हिंदू-मुस्लिम समलैंगिक जोड़े को धमकी पर हाईकोर्ट का हस्तक्षेप, कहा- वयस्कों की पसंद में जबरन दखल नहीं
प्रयागराज। उत्तर प्रदेश के एक हिंदू-मुस्लिम समलैंगिक जोड़े के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दो वयस्क महिलाएं अपनी इच्छा से साथ रहने का फैसला करती हैं तो केवल परिवार या सामाजिक असहमति के आधार पर उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। 14 सितंबर 2026 के आदेश में न्यायमूर्ति डॉ. गौतम चौधरी ने पुलिस को जरूरत पड़ने पर दोनों महिलाओं को सुरक्षा उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।
मामला तब अदालत पहुंचा जब दोनों महिलाओं ने अपने परिवारों की ओर से कथित धमकी और हस्तक्षेप की आशंका जताते हुए सुरक्षा की मांग की। अदालत के सामने यह भी रखा गया कि दोनों अलग-अलग धर्मों से हैं, अविवाहित हैं और समलैंगिक संबंध में रहते हुए साथ रहना चाहती हैं। न्यायालय ने दोनों से बातचीत के बाद यह दर्ज किया कि वे वयस्क हैं और उनका साथ रहने का निर्णय स्वेच्छा पर आधारित है।
अदालत ने मुद्दे को रिश्ते से ज्यादा व्यक्तिगत स्वतंत्रता के रूप में देखा
इस आदेश की कानूनी अहमियत यहीं से सामने आती है। अदालत ने यह तय करने की कोशिश नहीं की कि समाज किसी रिश्ते को कितना स्वीकार करता है। उसका मुख्य सवाल यह था कि क्या किसी वयस्क व्यक्ति को अपनी पसंद से दूसरे वयस्क के साथ रहने के कारण धमकी या जबरन अलग किए जाने का सामना करना चाहिए?
हाईकोर्ट ने कहा कि दो वयस्क नागरिक अपनी पसंद से साथ रहने का फैसला कर सकते हैं और उनके इस फैसले में परिवार, रिश्तेदार या समाज के किसी अन्य व्यक्ति को गैरकानूनी तरीके से हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी रिश्ते को वैवाहिक मान्यता न मिलने का अर्थ यह नहीं है कि संबंधित लोगों की गरिमा या शारीरिक सुरक्षा के साथ समझौता किया जा सकता है।
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समलैंगिक संबंध और समान-लिंग विवाह, दोनों एक बात नहीं
इस मामले को समझने के लिए एक कानूनी अंतर भी महत्वपूर्ण है। वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट के Navtej Singh Johar फैसले ने IPC की धारा 377 को उस सीमा तक असंवैधानिक ठहराया था, जहां यह सहमति से निजी रूप से संबंध बनाने वाले समान-लिंग वाले वयस्कों को अपराधी बनाती थी। अदालत ने निजता, गरिमा और अपनी पसंद के आधार पर जीवन जीने की स्वतंत्रता को संवैधानिक संरक्षण से जोड़ा था।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि भारत में समान-लिंग विवाह को कानूनी मान्यता मिल गई। इसलिए मौजूदा मामला विवाह का अधिकार तय करने से अधिक सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सवाल से जुड़ा है। यही अंतर इस आदेश को समझने में महत्वपूर्ण है।
परिवार की असहमति और कानूनी सीमा
अदालत ने यह भी दर्ज किया कि राज्य की ओर से समान-लिंग संबंधों की सामाजिक स्वीकार्यता को लेकर आपत्ति रखी गई थी। लेकिन अदालत के सामने संवैधानिक प्रश्न यह था कि सामाजिक असहमति क्या किसी वयस्क की स्वतंत्रता और सुरक्षा को खत्म कर सकती है। न्यायालय ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और सुरक्षा की मांग पर कानूनी सिद्धांतों के आधार पर विचार किया।
यह रुख उन मामलों से जुड़ता है जिनमें अदालतों ने बार-बार वयस्क व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अपनी पसंद से जीवन जीने के अधिकार पर जोर दिया है। हालांकि हर मामले के तथ्य अलग होते हैं और किसी एक आदेश को सभी परिस्थितियों पर स्वतः लागू नहीं माना जा सकता।
अब पुलिस की भूमिका सबसे अहम
हाईकोर्ट ने सीधे यह निर्देश नहीं दिया कि किसी भी परिस्थिति में बिना सत्यापन के सुरक्षा उपलब्ध करा दी जाए। आदेश में यह भी कहा गया कि दोनों के वयस्क होने और स्वेच्छा से साथ रहने की पुष्टि के बाद, यदि उनके रिश्ते में कोई बाधा पैदा होती है तो पुलिस सुरक्षा सुनिश्चित करे।
इसका मतलब है कि आगे पुलिस की जिम्मेदारी केवल सुरक्षा देने तक सीमित नहीं होगी। उसे यह भी देखना होगा कि धमकी, दबाव, पीछा करने, जबरन अलग करने या किसी अन्य प्रकार की आपराधिक हरकत की शिकायत सामने आती है तो कानून के तहत उचित कार्रवाई की जाए।
फैसले का व्यापक असर क्या हो सकता है?
ऐसे मामलों में अदालत का हस्तक्षेप उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण बन सकता है जो परिवार या सामाजिक दबाव के कारण अपनी व्यक्तिगत पसंद को लेकर असुरक्षित महसूस करते हैं। हालांकि यह आदेश विवाह की कानूनी स्थिति नहीं बदलता, लेकिन यह स्पष्ट करता है कि वयस्कों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और शारीरिक सुरक्षा को केवल सामाजिक असहमति के आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
आगे इस तरह के मामलों में असली चुनौती कानून और सामाजिक वास्तविकता के बीच संतुलन की रहेगी। अदालतों के सामने आने वाले प्रत्येक मामले में उम्र, सहमति, वास्तविक खतरे और उपलब्ध साक्ष्यों की अलग-अलग जांच होगी। इस मामले में भी अंतिम महत्व इसी बात का रहेगा कि पुलिस आदेश के अनुरूप दोनों महिलाओं की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित करती है और धमकी से जुड़े आरोपों पर क्या कार्रवाई होती है।



