Chakradhar Samaroh 2026:
रायगढ़, छत्तीसगढ़। रायगढ़ की पहचान सिर्फ औद्योगिक शहर के रूप में नहीं, बल्कि संगीत, नृत्य और शास्त्रीय कला की एक विशिष्ट परंपरा के केंद्र के तौर पर भी है। इसी सांस्कृतिक पहचान को आगे बढ़ाते हुए 41वें अंतर्राष्ट्रीय चक्रधर समारोह 2026 का सोमवार को रामलीला मैदान में भव्य शुभारंभ हुआ। छत्तीसगढ़ के राज्यपाल रमेन डेका ने महाराजा चक्रधर सिंह के तैलचित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर दस दिवसीय आयोजन की शुरुआत की। समारोह 14 से 23 सितंबर तक चलेगा।
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उद्घाटन के साथ ही रायगढ़ में अगले दस दिनों के लिए शास्त्रीय संगीत, नृत्य, लोककला और पारंपरिक प्रस्तुतियों का सिलसिला शुरू हो गया है। लेकिन इस आयोजन की अहमियत केवल मंच पर होने वाली प्रस्तुतियों तक सीमित नहीं है। चक्रधर समारोह दरअसल उस सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने का प्रयास है, जिसे महाराजा चक्रधर सिंह ने संरक्षण और साधना के जरिए मजबूत आधार दिया था।
रायगढ़ की पहचान को फिर राष्ट्रीय मंच
राज्यपाल रमेन डेका ने समारोह को केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम न मानते हुए इसे महाराजा चक्रधर सिंह की कला-साधना और विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने वाला माध्यम बताया। उन्होंने रायगढ़ घराने की कथक परंपरा की विशिष्ट पहचान का भी उल्लेख किया।
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महाराजा चक्रधर सिंह का योगदान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने राजसत्ता को केवल प्रशासन तक सीमित रखने के बजाय कला और कलाकारों के संरक्षण को भी महत्व दिया। उनकी रचनाओं ‘नर्तन सर्वस्व’, ‘तालतोय निधि’ और ‘राग रत्न मंजूषा’ को भारतीय संगीत और नृत्य परंपरा से जुड़े महत्वपूर्ण ग्रंथों में गिना जाता है।
यही कारण है कि चक्रधर समारोह किसी एक कला शैली का उत्सव नहीं है। यहां रायगढ़ की स्थानीय परंपरा और देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाली शास्त्रीय कलाओं के बीच संवाद दिखाई देता है।
पहली शाम गणेश वंदना से हुई शुरुआत
समारोह की शुरुआत स्वर्गीय वेदमणि सिंह ठाकुर के शिष्यों की गणेश वंदना से हुई। इसके बाद गायन और वादन की प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम को आगे बढ़ाया। उद्घाटन समारोह में पद्मश्री सम्मानित डॉ. उषा बारले की पंडवानी और पद्मश्री अनुज शर्मा की लोक कला एवं संगीत प्रस्तुति भी कार्यक्रम का हिस्सा रही।
इन प्रस्तुतियों का महत्व इसलिए भी है क्योंकि चक्रधर समारोह में मंच केवल स्थापित कलाकारों के लिए नहीं है। शास्त्रीय परंपराओं के साथ लोककलाओं को स्थान देकर आयोजन छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विविधता को भी सामने लाता है।
अगले दिनों में कथक से लेकर ओडिसी और कथकली तक
आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विविधता है। जिला प्रशासन द्वारा जारी कार्यक्रम के अनुसार आने वाले दिनों में कथक, कुचिपुड़ी, ओडिसी, कथकली, लोकनृत्य, पंडवानी, भजन, तबला, सितार और अन्य संगीत प्रस्तुतियां होंगी।
15 सितंबर को कथक, राजस्थानी लोककला, कुचिपुड़ी, तबला वादन, पंडवानी और भजन की प्रस्तुतियां निर्धारित हैं। आगे के दिनों में छत्तीसगढ़ी लोकनृत्य और कथक के साथ विभिन्न राज्यों की कला शैलियों को भी मंच मिलेगा।
समापन दिवस यानी 23 सितंबर को पद्मश्री सम्मानित गायिका कविता कृष्णमूर्ति की प्रस्तुति निर्धारित है।
समारोह का महत्व केवल संस्कृति तक सीमित नहीं
ऐसे बड़े सांस्कृतिक आयोजन किसी शहर की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति दे सकते हैं। बाहर से आने वाले कलाकारों, दर्शकों और अतिथियों के कारण होटल, परिवहन, स्थानीय भोजन, बाजार और अन्य सेवाओं को अप्रत्यक्ष लाभ मिलता है।
इस लिहाज से चक्रधर समारोह रायगढ़ के लिए सांस्कृतिक पर्यटन की संभावनाओं को बढ़ाने वाला मंच भी बन सकता है। यदि आयोजन की पहुंच देश के दूसरे हिस्सों और अंतरराष्ट्रीय कला समुदाय तक लगातार बढ़ती है, तो रायगढ़ को एक विशिष्ट कला-पर्यटन गंतव्य के रूप में विकसित करने की संभावनाएं मजबूत हो सकती हैं।
विरासत को किताबों और दस्तावेजों में भी सुरक्षित करने की जरूरत
समारोह के दौरान महाराजा चक्रधर सिंह के ग्रंथों के संरक्षण और प्रकाशन पर भी जोर दिया गया। राज्यसभा सांसद देवेंद्र प्रताप सिंह ने इस विषय को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष रखे जाने की बात कही।
यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी सांस्कृतिक परंपरा को केवल साल में एक बार मंच देकर संरक्षित नहीं किया जा सकता। उसके लिए पुराने ग्रंथों, संगीत रचनाओं, नृत्य शैलियों और कलाकारों की मौखिक परंपराओं का डिजिटल और शोधपरक दस्तावेजीकरण भी जरूरी है।
अगर महाराजा चक्रधर सिंह की रचनाओं और रायगढ़ घराने की परंपरा को व्यवस्थित तरीके से संग्रहित, प्रकाशित और नई पीढ़ी के विद्यार्थियों तक पहुंचाया जाता है, तो समारोह का प्रभाव दस दिनों से कहीं आगे तक जा सकता है।
स्थानीय प्रतिभाओं के लिए भी बड़ा अवसर
चक्रधर समारोह की एक अहम भूमिका स्थानीय कलाकारों को बड़े मंच से जोड़ना है। देश के नामी कलाकारों के साथ स्थानीय प्रतिभाओं की मौजूदगी उन्हें अपनी कला व्यापक दर्शकों तक पहुंचाने का अवसर देती है।
रायगढ़ में कथक और संगीत की परंपरा पहले से मजबूत रही है। ऐसे आयोजन इस परंपरा को केवल स्मृति के रूप में नहीं रखते, बल्कि नए कलाकारों को उसे सीखने और आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।
आगे की चुनौती: विरासत को अगली पीढ़ी से जोड़ना
41वां चक्रधर समारोह यह दिखाता है कि रायगढ़ की सांस्कृतिक पहचान आज भी मजबूत है। लेकिन किसी भी विरासत की वास्तविक सफलता इस बात से तय होती है कि नई पीढ़ी उसमें कितनी भागीदारी करती है।
इसके लिए केवल बड़े मंच और प्रसिद्ध कलाकार पर्याप्त नहीं होंगे। स्कूल-कॉलेजों में कला कार्यशालाएं, युवा कलाकारों के लिए प्रशिक्षण, पुराने कलाकारों का डिजिटल आर्काइव और महाराजा चक्रधर सिंह की रचनाओं पर शोध जैसी गतिविधियों को भी समारोह से जोड़ना उपयोगी होगा।
तभी चक्रधर समारोह एक वार्षिक सांस्कृतिक आयोजन से आगे बढ़कर रायगढ़ की स्थायी सांस्कृतिक संस्था का रूप ले सकता है।



