अब सिर्फ हथियारों से नहीं जीती जाएगी जंग! CDS सुब्रमणि ने बताया ‘BUILD’ फॉर्मूला, डेटा से डिलीवरी तक बदलेगा युद्ध का तरीका
नई दिल्ली। युद्ध का मैदान अब सिर्फ सीमा पर मौजूद सैनिकों, टैंकों और मिसाइलों तक सीमित नहीं रह गया है। तकनीक, डेटा, सॉफ्टवेयर, नेटवर्क, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और उत्पादन क्षमता ने सैन्य ताकत की परिभाषा को तेजी से बदल दिया है। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल एन.एस. राजा सुब्रमणि ने News18 DEFCON 2026 में आधुनिक युद्ध के इसी बदलते स्वरूप को समझाने के लिए ‘BUILD’ का फ्रेमवर्क सामने रखा।
उनकी बात का सबसे अहम पहलू यह था कि किसी नई तकनीक का विकसित हो जाना अपने आप में सैन्य बढ़त नहीं बनाता। तकनीक को पहले वास्तविक सैन्य क्षमता में बदलना होगा, फिर उस क्षमता से ऑपरेशनल फायदा पैदा करना होगा और अंततः उसे रणनीतिक प्रभाव में बदलना होगा। यानी भविष्य की सैन्य शक्ति का सवाल केवल यह नहीं होगा कि किस देश के पास सबसे आधुनिक तकनीक है, बल्कि यह भी होगा कि वह तकनीक कितनी तेजी से उपयोगी क्षमता बन सकती है।
BUILD के पांच अक्षरों में छिपी भविष्य की युद्ध रणनीति
CDS ने आधुनिक युद्ध के प्रमुख बदलावों को BUILD शब्द के पांच अक्षरों से समझाया।
B यानी Battlefield — बदलता युद्धक्षेत्र।
आज युद्ध कई आयामों में एक साथ लड़ा जा सकता है। जमीन, हवा और समुद्र के साथ साइबर, स्पेस और सूचना जैसे क्षेत्र भी सैन्य अभियानों का हिस्सा बन रहे हैं। इसका मतलब है कि किसी देश को केवल पारंपरिक सैन्य मोर्चे के लिए नहीं, बल्कि अलग-अलग डोमेन के बीच तालमेल के लिए भी तैयार रहना होगा। भारत के रक्षा ढांचे में मल्टी-डोमेन ऑपरेशन पर जोर भी इसी बदलाव से जुड़ा है।
U यानी Underlying Economics of War — युद्ध की बदलती अर्थव्यवस्था।
आधुनिक युद्ध में महंगे और सीमित संख्या में उपलब्ध हथियार पर्याप्त नहीं हो सकते। लंबे संघर्ष की स्थिति में उत्पादन, सप्लाई चेन, रखरखाव और तेजी से दोबारा निर्माण की क्षमता महत्वपूर्ण हो जाती है। CDS ने भी रक्षा उद्योग के लिए ‘delivery at scale’ और लागत को केवल प्लेटफॉर्म की कीमत के बजाय उसके इस्तेमाल की कुल लागत के संदर्भ में देखने की जरूरत पर जोर दिया।
I यानी Integration of Technology and Data — तकनीक और डेटा का एकीकरण।
यह शायद BUILD का सबसे तकनीकी हिस्सा है। जनरल सुब्रमणि ने कहा कि भविष्य के युद्धक्षेत्र में नेटवर्क, डेटा, सॉफ्टवेयर और एल्गोरिद्म की भूमिका बढ़ेगी। उन्होंने यहां तक कहा कि भारत को सैन्य क्षेत्र में बड़े पैमाने पर ऐसे नेटवर्क बनाने की जरूरत है, जैसे देश ने UPI के माध्यम से डिजिटल भुगतान का एक व्यापक नेटवर्क बनाया।
इसका सीधा अर्थ है कि अलग-अलग सेंसर, कमांड सिस्टम, प्लेटफॉर्म और यूनिट यदि सुरक्षित तरीके से एक-दूसरे से जुड़ सकें, तो निर्णय लेने की गति और परिस्थितियों की समझ दोनों बेहतर हो सकती हैं।
‘L’ यानी Learning क्यों बन सकता है निर्णायक कारक?
BUILD का चौथा अक्षर L यानी Learning है। CDS ने इस बात पर जोर दिया कि केवल सीखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि सवाल यह है कि सैन्य संगठन कितनी तेजी से सीख और खुद को बदल सकता है।
तकनीक तेजी से बदल रही है और उसके साथ युद्ध के तरीके भी बदल रहे हैं। ऐसे में वर्षों पहले बनाए गए प्रशिक्षण मॉडल या ऑपरेशनल प्रक्रियाएं हमेशा पर्याप्त नहीं होंगी।
यही कारण है कि भविष्य की सैन्य तैयारी में प्रशिक्षण, युद्धाभ्यास, वास्तविक घटनाओं से मिले सबक और नई तकनीक को जल्दी अपनाने की क्षमता महत्वपूर्ण हो सकती है।
‘D’ यानी Delivery at Scale पर क्यों जोर?
BUILD का आखिरी अक्षर D यानी Delivery at Scale है। इसका मतलब है कि किसी तकनीक या हथियार का प्रोटोटाइप तैयार कर लेना और उसे बड़ी संख्या में उपलब्ध करा पाना दो अलग-अलग क्षमताएं हैं।
युद्ध की परिस्थितियों में किसी सिस्टम की जरूरत अचानक बढ़ सकती है। ऐसे में रक्षा उद्योग को कुछ यूनिट बनाने से लेकर बड़े पैमाने पर उत्पादन तक तेजी से बढ़ने की क्षमता रखनी होगी। CDS ने इसी क्षमता को रणनीतिक सहनशक्ति से जोड़ते हुए रक्षा उद्योग की भूमिका पर जोर दिया।
यहीं पर भारत के लिए रक्षा विनिर्माण और निजी उद्योग की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। देश की रणनीतिक क्षमता केवल सैन्य बलों के आकार से नहीं, बल्कि संकट के समय आवश्यक प्रणालियों और उपकरणों की आपूर्ति बनाए रखने की क्षमता से भी जुड़ती है।
भारत के लिए यह बदलाव क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत का रक्षा क्षेत्र पिछले वर्षों में स्वदेशी उत्पादन और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ा है। DEFCON 2026 से जुड़े उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक FY 2025-26 में भारत का स्वदेशी रक्षा उत्पादन रिकॉर्ड ₹1.78 लाख करोड़ तक पहुंचा और रक्षा निर्यात ₹38,424 करोड़ रहा।
ऐसे में BUILD का संदेश केवल सेना के लिए नहीं है। इसका संबंध रक्षा अनुसंधान, स्टार्टअप, बड़े उद्योग, सॉफ्टवेयर कंपनियों, डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर और विनिर्माण क्षमता से भी है।
अगर भविष्य का युद्ध अधिक नेटवर्क आधारित और तकनीक संचालित होता है, तो सैन्य तैयारी भी एक व्यापक राष्ट्रीय इकोसिस्टम का विषय बन जाती है।
रक्षा बजट बढ़ना ही पर्याप्त नहीं
भारत का रक्षा बजट 2013-14 के लगभग ₹2.53 लाख करोड़ से बढ़कर 2026-27 में ₹7.85 लाख करोड़ होने का उल्लेख CDS के संबोधन में किया गया।
लेकिन बढ़ता बजट अपने आप में सैन्य क्षमता की गारंटी नहीं है। असली चुनौती यह होगी कि निवेश से कितनी उपयोगी क्षमता तैयार होती है, वह क्षमता कितनी जल्दी तैनात की जा सकती है और संकट की स्थिति में उसे लंबे समय तक बनाए रखने के लिए उत्पादन एवं सप्लाई सिस्टम कितना मजबूत है।
यही BUILD का मूल संदेश भी है—तकनीक से क्षमता, क्षमता से ऑपरेशनल लाभ और ऑपरेशनल लाभ से रणनीतिक प्रभाव।
आने वाले वर्षों में युद्ध की तैयारी का फोकस बदल सकता है
CDS के इस फ्रेमवर्क से संकेत मिलता है कि भारत की भविष्य की रक्षा तैयारी में केवल नए हथियार खरीदना पर्याप्त लक्ष्य नहीं होगा। नेटवर्क, डेटा, सॉफ्टवेयर, AI, प्रशिक्षण, संयुक्त संचालन और बड़े पैमाने पर उत्पादन जैसे क्षेत्रों पर भी समान जोर देना होगा।



