Dhamtari Flood Update: धमतरी में 4000 हेक्टेयर धान डूबा, बीमा को लेकर फंसा पेंच; किसानों की नजर अब सरकार के फैसले पर
धमतरी: छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में लगातार बारिश और गंगरेल बांध से पानी छोड़े जाने के बाद आई बाढ़ ने किसानों की मेहनत पर बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। कृषि विभाग के प्रारंभिक सर्वे के अनुसार करीब 4,000 हेक्टेयर यानी लगभग 10 हजार एकड़ धान की फसल प्रभावित हुई है। नदी किनारे के कई खेतों में पकने की ओर बढ़ रही फसल पानी में डूब गई है, जबकि कुछ जगह तेज बहाव के साथ फसल बहने और खेतों में रेत-मिट्टी जमा होने की स्थिति भी सामने आई है।
सबसे बड़ी चिंता सिर्फ फसल के डूबने की नहीं है। जिन किसानों ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत अपनी फसल का बीमा कराया है, वे अब यह जानना चाहते हैं कि इस नुकसान की भरपाई उन्हें किस सीमा तक मिल पाएगी। यही सवाल इस पूरे घटनाक्रम को सामान्य बाढ़ नुकसान से आगे ले जाता है।
दो दिन की बारिश और बांध से छोड़े पानी ने बिगाड़े हालात
धमतरी में लगातार हुई बारिश के बाद गंगरेल बांध से करीब ढाई लाख क्यूसेक पानी रुद्री और महानदी की ओर छोड़े जाने से नदी का जलस्तर बढ़ा और तटीय इलाकों के खेतों में पानी पहुंच गया। मुजगहन, रत्नाबांधा, पोटियाडीह, परसतराई, खरतुली, कोलियारी, अछोटा, तेलीनसत्ती, रुद्री, खरेंगा, देवपुर, मुड़पार, बरारी और कोटाभर्री सहित कई इलाकों में खेत प्रभावित बताए गए हैं।
कृषि विभाग के मुताबिक शुरुआती आकलन में करीब 4,000 हेक्टेयर फसल प्रभावित है। हालांकि पानी पूरी तरह निकलने और विस्तृत सर्वे के बाद नुकसान का वास्तविक आंकड़ा बदल सकता है।
यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि खेत में पानी भरना और फसल का पूरी तरह नष्ट हो जाना एक ही बात नहीं है। अगर जलभराव जल्दी खत्म हो जाता है तो कुछ फसल बच सकती है, जबकि लंबे समय तक पानी में डूबी रहने पर पौधों के सड़ने, दाने की गुणवत्ता खराब होने और उत्पादन में भारी गिरावट का खतरा बढ़ जाता है।
तैयार धान पर सबसे ज्यादा खतरा
इस समय नुकसान का असर फसल की अवस्था के हिसाब से अलग-अलग हो सकता है। कृषि विभाग ने शुरुआती और तैयार धान की किस्मों के साथ गबोद अवस्था वाली फसल को अधिक जोखिम में बताया है। देर से तैयार होने वाली किस्मों पर अपेक्षाकृत कम असर पड़ने की संभावना है।
किसान के लिए यह सिर्फ खेत में खड़ी फसल का नुकसान नहीं है। कटाई के ठीक पहले नुकसान होने पर बीज, खाद, मजदूरी, सिंचाई और अन्य लागत पहले ही लग चुकी होती है। ऐसे समय फसल खराब होने का मतलब पूरी सीजन की मेहनत और निवेश पर एक साथ दबाव पड़ना है।
इसके अलावा खेत में रेत या गाद की मोटी परत जमा होने पर अगली फसल की तैयारी भी प्रभावित हो सकती है। इसलिए नुकसान का आकलन केवल डूबी हुई फसल के क्षेत्रफल से नहीं, बल्कि खेत की स्थिति और आगे की खेती पर पड़ने वाले प्रभाव को ध्यान में रखकर किया जाना जरूरी है।
PM Fasal Bima Yojana को लेकर क्यों उलझन?
यहां एक जरूरी कानूनी और नीतिगत पहलू समझना होगा। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में बाढ़ और जलप्लावन जैसे प्राकृतिक जोखिमों के लिए प्रावधान मौजूद हैं। केंद्र सरकार के अनुसार PMFBY का उद्देश्य सूखा, बाढ़, चक्रवात, जलभराव सहित विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले फसल नुकसान के खिलाफ सुरक्षा देना है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि बाढ़ से प्रभावित हर खेत को स्वतः पूरी बीमा राशि मिल जाती है। योजना के तहत नुकसान का आकलन, अधिसूचित फसल और क्षेत्र, नुकसान का प्रकार तथा संबंधित परिचालन दिशा-निर्देश महत्वपूर्ण होते हैं। PMFBY मुख्य रूप से क्षेत्रगत दृष्टिकोण पर भी काम करती है और दावों के आकलन में राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत उपज संबंधी आंकड़ों की भूमिका रहती है।
धमतरी में मौजूदा विवाद इसी व्यावहारिक अंतर से जुड़ा दिखाई देता है—किसान को वास्तविक खेत-स्तरीय नुकसान हुआ है, लेकिन क्या मौजूदा बीमा प्रावधान उसी नुकसान को इस परिस्थिति में भुगतान योग्य मानेंगे?
यही वजह है कि स्थानीय स्तर से सरकार के पास अलग व्यवस्था या राहत देने की मांग उठाई गई है।
धान को लेकर भेजा गया प्रस्ताव क्यों अहम है?
स्थानीय कृषि विभाग ने बाढ़ और अत्यधिक बारिश से प्रभावित किसानों को राहत दिलाने के लिए धान को जलीय फसल मानकर इस वर्ष बीमा लाभ देने का प्रस्ताव शासन को भेजे जाने की जानकारी दी है। यदि इस पर निर्णय होता है तो प्रभावित किसानों के लिए राहत का रास्ता खुल सकता है।
यह प्रस्ताव केवल मौजूदा नुकसान के लिए राहत का विषय नहीं है। इससे भविष्य में उन इलाकों के लिए भी नीति तय करने की जरूरत सामने आती है जहां नदी, बांध या अत्यधिक वर्षा के कारण खेतों में अचानक जलभराव हो जाता है।
दरअसल, जलवायु और बारिश के पैटर्न में बदलाव के बीच खेती के जोखिम का स्वरूप भी बदल रहा है। ऐसे में फसल बीमा की शर्तों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप रखना किसानों के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है।
किसानों को अभी क्या करना चाहिए?
ऐसे समय प्रभावित किसानों के लिए सबसे जरूरी है कि नुकसान का रिकॉर्ड सुरक्षित रखें। खेत की तस्वीरें और वीडियो, खसरा/खाता संबंधी दस्तावेज, बीमा पॉलिसी या बीमा पंजीकरण की जानकारी और उपलब्ध अन्य दस्तावेज संभालकर रखना उपयोगी होगा।
PMFBY के आधिकारिक पोर्टल पर फसल नुकसान की सूचना और शिकायत से संबंधित सुविधा उपलब्ध है तथा कृषि रक्षक हेल्पलाइन 14447 भी दी गई है।
किसानों को अपने क्षेत्र में कृषि विभाग, संबंधित बीमा कंपनी और स्थानीय प्रशासन से यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि इस विशेष बाढ़ घटना के लिए नुकसान दर्ज करने की प्रक्रिया क्या है और दावा किस श्रेणी में आएगा।
सिर्फ यह मान लेना कि “बीमा कराया है तो भुगतान निश्चित है” या “बाढ़ है इसलिए बीमा नहीं मिलेगा”—दोनों ही निष्कर्ष बिना आधिकारिक नुकसान आकलन के जल्दबाजी होंगे।
आगे सरकार के फैसले पर टिकी नजर
धमतरी की स्थिति अब केवल तत्काल फसल बचाने तक सीमित नहीं है। अगर जलभराव लंबा चलता है तो खेतों में फसल नुकसान के साथ मिट्टी, अगली बुवाई और किसानों की नकदी स्थिति पर भी असर पड़ सकता है।
जिले में इस वर्ष PMFBY के तहत बड़ी संख्या में किसानों का बीमा होना भी इस मामले को महत्वपूर्ण बनाता है। अगस्त 2026 में उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार धमतरी में करीब 81 हजार किसानों ने 84,277 हेक्टेयर क्षेत्र का फसल बीमा कराया था।
अब वास्तविक चुनौती यह होगी कि बाढ़ से प्रभावित किसानों के नुकसान का वैज्ञानिक और पारदर्शी आकलन हो तथा पात्रता के अनुसार उन्हें बीमा या सरकारी राहत का लाभ मिले।



