CGPSC केस में बड़ा खुलासा:
रायपुर। छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग की राज्य सेवा परीक्षा 2020 और 2021 में कथित अनियमितताओं से जुड़ी जांच अब परीक्षा में चयन के आरोपों से आगे बढ़कर पैसे के लेनदेन और उसके संभावित इस्तेमाल तक पहुंच गई है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच में बलरामपुर के तत्कालीन अतिरिक्त कलेक्टर चेतन बोरघरिया से जुड़े बैंक खातों में बड़ी संख्या में नकद जमा और अन्य वित्तीय लेनदेन मिलने की बात सामने आई है।
ED ने 11 सितंबर को बोरघरिया को मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामले में गिरफ्तार किया था। एजेंसी की कार्रवाई का आधार यह जांच है कि कथित परीक्षा घोटाले से हासिल रकम को किस तरह लिया, रखा या दूसरे माध्यमों से आगे बढ़ाया गया।
बैंक रिकॉर्ड ने जांच को क्यों बनाया गंभीर?
ED के अनुसार, जांच के दौरान बोरघरिया के बैंक खातों में 170 अलग-अलग ट्रांजेक्शन के जरिए कुल 66.64 लाख रुपये नकद जमा होने की जानकारी मिली है।
किसी बैंक खाते में बड़ी रकम का आना अपने आप में अपराध साबित नहीं करता। जांच एजेंसी को यह स्थापित करना होता है कि पैसा कहां से आया, उसका वास्तविक स्रोत क्या था और क्या उसका संबंध किसी अपराध से हुई कथित आय से है।
इसी वजह से इस मामले में बैंकिंग रिकॉर्ड अहम हो गए हैं। ED ने बोरघरिया और उत्कर्ष चंद्राकर के बीच वित्तीय लेनदेन मिलने का भी दावा किया है। अब जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा इन पैसों के स्रोत और उनके इस्तेमाल की कड़ी को जोड़ना है।
3 करोड़ रुपये से ज्यादा वसूली का आरोप
ED की जांच के मुताबिक, उत्कर्ष चंद्राकर, अनिल चंद्राकर और डॉ. विकास चंद्राकर ने CGPSC राज्य सेवा परीक्षा 2021 के कुछ उम्मीदवारों से कथित तौर पर 3 करोड़ रुपये से अधिक की रकम वसूली थी।
आरोप है कि उम्मीदवारों को परीक्षा में लाभ दिलाने के लिए प्रभाव और संपर्क का भरोसा दिया गया। जांच एजेंसी के अनुसार, इस कथित नेटवर्क में चेतन बोरघरिया के नाम और उस समय उनके मुख्यमंत्री कार्यालय में OSD पद का भी इस्तेमाल किया गया।
यहीं से मामला सिर्फ परीक्षा में कथित गड़बड़ी का नहीं रहता। अगर जांच में धन और परीक्षा में कथित मदद के बीच सीधा संबंध स्थापित होता है, तो यह वित्तीय अपराध की जांच को और महत्वपूर्ण बना सकता है।
क्या रिसोर्ट में हुई थी मेन्स की तैयारी?
ED ने जांच में एक और गंभीर दावा किया है। एजेंसी के अनुसार, कुछ उम्मीदवारों को परीक्षा से पहले कथित तौर पर लीक प्रश्नपत्र उपलब्ध कराए गए।
जांच एजेंसी के मुताबिक, प्रारंभिक परीक्षा से पहले उम्मीदवारों को रायपुर के सिद्धि विनायक मैरिज पैलेस में इकट्ठा किया गया था। इसके बाद कुछ उम्मीदवारों को बारनवापारा सैंक्चुअरी के एक रिजॉर्ट में ठहराने और मुख्य परीक्षा से जुड़े कथित लीक प्रश्नपत्रों के आधार पर तैयारी कराने की बात सामने आई है।
अगर जांच में इन दावों की पुष्टि होती है, तो यह परीक्षा प्रक्रिया में कथित हस्तक्षेप के तरीके को समझने के लिए महत्वपूर्ण कड़ी होगी। हालांकि, इन दावों की अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही होगी।
डिजिटल डिवाइस से भी जांच को मिली दिशा
ED ने इससे पहले 1 सितंबर 2026 को बोरघरिया से जुड़े परिसरों पर तलाशी अभियान चलाया था। एजेंसी के मुताबिक इस दौरान मोबाइल फोन समेत कई डिजिटल उपकरण जब्त किए गए।
इन उपकरणों की फोरेंसिक जांच में बोरघरिया और उत्कर्ष चंद्राकर के बीच बातचीत मिलने का दावा किया गया है। ED के अनुसार बातचीत में वित्तीय लेनदेन और कथित तौर पर पैसे की वापसी से जुड़े विषय शामिल थे।
जांच में Figurecave E-Com (OPC) Private Limited से जुड़े वित्तीय लेनदेन की भी बात सामने आई है। एजेंसी को संदेह है कि कंपनी का इस्तेमाल कथित तौर पर धन की लेयरिंग के लिए किया गया हो सकता है।
अब जांच का सबसे अहम सवाल क्या है?
पूरे मामले में अब तीन कड़ियां महत्वपूर्ण हो गई हैं—परीक्षा में कथित अनियमितता, उससे जुड़ी रकम और उस रकम का वित्तीय प्रवाह।
ED का काम मनी लॉन्ड्रिंग के पहलू की जांच करना है। वहीं मूल परीक्षा घोटाले से जुड़े आपराधिक मामले की जांच CBI कर रही है। ED के अनुसार उसकी जांच EOW/ACB की FIR के आधार पर शुरू हुई थी और बाद में मुख्य अपराध की जांच CBI ने अपने हाथ में ली।
इस तरह अलग-अलग एजेंसियों की जांच से सामने आने वाले साक्ष्य एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं। बैंक रिकॉर्ड, डिजिटल चैट, बयानों और दूसरे दस्तावेजों की कड़ियां यह निर्धारित करने में महत्वपूर्ण होंगी कि कथित रकम और परीक्षा में कथित लाभ के बीच क्या संबंध था।
उम्मीदवारों और परीक्षा व्यवस्था पर भी पड़ेगा असर
यह मामला केवल कुछ आरोपियों तक सीमित नहीं है। प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता लाखों उम्मीदवारों के भविष्य से जुड़ी होती है। यदि किसी परीक्षा में प्रश्नपत्र या चयन प्रक्रिया के साथ छेड़छाड़ के आरोप प्रमाणित होते हैं, तो सबसे बड़ा नुकसान उन अभ्यर्थियों को होता है जिन्होंने बिना किसी अनुचित साधन के परीक्षा दी।
इसी कारण ऐसी जांच में केवल गिरफ्तारी महत्वपूर्ण नहीं होती। असली चुनौती यह पता लगाना है कि कथित नेटवर्क कितना बड़ा था, किन स्तरों तक उसका संपर्क था और क्या किसी उम्मीदवार को अनुचित लाभ मिला।
फिलहाल चेतन बोरघरिया ED की कार्रवाई के तहत न्यायिक प्रक्रिया का सामना कर रहे हैं और मामले में लगाए गए आरोपों का अंतिम निर्धारण अदालत में साक्ष्यों के आधार पर होगा।



