भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक राहत! मिस्र ने मक्का पैक्ट से बनाई दूरी, तुर्की-पाकिस्तान की रणनीति को लगा झटका
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया की राजनीति में इस समय सिर्फ सैन्य गठजोड़ ही नहीं, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण हो गया है कि कौन-सा देश किस खेमे से दूरी बनाए रखता है। सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हुए मक्का समझौते को लेकर मिस्र की दूरी इसी बदलते समीकरण का संकेत मानी जा रही है।
मिस्र का फैसला भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि काहिरा अरब दुनिया की एक प्रभावशाली शक्ति है और उसके साथ नई दिल्ली के रणनीतिक संबंध पिछले कुछ वर्षों में लगातार मजबूत हुए हैं। ऐसे समय में जब तुर्की पाकिस्तान के साथ अपनी रणनीतिक नजदीकी बढ़ा रहा है, मिस्र का किसी ऐसे सैन्य ढांचे में शामिल न होना भारत के लिए राहत देने वाला घटनाक्रम माना जा सकता है।
मिस्र ने क्यों नहीं बढ़ाया कदम?
मिस्र की विदेश नीति को समझे बिना इस फैसले का पूरा अर्थ निकालना मुश्किल होगा।
काहिरा लंबे समय से पश्चिम एशिया और अरब दुनिया के भीतर किसी एक गुट के साथ पूरी तरह खड़े होने से बचता रहा है। मिस्र के लिए क्षेत्रीय स्थिरता, अपनी सुरक्षा और अलग-अलग शक्तिशाली देशों के साथ संबंध बनाए रखना ज्यादा महत्वपूर्ण रहा है।
यही वजह है कि सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के साथ प्रस्तावित रक्षा सहयोग में शामिल होना उसके लिए सिर्फ एक सैन्य फैसला नहीं होता। इससे क्षेत्रीय राजनीति में उसकी स्वतंत्र भूमिका प्रभावित हो सकती थी।
भारत के साथ बढ़ती रणनीतिक साझेदारी भी इस समीकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
ब्रिक्स मंच पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सिसी के बीच हुई बातचीत में द्विपक्षीय सहयोग और व्यापक क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा का महत्व इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।
भारत के लिए इसका असली फायदा क्या है?
भारत के नजरिए से सबसे महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि मिस्र किसी समझौते में शामिल नहीं हुआ। असली फायदा यह है कि काहिरा ने अपनी विदेश नीति में नई दिल्ली के रणनीतिक हितों को नजरअंदाज नहीं किया।
भारत और मिस्र के रिश्ते रक्षा, व्यापार, ऊर्जा, समुद्री सुरक्षा और कूटनीति जैसे कई क्षेत्रों तक फैल चुके हैं। मिस्र की भौगोलिक स्थिति भी उसे भारत के लिए महत्वपूर्ण बनाती है।
स्वेज नहर वैश्विक व्यापार का एक प्रमुख समुद्री मार्ग है। भारत के यूरोप और भूमध्यसागर से व्यापारिक संपर्कों के लिए मिस्र का महत्व इसलिए सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक भी है।
इसलिए काहिरा के साथ मजबूत संबंध भारत की पश्चिम एशिया नीति को अतिरिक्त मजबूती देते हैं।
तुर्की के लिए संदेश कितना बड़ा?
तुर्की पिछले कुछ समय से पाकिस्तान के साथ अपने रक्षा और रणनीतिक संबंधों को मजबूत करता रहा है। ऐसे में यदि वह अरब दुनिया की एक बड़ी सैन्य शक्ति मिस्र को भी किसी समान सुरक्षा ढांचे में जोड़ने में सफल होता, तो इस गठजोड़ का राजनीतिक वजन बढ़ सकता था।
लेकिन मिस्र की दूरी ने इस संभावना को सीमित कर दिया है।
हालांकि इसे तुर्की की पूरी तरह कूटनीतिक हार कहना जल्दबाजी होगी। अंकारा के पास पश्चिम एशिया और मुस्लिम देशों के साथ अपने अलग रणनीतिक संबंध हैं। मगर मिस्र का स्वतंत्र रहना यह जरूर दिखाता है कि अरब दुनिया को एक ही सुरक्षा खेमे में बांधना आसान नहीं है।
क्या मक्का पैक्ट वास्तव में NATO जैसा गठजोड़ है?
यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक सवाल है।
किसी सैन्य समझौते का प्रभाव उसके सदस्यों की संख्या से नहीं, बल्कि उनकी साझा रणनीतिक प्राथमिकताओं और किसी संभावित संकट में एक-दूसरे के लिए वास्तविक प्रतिबद्धता से तय होता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक मक्का समझौते की तुलना NATO जैसे संगठनों से करना फिलहाल उचित नहीं होगा। NATO की संरचना स्पष्ट सामूहिक सुरक्षा प्रतिबद्धताओं, संस्थागत व्यवस्था और लंबे समय से विकसित सैन्य सहयोग पर आधारित है।
इसके विपरीत मक्का समझौते से जुड़े देशों के अपने-अपने क्षेत्रीय हित और प्राथमिकताएं हैं। इसलिए किसी संभावित भारत-पाकिस्तान संकट में सभी सदस्य किस स्तर तक सैन्य भूमिका निभाएंगे, यह अपने आप स्पष्ट नहीं माना जा सकता।
यही कारण है कि मिस्र का इससे बाहर रहना अपने आप में एक बड़ा रणनीतिक संकेत जरूर है, लेकिन इसे किसी व्यापक सैन्य धुरी के निर्णायक टूटने के रूप में देखना सही नहीं होगा।
मिस्र की मजबूरी नहीं, रणनीतिक स्वायत्तता
काहिरा का रुख उसकी विदेश नीति की पुरानी शैली से भी मेल खाता है।
मिस्र एक तरफ इजरायल के साथ जटिल लेकिन महत्वपूर्ण राजनयिक संबंध बनाए रखता है, वहीं सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य अरब शक्तियों के साथ भी उसके हित जुड़े हुए हैं।
ऐसे माहौल में किसी एक धड़े के साथ खुलकर जुड़ना मिस्र की कूटनीतिक गुंजाइश कम कर सकता है।
भारत के लिए यह स्थिति इसलिए अनुकूल है क्योंकि नई दिल्ली भी पश्चिम एशिया में किसी एक खेमे की राजनीति के बजाय अलग-अलग शक्तियों के साथ स्वतंत्र रणनीतिक संबंध बनाने की नीति पर आगे बढ़ती है।
आगे भारत-मिस्र रिश्ते कहां पहुंच सकते हैं?
इस घटनाक्रम के बाद भारत और मिस्र के बीच सहयोग का अगला चरण केवल राजनीतिक समर्थन तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
रक्षा उत्पादन, समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और स्वेज नहर से जुड़े लॉजिस्टिक्स में दोनों देशों के पास सहयोग बढ़ाने की पर्याप्त गुंजाइश है।
विशेष रूप से लाल सागर और हिंद महासागर के बीच समुद्री सुरक्षा का महत्व बढ़ने के साथ मिस्र भारत के लिए एक उपयोगी रणनीतिक साझेदार बना रह सकता है।
भारत की चुनौती यह होगी कि वह मिस्र के साथ संबंधों को किसी तीसरे देश के खिलाफ गठजोड़ के रूप में पेश करने से बचे। काहिरा की स्वतंत्र विदेश नीति का सम्मान करते हुए साझेदारी बढ़ाना नई दिल्ली के लिए ज्यादा प्रभावी रणनीति होगी।
बड़ा संदेश: पश्चिम एशिया में भारत की स्वीकार्यता
मिस्र का मक्का समझौते से दूर रहना भारत के लिए एक सकारात्मक कूटनीतिक संकेत जरूर है, लेकिन इसकी असली अहमियत इससे आगे है।
यह दिखाता है कि अरब दुनिया की प्रमुख शक्तियां अपनी विदेश नीति को केवल क्षेत्रीय गुटबंदी के आधार पर तय नहीं कर रही हैं। आर्थिक हित, राष्ट्रीय सुरक्षा, रणनीतिक स्वायत्तता और अलग-अलग देशों के साथ रिश्ते—सभी कारक एक साथ काम कर रहे हैं।
भारत के लिए यही सबसे बड़ी उपलब्धि हो सकती है।
नई दिल्ली को इस अवसर का इस्तेमाल किसी खेमे की राजनीति को बढ़ाने के बजाय मिस्र के साथ दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी को और गहरा करने में करना होगा। अगर ऐसा हुआ तो काहिरा आने वाले वर्षों में भारत की पश्चिम एशिया नीति का और भी महत्वपूर्ण स्तंभ बन सकता है।



