त्योहारी सीजन 2026 में 2.5 लाख तक नौकरियों का अनुमान, छोटे शहरों में बढ़ेगा रोजगार का दायरा
मुंबई। भारत में त्योहारी सीजन इस बार सिर्फ खरीदारी और कारोबार की रफ्तार बढ़ाने वाला दौर नहीं रहने वाला है। जुलाई से दिसंबर 2026 के बीच देश में करीब 2 लाख से 2.5 लाख तक मौसमी और गिग रोजगार पैदा होने का अनुमान है। एक ताजा इंडस्ट्री रिपोर्ट के मुताबिक, त्योहारी मांग को देखते हुए कंपनियों की हायरिंग में करीब 15 से 20 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है।
इस रोजगार वृद्धि का सबसे बड़ा असर उन क्षेत्रों में दिखाई देने की उम्मीद है, जहां त्योहारी खरीदारी के दौरान काम का दबाव अचानक बढ़ जाता है। ई-कॉमर्स, क्विक कॉमर्स, रिटेल, लॉजिस्टिक्स, हॉस्पिटैलिटी, ट्रैवल और कंज्यूमर सर्विसेज में अतिरिक्त कर्मचारियों की जरूरत बढ़ेगी। खासतौर पर डिलीवरी, वेयरहाउसिंग, ऑर्डर प्रोसेसिंग, इन्वेंट्री, रिटेल सेल्स और कस्टमर सपोर्ट जैसे कामों में अवसर बनने की संभावना है।
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इस बार सिर्फ डिलीवरी की नौकरियां नहीं बढ़ेंगी
त्योहारी सीजन की भर्ती को लंबे समय तक केवल डिलीवरी और स्टोर स्टाफ तक सीमित समझा जाता रहा है। लेकिन इस बार रोजगार की तस्वीर कुछ अलग दिखाई दे रही है। कंपनियों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करने वाले ऐसे कर्मचारियों की भी जरूरत बढ़ रही है, जो ऑर्डर मैनेजमेंट, रिटर्न और रिफंड, ग्राहक शिकायतों, कैटलॉग मैनेजमेंट, फ्रॉड एवं ट्रांजैक्शन सपोर्ट और डार्क-स्टोर इन्वेंट्री जैसे काम संभाल सकें।
इसका मतलब है कि त्योहारी मांग बढ़ने के साथ ऑपरेशनल नौकरियों का स्वरूप भी तकनीक आधारित हो रहा है। अब केवल शारीरिक श्रम ही पर्याप्त नहीं है; डिजिटल सिस्टम, डेटा और रियल-टाइम ऑर्डर मैनेजमेंट की समझ भी कई भूमिकाओं में महत्वपूर्ण होती जा रही है।
छोटे शहर बन रहे हैं नए रोजगार केंद्र
इस रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण पहलू रोजगार का भौगोलिक विस्तार है। अनुमान के मुताबिक, टियर-2 और टियर-3 शहर कुल त्योहारी हायरिंग की करीब 45 प्रतिशत मांग में योगदान दे सकते हैं। इन शहरों में हायरिंग 25 से 30 प्रतिशत तक बढ़ने का अनुमान है। जयपुर, लखनऊ, इंदौर, सूरत, नागपुर, भुवनेश्वर, कोयंबटूर, चंडीगढ़ और कोच्चि जैसे शहरों में बढ़ती ई-कॉमर्स और क्षेत्रीय डिलीवरी नेटवर्क इसकी वजह बन रहे हैं।
यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि रोजगार का अवसर अब केवल बड़े महानगरों तक सीमित नहीं रह रहा। जैसे-जैसे कंपनियां स्थानीय वेयरहाउस, डार्क स्टोर और डिलीवरी नेटवर्क बढ़ा रही हैं, वैसे-वैसे छोटे शहरों में रहने वाले युवाओं के लिए अपने शहर में ही काम मिलने की संभावना बढ़ रही है।
फ्रेशर्स और महिलाओं के लिए भी खुल रहे अवसर
त्योहारी भर्ती का एक और पहलू फ्रेशर्स, पहली बार काम शुरू करने वालों और महिलाओं की बढ़ती भागीदारी है। रिपोर्ट के अनुसार, लचीली शिफ्ट, घर के नजदीक उपलब्ध काम और संरचित अस्थायी रोजगार मॉडल इस वर्ग को कंपनियों से जोड़ने में मदद कर रहे हैं। गैर-मेट्रो क्षेत्रों से आने वाली महिलाओं की हिस्सेदारी भी कुछ श्रेणियों में बढ़ने का अनुमान है।
हालांकि, यहां एक महत्वपूर्ण सवाल भी है—इनमें से कितनी नौकरियां दिसंबर के बाद स्थायी रोजगार में बदलेंगी? मौसमी भर्ती का वास्तविक प्रभाव केवल नियुक्तियों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से भी तय होगा कि कंपनियां अच्छे प्रदर्शन करने वाले कर्मचारियों को आगे कितने अवसर देती हैं।
कंपनियां पहले से क्यों कर रही हैं तैयारी?
रिपोर्ट के अनुसार, कंपनियां अब त्योहारी सीजन शुरू होने से करीब 12 से 14 सप्ताह पहले ही वर्कफोर्स प्लानिंग शुरू कर रही हैं। इसका कारण साफ है—त्योहारों के दौरान मांग बहुत कम समय में तेजी से बढ़ती है। अगर कर्मचारी अंतिम समय में नियुक्त किए जाएं तो प्रशिक्षण, डिलीवरी क्षमता और ग्राहक सेवा पर दबाव बढ़ सकता है।
इसलिए 2026 की तस्वीर को केवल ‘फेस्टिव जॉब बूम’ के रूप में देखना अधूरा होगा। असल बदलाव यह है कि कंपनियां मौसमी कर्मचारियों को पहले से तैयार प्रतिभा पूल के रूप में देख रही हैं। इससे कुछ कर्मचारियों को आगे स्थायी भूमिकाओं तक पहुंचने का रास्ता भी मिल सकता है, हालांकि इसकी गारंटी नहीं मानी जा सकती।
आगे क्या बदलेगा?
अगर यह भर्ती अनुमान वास्तविक नियुक्तियों में बदलता है, तो 2026 का त्योहारी सीजन भारत के गिग और फ्लेक्सिबल वर्कफोर्स मॉडल के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षण बन सकता है। कंपनियों के लिए चुनौती केवल अधिक लोगों को नियुक्त करना नहीं होगी, बल्कि उन्हें तेजी से प्रशिक्षित करना, डिजिटल सिस्टम से जोड़ना और काम की गुणवत्ता बनाए रखना भी होगा।
वहीं नौकरी तलाशने वालों के लिए यह समय केवल अस्थायी कमाई का अवसर नहीं, बल्कि नए सेक्टर में प्रवेश का जरिया बन सकता है। खासकर फ्रेशर्स और छोटे शहरों के युवाओं के लिए मौसमी नौकरी भविष्य के अनुभव और स्थायी अवसरों की शुरुआत बन सकती है।



