कौन हैं डॉ. सीमा खन्ना? चुनाव आयोग के IT सिस्टम को लेकर क्यों उठ रहे सवाल, विपक्ष के आरोपों के बीच समझें पूरा विवाद
नई दिल्ली। चुनावी प्रक्रिया के डिजिटल होने के साथ अब वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने, हटाने और सुधार जैसे कामों में सॉफ्टवेयर की भूमिका पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है। इसी वजह से पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची और Special Intensive Revision (SIR) को लेकर चल रहे विवाद में अब चुनाव आयोग की Director General (IT) डॉ. सीमा खन्ना का नाम भी राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है।
विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग के डिजिटल सिस्टम में केंद्रीकृत नियंत्रण के जरिए स्थानीय चुनाव अधिकारियों की भूमिका सीमित की गई और मतदाता सूची में बदलाव किए गए। हालांकि, ये राजनीतिक आरोप हैं, जिन्हें अभी तथ्य के रूप में स्थापित नहीं किया गया है। दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने कहा है कि ECINet जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म सख्त डेटा-सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत संचालित होते हैं, ताकि अनधिकृत बदलाव और छेड़छाड़ को रोका जा सके।
कौन हैं डॉ. सीमा खन्ना?
चुनाव आयोग की आधिकारिक Officers Directory में डॉ. सीमा खन्ना को Director General (IT) के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
वह पहले National Informatics Centre (NIC) में Scientist-G के पद पर कार्यरत थीं। भारत सरकार के राजपत्र में अप्रैल 2025 के एक आदेश के अनुसार उन्हें NIC से निर्वाचन आयोग में नियुक्त किया गया था।
चुनाव आयोग के डिजिटल ढांचे में उनकी जिम्मेदारी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ECINet जैसे प्लेटफॉर्म चुनाव से संबंधित कई डिजिटल सेवाओं और सूचनाओं को एकीकृत करते हैं। आयोग के अपने आधिकारिक संचार में भी सीमा खन्ना को ECINet के फीचर्स और कामकाज पर प्रस्तुतियां देते हुए दिखाया गया है।
यानी विवाद का केंद्र केवल एक अधिकारी नहीं, बल्कि चुनावी व्यवस्था में IT के बढ़ते प्रभाव और उसके प्रशासनिक नियंत्रण का सवाल भी है।
विवाद की असली जड़ क्या है?
पूरे विवाद को समझने के लिए दो स्तर अलग-अलग देखने होंगे।
पहला है वोटर लिस्ट तैयार करने की प्रशासनिक प्रक्रिया। दूसरा है उस प्रक्रिया को संचालित करने वाला डिजिटल सिस्टम।
विपक्षी दलों का आरोप है कि ECINet और संबंधित सॉफ्टवेयर के केंद्रीकृत इस्तेमाल से स्थानीय Electoral Registration Officers यानी EROs और Booth Level Officers यानी BLOs की भूमिका प्रभावित हुई। TMC सांसद महुआ मोइत्रा ने दावा किया है कि IT सिस्टम के जरिए स्थानीय अधिकारियों को दरकिनार कर मतदाता सूची में बदलाव किए गए।
इन आरोपों के बीच एक अहम घटनाक्रम यह है कि मीडिया रिपोर्टों में दो चुनाव आयुक्तों की ओर से IT सिस्टम और SIR से जुड़े कुछ फैसलों पर आपत्तियों का उल्लेख सामने आया है। एक रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने यह सवाल उठाया कि क्या IT महानिदेशक को EROs की पूर्ण सिस्टम एक्सेस सीमित करने का अधिकार था।
यही बिंदु विवाद को राजनीतिक आरोपों से आगे प्रशासनिक और संस्थागत सवाल में बदल देता है।
विपक्ष ने सीमा खन्ना को क्यों बनाया निशाना?
पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया पहले से राजनीतिक रूप से संवेदनशील रही है। TMC नेताओं ने कई मौकों पर चुनाव आयोग की IT व्यवस्था और सीमा खन्ना की भूमिका पर सवाल उठाए हैं।
अभिषेक बनर्जी ने भी पहले मतदाता सूची में ‘logical discrepancy’ से जुड़े आंकड़ों और चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे तथा सीमा खन्ना का नाम लेते हुए दावे किए थे।
महुआ मोइत्रा ने 24 सितंबर 2026 को चुनाव आयोग के खिलाफ अपने आरोपों को और आगे बढ़ाते हुए CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ पुलिस शिकायत भी दर्ज कराई। उन्होंने आरोप लगाया कि IT सिस्टम के केंद्रीकरण ने स्थानीय अधिकारियों की भूमिका को दरकिनार किया।
ममता बनर्जी भी इससे पहले SIR और मतदाता नामों में बदलाव को लेकर चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगा चुकी हैं। हालांकि उनके और अन्य विपक्षी नेताओं के दावों को आरोप के रूप में ही रिपोर्ट किया जाना चाहिए, क्योंकि किसी अधिकारी के खिलाफ राजनीतिक आरोप अपने आप में अनियमितता का निर्णायक प्रमाण नहीं होते।
चुनाव आयोग का पक्ष भी समझना जरूरी
विवाद के बीच चुनाव आयोग ने ECINet और अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म की सुरक्षा व्यवस्था का बचाव किया है। आयोग का कहना है कि ये प्लेटफॉर्म सख्त डेटा-सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत चलते हैं और उनका उद्देश्य अनधिकृत छेड़छाड़ को रोकना है।
इसके अलावा चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध मतदाता सेवाओं में यह भी स्पष्ट किया गया है कि मतदाता सूची तैयार करने, संशोधित करने और सुधारने की प्रक्रिया में राज्य स्तर की चुनावी मशीनरी की भूमिका होती है।
इसलिए फिलहाल दो अलग-अलग दावों को अलग रखना जरूरी है—एक तरफ विपक्ष का यह आरोप है कि डिजिटल सिस्टम के केंद्रीकरण ने स्थानीय अधिकारियों को कमजोर किया; दूसरी तरफ आयोग का कहना है कि उसका डिजिटल ढांचा सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत संचालित है।
असली सवाल सिर्फ सीमा खन्ना का नहीं, सिस्टम का है
इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है। चुनावी व्यवस्था में IT की भूमिका बढ़ने के साथ ‘कौन डेटा देख सकता है?’, ‘कौन बदलाव कर सकता है?’, ‘किस बदलाव का डिजिटल रिकॉर्ड बनता है?’ और ‘किस अधिकारी की अनुमति जरूरी है?’ जैसे सवाल बेहद महत्वपूर्ण हो गए हैं।
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाता सूची केवल एक डेटाबेस नहीं होती। इसी सूची के आधार पर नागरिक मतदान का अधिकार इस्तेमाल करते हैं। इसलिए उसमें बदलाव की प्रक्रिया जितनी पारदर्शी होगी, चुनावी प्रक्रिया पर भरोसा उतना ही मजबूत रहेगा।
तकनीकी विशेषज्ञों के नजरिए से भी केंद्रीकृत सिस्टम अपने आप में गलत नहीं होता। कई बार केंद्रीय डिजिटल नियंत्रण से डेटा की सुरक्षा, मानकीकरण और निगरानी बेहतर हो सकती है। लेकिन ऐसे सिस्टम में role-based access, audit trails, independent logging और स्पष्ट जवाबदेही बेहद जरूरी हो जाती है। यानी यदि किसी मतदाता का नाम जोड़ा या हटाया जाता है तो यह पता चलना चाहिए कि बदलाव किस स्तर से हुआ, किस आधार पर हुआ और उसका रिकॉर्ड किस तरह सुरक्षित है।
आगे क्या हो सकता है?
अब विवाद का अगला चरण केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहने के बजाय दस्तावेजों, सिस्टम लॉग, अधिकारों की स्पष्टता और संस्थागत जांच पर निर्भर करेगा।
हाल की रिपोर्टों में चुनाव आयुक्तों के बीच SIR और IT सिस्टम को लेकर मतभेदों का उल्लेख सामने आया है। ऐसे में ECINet की कार्यप्रणाली और अधिकारियों के access rights को लेकर पारदर्शी स्पष्टीकरण महत्वपूर्ण हो सकता है।



