कामधेनु विश्वविद्यालय भर्ती पर बड़ा ब्रेक, 130 पदों की प्रक्रिया रुकी; जांच के बीच बढ़ी पारदर्शिता की मांग
दुर्ग के अंजोरा स्थित दाऊ श्री वासुदेव चंद्राकर कामधेनु विश्वविद्यालय में प्रस्तावित 130 पदों की भर्ती प्रक्रिया फिलहाल रोक दी गई है। मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सिर्फ शिक्षकों की नियुक्ति का प्रशासनिक विषय नहीं है; भर्ती से जुड़े नियम, आरक्षण रोस्टर, स्वीकृत पदों और विश्वविद्यालय की निर्णय प्रक्रिया को लेकर शिकायतें सामने आने के बाद अब पूरी प्रक्रिया जांच के दायरे में है। उपलब्ध रिपोर्टिंग के अनुसार राजभवन स्तर से शैक्षणिक पदों पर भर्ती, नियुक्ति और साक्षात्कार की प्रक्रिया को आगामी आदेश तक स्थगित किया गया है।
130 पदों पर नियुक्ति से पहले क्यों लग गया ब्रेक?
विश्वविद्यालय में प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर समेत विभिन्न शैक्षणिक पदों पर भर्ती प्रस्तावित थी। लेकिन प्रक्रिया आगे बढ़ने के दौरान विश्वविद्यालय की कार्यकारिणी परिषद के कुछ सदस्यों की ओर से कई बिंदुओं पर आपत्ति दर्ज कराई गई।
इन शिकायतों में बैकलॉग पदों की भर्ती, आरक्षण और रोस्टर निर्धारण, विभागवार पदों की संख्या, पहले से निर्धारित रोस्टर में बदलाव, वेतन संरक्षण, स्थानीय शिक्षकों की पदोन्नति और स्वीकृत सेटअप से अधिक पदों के विज्ञापन जैसे मुद्दे शामिल बताए गए हैं।
इनमें से किसी भी आरोप को जांच पूरी होने से पहले प्रमाणित अनियमितता मानना उचित नहीं होगा। फिलहाल महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इन शिकायतों के कारण भर्ती प्रक्रिया की प्रशासनिक जांच का रास्ता खुला है।
विवाद का असली केंद्र सिर्फ नियुक्तियां नहीं
विश्वविद्यालयों में भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता कई स्तरों पर निर्भर करती है। पद स्वीकृत हैं या नहीं, विभागों में वास्तविक जरूरत कितनी है, आरक्षण रोस्टर सही तरीके से लागू हुआ या नहीं और निर्णय लेने वाली संस्थाओं की निर्धारित प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं—ये सभी पहलू नियुक्ति की वैधता और पारदर्शिता से जुड़े होते हैं।
कामधेनु विश्वविद्यालय के मामले में भी शिकायतें इन्हीं बिंदुओं के आसपास केंद्रित बताई गई हैं। इसलिए जांच का महत्व केवल यह तय करने तक सीमित नहीं रहेगा कि 130 पदों पर भर्ती होनी चाहिए या नहीं। जांच से यह भी स्पष्ट होना महत्वपूर्ण होगा कि भर्ती का प्रस्ताव किस प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत तैयार किया गया था।
पहले भी शासन स्तर पर जांच का मुद्दा उठा
उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार भर्ती से संबंधित शिकायतों को लेकर शासन स्तर पर उच्चस्तरीय जांच के निर्देश दिए गए थे और जांच पूरी होने तक आगामी भर्ती प्रक्रिया स्थगित रखने की बात सामने आई थी।
यही वजह है कि अब राजभवन स्तर से भर्ती प्रक्रिया पर रोक लगना मामले को और महत्वपूर्ण बनाता है। एक ओर शिकायतों की जांच होनी है, दूसरी ओर भर्ती से जुड़े उन अभ्यर्थियों की स्थिति भी स्पष्ट करनी होगी जो प्रक्रिया में शामिल होने की तैयारी कर रहे थे।
विधायकों ने भी उठाया था सवाल
दुर्ग ग्रामीण विधायक ललित चंद्राकर ने 19 अगस्त 2026 को राज्यपाल को पत्र भेजकर विश्वविद्यालय की भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर चिंता जताई थी। उपलब्ध रिपोर्टिंग के अनुसार उन्होंने भर्ती प्रक्रिया को राज्य लोक सेवा आयोग या किसी अन्य प्रदेश स्तरीय एजेंसी के माध्यम से कराने का अनुरोध भी किया था।
यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि जनप्रतिनिधि की ओर से शिकायत या मांग अपने आप में भर्ती में अनियमितता का प्रमाण नहीं होती। अंतिम स्थिति जांच और संबंधित सक्षम प्राधिकारी के निर्णय से ही स्पष्ट होगी।
युवाओं के लिए अब सबसे अहम सवाल
भर्ती प्रक्रिया रुकने का सीधा असर उन अभ्यर्थियों पर पड़ता है जो लंबे समय से शैक्षणिक पदों के लिए तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में जांच जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी उसकी समयबद्धता और स्पष्टता भी है।
यदि जांच में प्रक्रिया नियमों के अनुरूप पाई जाती है, तो भर्ती को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो सकता है। वहीं यदि किसी प्रक्रिया में सुधार की जरूरत सामने आती है, तो संशोधन के बाद नई व्यवस्था के तहत आगे बढ़ना पड़ सकता है।
कामधेनु विश्वविद्यालय के लिए भी यह एक संस्थागत परीक्षा
कामधेनु विश्वविद्यालय पशु चिकित्सा, पशुपालन, डेयरी और संबंधित क्षेत्रों में उच्च शिक्षा तथा शोध से जुड़ा संस्थान है। ऐसे संस्थान में शिक्षकों की नियुक्ति का असर केवल विश्वविद्यालय परिसर तक सीमित नहीं रहता। बेहतर फैकल्टी का सीधा संबंध शिक्षा, अनुसंधान और पशुपालन क्षेत्र के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन तैयार करने से होता है।
इसलिए भर्ती प्रक्रिया का जल्दबाजी में पूरा होना जितना उचित नहीं है, उतना ही लंबे समय तक अनिश्चितता में रहना भी संस्थान और अभ्यर्थियों दोनों के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण कदम शिकायतों और भर्ती प्रक्रिया से जुड़े रिकॉर्ड की जांच है। इसमें स्वीकृत पदों का विवरण, आरक्षण रोस्टर, बैकलॉग की स्थिति, विभागवार आवश्यकता और निर्णय लेने की प्रक्रिया जैसे दस्तावेज महत्वपूर्ण होंगे।
जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि भर्ती किस स्वरूप में आगे बढ़ेगी। फिलहाल 130 पदों की प्रक्रिया पर लगा ब्रेक यह संकेत देता है कि नियुक्तियों से पहले प्रक्रिया की पारदर्शिता और नियमों के अनुपालन को लेकर उठे सवालों का समाधान जरूरी माना गया है।
यह मामला अब केवल 130 नौकरियों का नहीं, बल्कि यह तय करने का भी है कि विश्वविद्यालय स्तर की भर्ती प्रक्रिया कितनी स्पष्ट, नियमबद्ध और भरोसेमंद तरीके से संचालित होती है।



