अमेरिका का भारतीय फार्मा को बड़ा तोहफा, खास दवाओं पर 100% टैरिफ से राहत; 29 सितंबर से लागू होगा नया नियम
नई दिल्ली: अमेरिका में पेटेंट वाली दवाओं पर प्रस्तावित भारी टैरिफ व्यवस्था के बीच भारत के फार्मास्युटिकल सेक्टर के लिए राहत की खबर सामने आई है। अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने भारत समेत 20 देशों और क्षेत्रों से आने वाली कुछ विशेष श्रेणी की दवाओं और उनसे जुड़े फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स के लिए शून्य प्रतिशत एड वैलोरम टैरिफ की व्यवस्था की है। यह प्रावधान 29 सितंबर से लागू होने वाली नई फार्मा टैरिफ व्यवस्था के बीच आया है।
इस फैसले का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि अमेरिका ने पेटेंट वाली कुछ फार्मास्युटिकल दवाओं और उनके संबंधित ingredients पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की व्यवस्था की है। इस नीति का घोषित उद्देश्य अमेरिकी दवा उत्पादन और घरेलू सप्लाई क्षमता को बढ़ावा देना है। ऐसे में भारत जैसे बड़े दवा निर्यातक देश के लिए विशेष दवाओं पर टैरिफ राहत अमेरिकी बाजार तक पहुंच बनाए रखने के लिहाज से अहम है।
किन दवाओं को मिलेगी जीरो टैरिफ की सुविधा?
अमेरिकी वाणिज्य विभाग के ताजा नोटिस के अनुसार शून्य टैरिफ वाली श्रेणी में कई हाई-वैल्यू और विशेष चिकित्सा जरूरतों से जुड़ी दवाएं शामिल हैं। इनमें रेयर डिजीज यानी दुर्लभ बीमारियों की दवाएं, न्यूक्लियर मेडिसिन, प्लाज्मा-डिराइव्ड थेरेपी, फर्टिलिटी ड्रग्स, सेल थेरेपी, जीन थेरेपी और एंटीबॉडी-ड्रग कॉन्जुगेट्स (ADCs) जैसी श्रेणियां शामिल हैं। पशु चिकित्सा से जुड़ी कुछ दवाएं भी इस व्यवस्था में आती हैं। संबंधित फार्मास्युटिकल ingredients को भी निर्धारित परिस्थितियों में शून्य टैरिफ का लाभ मिल सकता है।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि भारत से अमेरिका जाने वाली हर दवा पर टैरिफ खत्म कर दिया गया है। जीरो टैरिफ केवल नोटिस में निर्धारित पात्र उत्पादों और निर्धारित परिस्थितियों पर लागू होगा। सामान्य भारतीय फार्मा निर्यात के लिए अलग-अलग टैरिफ नियम लागू हो सकते हैं।
भारत के लिए क्यों अहम है यह फैसला?
अमेरिका भारतीय फार्मा कंपनियों के लिए प्रमुख निर्यात बाजारों में शामिल है। ऐसे में विशेष और जटिल उपचारों से जुड़ी दवाओं के लिए अमेरिकी बाजार में लागत संबंधी अनिश्चितता कम होना कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण है।
खासकर सेल और जीन थेरेपी, दुर्लभ बीमारियों की दवाओं तथा अन्य स्पेशियलिटी फार्मास्यूटिकल्स में उत्पादन और अनुसंधान की लागत सामान्य दवाओं की तुलना में काफी अलग होती है। ऐसे उत्पादों पर ऊंचा आयात शुल्क लगने से कंपनियों की कीमत, मार्जिन और अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा पर सीधा असर पड़ सकता है। जीरो टैरिफ व्यवस्था इस दबाव को कम कर सकती है।
अमेरिका की बड़ी रणनीति भी समझिए
इस फैसले को सिर्फ भारत के लिए व्यापारिक राहत के तौर पर देखना पूरी तस्वीर नहीं होगी। अमेरिका की मौजूदा फार्मा नीति का बड़ा लक्ष्य घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना और विदेशों पर निर्भरता कम करना है।
अप्रैल 2026 की Presidential Proclamation 11020 के तहत Section 232 का इस्तेमाल करते हुए पेटेंट वाली फार्मास्युटिकल्स और संबंधित ingredients पर नई टैरिफ व्यवस्था बनाई गई। इसमें कुछ कंपनियों के लिए अमेरिका में उत्पादन बढ़ाने की योजनाओं के आधार पर अलग टैरिफ व्यवस्था का प्रावधान भी रखा गया है।
यानी वॉशिंगटन का संदेश दो स्तरों पर है—एक तरफ घरेलू उत्पादन बढ़ाने का दबाव और दूसरी तरफ ऐसी दवाओं की सप्लाई को अचानक महंगा न करना जिनकी अमेरिकी स्वास्थ्य व्यवस्था को विशेष जरूरत है।
20 देशों की सूची में भारत भी शामिल
जीरो टैरिफ के लिए पात्र देशों और क्षेत्रों की सूची में भारत के साथ अर्जेंटीना, बांग्लादेश, कंबोडिया, इक्वाडोर, जापान, इंडोनेशिया, दक्षिण कोरिया, स्विट्जरलैंड, ब्रिटेन, वियतनाम और यूरोपीय संघ समेत अन्य देश शामिल हैं। अमेरिकी विभाग के अनुसार पात्रता का संबंध मौजूदा या संभावित व्यापार एवं सुरक्षा ढांचे तथा संबंधित उत्पादों की श्रेणी से है।
भारतीय कंपनियों के लिए आगे की चुनौती क्या?
ताजा फैसला तत्काल राहत जरूर देता है, लेकिन भारतीय फार्मा उद्योग के लिए अमेरिकी नीति में बदलाव का मुद्दा खत्म नहीं हुआ है। कंपनियों को अब अपने उत्पादों की श्रेणी, ingredients के स्रोत, अमेरिकी नियमों और भविष्य की टैरिफ व्यवस्था पर लगातार नजर रखनी होगी।
खास तौर पर यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आगे अमेरिका पेटेंटेड दवाओं के साथ-साथ अन्य फार्मास्युटिकल उत्पादों को लेकर अपनी नीति में क्या बदलाव करता है। मौजूदा घोषणा में जेनेरिक दवाओं और उनके संबंधित ingredients पर Section 232 के तहत फिलहाल टैरिफ नहीं लगाया गया है, लेकिन अमेरिकी प्रशासन ने भविष्य में इसकी समीक्षा का रास्ता खुला रखा है।
इसलिए भारत के लिए मौजूदा राहत महत्वपूर्ण है, लेकिन दीर्घकाल में अमेरिकी बाजार में मजबूत स्थिति बनाए रखने के लिए सिर्फ कम टैरिफ पर्याप्त नहीं होंगे। दवा निर्माण, उच्च-मूल्य वाली स्पेशियलिटी मेडिसिन, रिसर्च और सप्लाई चेन में निवेश भी उतना ही अहम रहेगा।



