने के मूड में नहीं है। आने वाले दिनों में यदि प्रस्ताव को लेकर कोई आधिकारिक निर्णय या विस्तृत व्यवस्था सामने आती है, तो उसके बाद यह बहस और तेज हो सकती है।
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