ज्ञानेश कुमार के खिलाफ देशभर में प्रदर्शन, SIR विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला; चुनाव आयोग ने कहा- फैसले सर्वसम्मति से हुए
नई दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चल रहा राजनीतिक विवाद अब सड़क से अदालत तक पहुंच गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सोमवार को दिल्ली समेत कई शहरों में विपक्षी दलों और विभिन्न संगठनों ने प्रदर्शन किया। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट में एक नई याचिका दाखिल कर आरोप लगाया गया है कि चुनाव आयोग के नाम पर कुछ फैसले सभी चुनाव आयुक्तों की मंजूरी के बिना लिए गए।
मामले ने इसलिए भी गंभीर रूप ले लिया है क्योंकि विवाद केवल मतदाता सूची के पुनरीक्षण तक सीमित नहीं रहा। अब बहस का एक अहम हिस्सा यह है कि तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में निर्णय लेने की संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया व्यवहार में किस तरह काम कर रही है।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
हालिया रिपोर्टों में चुनाव आयोग के भीतर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दो अन्य चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी—के बीच कुछ निर्णयों को लेकर मतभेद होने का दावा किया गया था। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक दोनों चुनाव आयुक्तों ने पिछले करीब दस महीनों में आयोग के कामकाज से जुड़े 14 मौकों पर आपत्तियां दर्ज की थीं।
रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी दलों और कुछ संगठनों ने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग तेज कर दी। हालांकि, चुनाव आयोग ने इसके बाद जारी अपने स्पष्टीकरण में इन दावों से अलग तस्वीर पेश की और कहा कि SIR समेत पिछले एक साल में लिए गए सभी अंतिम फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
यही विरोधाभासी दावे अब विवाद के केंद्र में हैं।
सोमवार को कई शहरों में प्रदर्शन
मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सोमवार को दिल्ली, पटना, जयपुर, हैदराबाद, श्रीनगर, लखनऊ, इलाहाबाद, पुणे, कोलकाता और अन्य शहरों में प्रदर्शन किए गए।
दिल्ली में जंतर-मंतर पर 2 अक्टूबर को प्रस्तावित प्रदर्शन के संबंध में एक प्रतिनिधिमंडल ने पुलिस से संपर्क किया। वहीं, कॉकरोच जनता पार्टी ने 2 अक्टूबर को मुंबई के शिवाजी पार्क में जेल भरो आंदोलन करने की घोषणा की है।
कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने भी अलग-अलग स्थानों पर प्रदर्शन किए। कुछ जगहों पर पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया, जबकि कुछ स्थानों पर प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए पुलिस कार्रवाई की खबरें सामने आईं।
इन प्रदर्शनों में विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और SIR की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। हालांकि, इन नेताओं द्वारा लगाए गए राजनीतिक आरोपों को स्वतंत्र रूप से सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट में क्या कहा गया है?
28 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक याचिका ने विवाद को नया कानूनी आयाम दिया है। बार एंड बेंच के मुताबिक याचिका में आरोप लगाया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अन्य चुनाव आयुक्तों की मंजूरी के बिना चुनाव आयोग के नाम पर निर्णय लिए। याचिका में Quo Warranto की रिट की मांग की गई है और यह सवाल उठाया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त किस अधिकार के तहत आयोग की सामूहिक शक्ति का अकेले इस्तेमाल कर सकते हैं।
एक अलग याचिका में भी SIR से जुड़े फैसलों और कथित एकतरफा निर्णय प्रक्रिया को चुनौती दी गई है। उसमें ऐसे फैसलों को अवैध घोषित करने तथा संबंधित कार्रवाई की जांच की मांग की गई है।
यहां यह समझना जरूरी है कि याचिका में लगाया गया आरोप अदालत द्वारा सिद्ध तथ्य नहीं है। अंतिम स्थिति न्यायिक प्रक्रिया और अदालत के आदेशों से ही स्पष्ट होगी।
Quo Warranto का मतलब क्या है?
इस विवाद में इस्तेमाल हुआ Quo Warranto कानूनी शब्द है। इसका सामान्य अर्थ है—किस अधिकार के तहत कोई व्यक्ति किसी सार्वजनिक पद पर बैठा है।
याचिका में इस संवैधानिक उपाय का सहारा लेते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त के निर्णय लेने के अधिकार और प्रक्रिया पर सवाल उठाया गया है। यानी अदालत के सामने मूल प्रश्न यह हो सकता है कि जिस तरीके से कथित रूप से निर्णय लिए गए, क्या वह संविधान और लागू कानून में निर्धारित आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया के अनुरूप था।
SIR पर सुप्रीम कोर्ट का पिछला फैसला भी महत्वपूर्ण
SIR को लेकर यह याद रखना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही बिहार में SIR की वैधता पर महत्वपूर्ण फैसला दे चुका है। 27 मई 2026 के फैसले में अदालत ने बिहार में चुनावी सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को वैध माना था। अदालत ने कहा था कि चुनाव आयोग के पास संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 21(3) के तहत विशेष पुनरीक्षण करने की शक्ति है, बशर्ते प्रक्रिया कानून और निर्धारित सुरक्षा उपायों के अनुरूप हो।
इसका अर्थ यह नहीं है कि SIR से जुड़े हर बाद के प्रशासनिक निर्णय पर स्वतः न्यायिक मुहर लग गई है। मौजूदा विवाद में निर्णय लेने की प्रक्रिया और उसके क्रियान्वयन से जुड़े अलग-अलग सवाल उठाए जा रहे हैं।
चुनाव आयोग का पक्ष क्या है?
चुनाव आयोग ने हालिया विवाद के जवाब में कहा है कि SIR से संबंधित फैसले सभी तीन चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए। आयोग ने इसके साथ ही प्रक्रिया में कुछ बदलाव भी किए हैं। रिपोर्टों के अनुसार, जिन मतदाताओं को unmapped records या logical discrepancies के आधार पर नोटिस दिए गए हैं, उनके दस्तावेज लेने के लिए Booth Level Officers को घर भेजने की व्यवस्था की गई है और व्यक्तिगत सुनवाई को अपवादात्मक मामलों तक सीमित किया गया है।
आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर SIR-2026 के तहत मतदाता सूची डाउनलोड करने और अपना नाम खोजने की सुविधा भी उपलब्ध है।
विपक्ष के आरोप और सरकार/एनडीए का जवाब
विपक्षी दलों ने SIR और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। कांग्रेस नेताओं ने मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं।
दूसरी ओर, NDA से जुड़े नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त का बचाव किया है और कहा है कि चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है। उनका तर्क है कि आयोग स्वयं स्पष्ट कर चुका है कि SIR सहित प्रमुख फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। यह पक्ष भी राजनीतिक दलों के बयानों पर आधारित है और मौजूदा विवाद का अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं है।
अब असली परीक्षा दस्तावेज और न्यायिक प्रक्रिया की
इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू राजनीतिक बयानबाजी से अलग दस्तावेजी और कानूनी जांच है। यदि आयोग के भीतर वास्तव में अलग-अलग निर्णयों पर आपत्तियां दर्ज हुई थीं, तो उनका रिकॉर्ड, निर्णय प्रक्रिया और अंतिम आदेश महत्वपूर्ण होंगे। इसी तरह SIR में किसी मतदाता का नाम हटाने या रोकने की स्थिति में नोटिस, आपत्ति, सुनवाई और अपील की प्रक्रिया यह तय करेगी कि मतदाता के अधिकारों की पर्याप्त सुरक्षा हुई या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट के मई 2026 के फैसले में भी यह स्पष्ट किया गया था कि SIR में नोटिस, जांच और सुनवाई जैसी प्रक्रियात्मक सुरक्षा महत्वपूर्ण हैं और ड्राफ्ट सूची से किसी नाम का बाहर होना अंतिम निर्णय नहीं माना जाता।
आगे क्या होगा?
अब इस पूरे मामले की दिशा मुख्य रूप से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिकाओं, चुनाव आयोग के रिकॉर्ड और SIR के दौरान अपनाई जा रही प्रक्रियाओं से तय होगी।
एक तरफ विपक्ष और प्रदर्शनकारी संगठन मुख्य चुनाव आयुक्त की जवाबदेही की मांग कर रहे हैं, वहीं चुनाव आयोग सामूहिक और सर्वसम्मत निर्णय लेने की बात कह रहा है। ऐसे में आने वाले दिनों में अदालत के सामने यह स्पष्ट करना महत्वपूर्ण होगा कि विवादित निर्णय किस प्रक्रिया से लिए गए और क्या वह प्रक्रिया संवैधानिक तथा वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप थी।
मतदाता के लिए इस पूरे विवाद का सबसे व्यावहारिक पहलू यही है कि अपना नाम मतदाता सूची में जांचना, किसी त्रुटि की स्थिति में समय पर दावा या आपत्ति दर्ज करना और आधिकारिक चुनावी प्रक्रिया का इस्तेमाल करना सबसे महत्वपूर्ण कदम है। चुनाव आयोग के Voter Services Portal पर मतदाता पंजीकरण और रिकॉर्ड से जुड़ी सेवाएं उपलब्ध हैं।



