वाराणसी में TPC कमांडर बृजेश गंझू की मुठभेड़ में मौत, 30 लाख के इनामी वांटेड का सफर खत्म
वाराणसी/चतरा। झारखंड के प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन तृतीय प्रस्तुति कमेटी (TPC) से जुड़े शीर्ष कमांडर बृजेश गंझू उर्फ गोपाल सिंह भोक्ता की रविवार सुबह वाराणसी में उत्तर प्रदेश एटीएस के साथ हुई मुठभेड़ में मौत हो गई। पुलिस के अनुसार, रामनगर थाना क्षेत्र में हुई कार्रवाई उस समय शुरू हुई जब एटीएस टीम ने सूचना के आधार पर एक संदिग्ध बाइक सवार को रोकने का प्रयास किया। पुलिस का दावा है कि संदिग्ध ने टीम पर गोली चलाई, जिसके बाद जवाबी फायरिंग हुई।
बृजेश गंझू लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर था। NIA के आधिकारिक मोस्ट वांटेड रिकॉर्ड में उसका नाम “गोपाल सिंह भोक्ता” और उपनाम “बृजेश गंझू” के तौर पर दर्ज है। रिकॉर्ड में उसके खिलाफ NIA के दो मामलों—RC-06/2018/NIA/DLI और RC-22/2018/NIA/DLI—का उल्लेख है।
झारखंड से बाहर वाराणसी तक पहुंची तलाश
पुलिस के मुताबिक, बृजेश गंझू अपने एक साथी के साथ मोटरसाइकिल पर टेंगरा मोड़ से मुगलसराय की ओर जा रहा था। सूचना मिलने के बाद एटीएस ने रामनगर क्षेत्र में कार्रवाई की। रोकने की कोशिश के दौरान गोलीबारी होने की बात पुलिस ने कही है। मुठभेड़ में घायल बृजेश को अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
इस कार्रवाई का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि बृजेश के खिलाफ घोषित इनाम केवल स्थानीय स्तर की कार्रवाई तक सीमित नहीं था। उपलब्ध आधिकारिक और पुलिस संबंधी जानकारी के अनुसार, झारखंड सरकार ने उस पर 25 लाख रुपये और NIA ने 5 लाख रुपये का इनाम घोषित किया था, यानी कुल इनाम 30 लाख रुपये था।
त्योहारी सीजन 2026 में 2.5 लाख तक नौकरियों का अनुमान, छोटे शहरों में बढ़ेगा रोजगार का दायरा
मुठभेड़ में दो पुलिसकर्मियों की बुलेटप्रूफ जैकेट पर लगी गोली
मुठभेड़ के दौरान एटीएस के डिप्टी एसपी विपिन राय और हेड कांस्टेबल नितेंद्र कृष्ण की बुलेटप्रूफ जैकेट पर गोली लगने की जानकारी सामने आई है। दोनों पुलिसकर्मी सुरक्षित बताए गए हैं। घटना की गंभीरता इस तथ्य से समझी जा सकती है कि गोली सीधे सुरक्षा उपकरण से टकराई, हालांकि अधिकारियों को गंभीर चोट नहीं आई।
अब कार्रवाई का अगला चरण केवल मुठभेड़ की जांच तक सीमित नहीं रहेगा। सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह पता लगाना भी महत्वपूर्ण होगा कि बृजेश वाराणसी में किस उद्देश्य से मौजूद था, उसके स्थानीय संपर्क कौन थे और उसके साथ कौन-कौन लोग जुड़े हुए थे।
TPC नेटवर्क के लिए क्या मायने रखती है यह कार्रवाई?
बृजेश गंझू को TPC का शीर्ष कमांडर बताया जाता रहा है। ऐसे में उसकी मौत संगठन के नेतृत्व और संचालन क्षमता पर असर डाल सकती है। लेकिन किसी संगठन के एक प्रमुख सदस्य के मारे जाने से पूरा नेटवर्क स्वतः समाप्त हो जाता है, ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा।
डूसू चुनाव में ABVP की जीत पर नितिन नबीन ने दी बधाई, कहा- युवाओं के भरोसे को दर्शाता है परिणाम
उग्रवादी संगठनों में नेतृत्व का ढांचा अक्सर कई स्तरों पर काम करता है। इसलिए सुरक्षा एजेंसियों के सामने अब यह चुनौती होगी कि बृजेश के बाद संगठन में नेतृत्व कौन संभालता है, उसके पुराने संपर्क कितने सक्रिय हैं और क्या उसकी जगह कोई नया कमांडर उभरता है।
NIA के मामलों से जुड़ी जांच भी महत्वपूर्ण
NIA के रिकॉर्ड में बृजेश गंझू का नाम दो मामलों में वांटेड व्यक्ति के रूप में दर्ज है। इनमें से RC-38/2020/NIA/DLI जैसे मामलों के आधिकारिक रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट होता है कि झारखंड में TPC/उग्रवादी गतिविधियों से जुड़े मामलों की जांच में धन उगाही, आपराधिक साजिश और UAPA समेत विभिन्न कानूनी प्रावधानों का इस्तेमाल हुआ है। हालांकि किसी दूसरे मामले के आरोपों को बृजेश गंझू के खिलाफ व्यक्तिगत रूप से अंतिम अपराध-सिद्धि मानना उचित नहीं होगा।
इसलिए आगे की जांच में उसके कथित नेटवर्क, वित्तीय संपर्कों और दूसरे आरोपियों से उसके संबंधों की पड़ताल महत्वपूर्ण होगी। उसकी मौत के बाद भी जिन मामलों में वह वांटेड था, उनसे संबंधित रिकॉर्ड और जांच अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाओं के तहत आगे बढ़ सकते हैं।
अब नजर वाराणसी और झारखंड में आगे की कार्रवाई पर
वाराणसी की मुठभेड़ ने झारखंड के एक लंबे समय से वांटेड उग्रवादी चेहरे को सुरक्षा एजेंसियों की पहुंच से बाहर होने की संभावना खत्म कर दी है, लेकिन इसका व्यापक प्रभाव आगे की जांच पर निर्भर करेगा।
सबसे अहम सवाल अब यह होगा कि क्या बृजेश गंझू की मौत के बाद उसके नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों तक सुरक्षा एजेंसियां पहुंच पाती हैं? यदि उसके स्थानीय संपर्क, वित्तीय लेन-देन और संगठनात्मक कड़ियों की पहचान होती है, तो यह कार्रवाई केवल एक वांटेड कमांडर की मौत तक सीमित न रहकर व्यापक नेटवर्क की जांच का आधार बन सकती है।



