निठारी कांड के सुरेंद्र कोली की हरिद्वार में मौत
हरिद्वार। करीब दो दशक पहले पूरे देश को झकझोर देने वाले निठारी हत्याकांड से जुड़े सुरेंद्र कोली की 18 सितंबर 2026 को हरिद्वार में मौत हो गई। पुलिस के मुताबिक, उनका शव भूपतवाला क्षेत्र में एक चाय की दुकान के भीतर फंदे से लटका मिला। मौके से कोई सुसाइड नोट बरामद नहीं हुआ है और पुलिस मौत की परिस्थितियों की जांच कर रही है। पोस्टमार्टम और फोरेंसिक जांच के बाद ही मौत के कारणों पर अंतिम निष्कर्ष सामने आएगा।
पुलिस के अनुसार कोली पिछले कुछ समय से हरिद्वार में रह रहे थे और चाय बेचने का काम कर रहे थे। घटना सप्त ऋषि पुलिस चौकी क्षेत्र की बताई गई है। पुलिस ने उनके परिवार को सूचना दे दी है और मामले की जांच शुरू कर दी है। स्थानीय पुलिस अधिकारी ने भी पहचान और घटनास्थल से जुड़ी शुरुआती जानकारी की पुष्टि की है।
मौत से पहले बदली थी निठारी मामले की कानूनी तस्वीर
कोली की आज की पहचान समझने के लिए 2006 के उस मामले पर लौटना जरूरी है, जिसने उत्तर प्रदेश के नोएडा के निठारी क्षेत्र को राष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया था। दिसंबर 2006 में एक मकान के पीछे नाले से बच्चों के कंकाल और मानव अवशेष मिलने के बाद जांच ने भयावह रूप ले लिया था। कोली उस मकान में घरेलू सहायक के रूप में काम करते थे और कारोबारी मोनिंदर सिंह पंढेर भी मामले में आरोपी बनाए गए थे। सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड में इस पृष्ठभूमि और लंबे आपराधिक मुकदमों का विस्तृत उल्लेख है।
कोली को कई मामलों में दोषी ठहराया गया और मौत की सजा तक सुनाई गई। लेकिन वर्षों की अपीलीय प्रक्रिया में अभियोजन के साक्ष्यों पर गंभीर सवाल उठे। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अक्टूबर 2023 में निठारी से जुड़े 12 मामलों में कोली को बरी कर दिया था। इसके बाद जुलाई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने उन बरी किए जाने के खिलाफ दायर अपीलें खारिज कर दीं।
इसके बाद भी एक मामला लंबित था। 11 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने क्यूरेटिव पिटीशन स्वीकार करते हुए उस मामले में कोली की दोषसिद्धि भी रद्द कर दी और निर्देश दिया कि यदि किसी अन्य मामले में उनकी जरूरत न हो तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए। सुप्रीम कोर्ट के आधिकारिक फैसले में कहा गया कि समान साक्ष्य-ढांचे वाले मामलों में विरोधाभासी परिणाम सामने आए थे और अभियोजन का मामला कानूनी कसौटी पर टिक नहीं पाया।
सुप्रीम कोर्ट ने जांच और सबूतों पर क्या कहा था?
यह फैसला निठारी मामले के सबसे महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ों में से एक था। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि सिर्फ संदेह, चाहे कितना भी गंभीर क्यों न हो, दोष सिद्ध करने वाले प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता। कोर्ट ने साक्ष्यों और अभियोजन की कहानी में मौजूद कमियों को ध्यान में रखते हुए अंतिम दोषसिद्धि को बरकरार नहीं रखा।
इसका अर्थ यह नहीं है कि 2006 की घटनाओं की भयावहता कम हो जाती है। इसका कानूनी अर्थ इतना है कि उपलब्ध अभियोजन साक्ष्य के आधार पर अदालत ने दोष सिद्ध होने की आवश्यक कसौटी पूरी नहीं मानी।
अब सामने है एक और सवाल
कोली की मौत निठारी कांड की कहानी में एक दुखद और जटिल अध्याय जोड़ती है। उनकी मौत का कारण अभी आधिकारिक रूप से निर्धारित नहीं हुआ है, इसलिए किसी कथित वजह या मानसिक स्थिति के बारे में अनुमान लगाना उचित नहीं होगा। अभी पुलिस जांच और पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार है।
करीब 20 साल पुराने इस मामले ने एक बार फिर दो अलग सवाल सामने ला दिए हैं—पीड़ित परिवारों को न्याय कैसे मिले और आपराधिक मामलों में जांच तथा सबूतों की गुणवत्ता कितनी निर्णायक होती है। निठारी की कहानी इन दोनों सवालों को एक साथ याद दिलाती है।



