सूरजपुर में करोड़ों की गांजा तस्करी का बड़ा खुलासा, हादसे ने खोला 1.19 करोड़ का राज
सूरजपुर। अंबिकापुर-बनारस मार्ग पर घाट पेंडारी में हुआ एक ट्रक हादसा उस समय बड़े नशा नेटवर्क की कड़ी बन गया, जब दुर्घटनाग्रस्त वाहन के आसपास छिपाकर रखी गई नौ बोरियों से करीब 238 किलो 290 ग्राम गांजा बरामद हुआ। पुलिस के अनुसार जब्त मादक पदार्थ की अनुमानित कीमत 1 करोड़ 19 लाख रुपये है। मामले में ट्रक चालक को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया।
मामले की खास बात यह है कि मादक पदार्थ को ट्रक में लदे प्लास्टिक दाने की बोरियों की आड़ में ले जाया जा रहा था। दुर्घटना के बाद बिखरे सामान को समेटने की कोशिश के दौरान गांजे को अलग स्थान पर गड्ढे में छिपाकर तिरपाल से ढंक दिया गया। यही गतिविधि पुलिस के लिए अहम सुराग बनी।
हादसे के बाद सामान समेटने की कोशिश ने बढ़ाया संदेह
पुलिस को 30 सितंबर को सूचना मिली कि घाट पेंडारी में यूपी नंबर का ट्रक दुर्घटनाग्रस्त पड़ा है और एक व्यक्ति क्रेन की मदद से वाहन को हटवाने तथा आसपास बिखरी बोरियों को इकट्ठा कर रहा है। सूचना में यह भी बताया गया कि कुछ सामान को ट्रक से अलग ले जाकर गड्ढे में छिपाया गया है।
मौके पर पहुंची पुलिस को क्षतिग्रस्त ट्रक के आसपास प्लास्टिक दाने की बोरियां मिलीं, लेकिन ड्राइवर या अन्य व्यक्ति वहां मौजूद नहीं था। इसके बाद आसपास की तलाशी ली गई। इसी दौरान एक गड्ढे को तिरपाल से ढंका हुआ पाया गया।
तलाशी में नौ बोरियों के भीतर छिपाकर रखा गया गांजा बरामद हुआ।
238 किलो से ज्यादा गांजा, कीमत करीब 1.19 करोड़
पुलिस के मुताबिक बरामद गांजे का कुल वजन 238 किलो 290 ग्राम है। इसकी अनुमानित कीमत करीब 1 करोड़ 19 लाख रुपये बताई गई है। इसके अलावा पुलिस ने प्लास्टिक दाने से भरे 19 बड़े बोरे और ट्रक को भी जब्त किया है।
यह बरामदगी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इतनी बड़ी मात्रा में मादक पदार्थ की आवाजाही केवल स्थानीय स्तर की घटना नहीं मानी जा सकती। जांच का अगला महत्वपूर्ण हिस्सा यह पता लगाना होगा कि माल कहां से लोड हुआ, इसे किसके निर्देश पर भेजा गया और अंतिम गंतव्य तक पहुंचाने की पूरी व्यवस्था में कौन-कौन लोग शामिल थे।
ओडिशा से उत्तर प्रदेश तक था ट्रक का रूट
पुलिस पूछताछ में गिरफ्तार चालक की पहचान उत्तर प्रदेश के इंद्रानगर निवासी सुनील कुमार सिंह, उम्र 32 वर्ष, के रूप में हुई है। पुलिस के अनुसार उसने बताया कि वह ओडिशा से प्लास्टिक दाने के साथ गांजा लेकर उत्तर प्रदेश जा रहा था।
पूछताछ में चालक ने यह भी बताया कि ट्रक अलीगढ़ निवासी उसके साथी के नाम पर पंजीकृत है और वह इसे साझेदारी में चला रहा था। उसके अनुसार गांजा हाथरस के एक ड्राइवर के माध्यम से ट्रक में लोड किया गया था और माल को लखनऊ ले जाया जा रहा था।
हालांकि, इन बयानों की पुष्टि जांच के दौरान साक्ष्यों के आधार पर होना बाकी है। पुलिस के लिए अब वाहन के स्वामित्व, माल की वास्तविक बुकिंग, मोबाइल संपर्क, रास्ते में हुई गतिविधियों और संभावित सहयोगियों की भूमिका की जांच अहम होगी।
अगर ट्रक नहीं पलटता तो खेप पहुंच सकती थी मंजिल तक
इस मामले का सबसे बड़ा पहलू यही है कि दुर्घटना ने उस खेप को उजागर कर दिया, जो सामान्य माल की तरह सड़क मार्ग से आगे बढ़ रही थी। प्लास्टिक दाने जैसे वैध माल के बीच प्रतिबंधित पदार्थ को छिपाने का तरीका यह संकेत देता है कि तस्करी में वैध व्यापारिक ढांचे का इस्तेमाल जांच एजेंसियों से बचने के लिए किया जा सकता है।
हादसे के बाद गांजे को अलग स्थान पर छिपाने की कोशिश ने स्थिति को और गंभीर बनाया। यदि स्थानीय स्तर पर सूचना नहीं मिलती और पुलिस समय पर मौके पर नहीं पहुंचती, तो बरामदगी संभवतः इतनी जल्दी नहीं हो पाती।
NDPS एक्ट के तहत मामला दर्ज
चंदौरा पुलिस ने मामले में NDPS एक्ट की धारा 20(बी) के तहत अपराध दर्ज कर जांच शुरू की है। पुलिस ने ट्रक और उसमें मौजूद प्लास्टिक दाने को भी जब्ती कार्रवाई में शामिल किया है।
अब जांच का फोकस केवल गिरफ्तार चालक तक सीमित नहीं रहेगा। इतनी बड़ी मात्रा में मादक पदार्थ की सप्लाई के पीछे संभावित स्रोत और नेटवर्क का पता लगाना इस कार्रवाई का अगला चरण हो सकता है।
आगे की जांच में इन सवालों के जवाब अहम
इस बरामदगी के बाद पुलिस के सामने कई महत्वपूर्ण सवाल हैं—गांजा वास्तव में ओडिशा में किस स्थान से लोड किया गया था? इसे ट्रक में किसने रखा? उत्तर प्रदेश में इसे किसे सौंपा जाना था? क्या इस नेटवर्क में अन्य वाहन या ड्राइवर भी शामिल हैं? दुर्घटना के बाद गांजे को गड्ढे में छिपाने का निर्णय किसने लिया?
इन सवालों के जवाब मिलने पर मामला सिर्फ एक ट्रक चालक की गिरफ्तारी से आगे बढ़कर पूरे सप्लाई नेटवर्क तक पहुंच सकता है।
सूरजपुर पुलिस की यह कार्रवाई यह भी दिखाती है कि सड़क दुर्घटना जैसी सामान्य दिखने वाली घटना के पीछे छिपी गतिविधियों पर तत्काल संदेह और स्थानीय सूचना तंत्र कितना महत्वपूर्ण हो सकता है। अब इस मामले की वास्तविक अहमियत इस बात से तय होगी कि जांच एजेंसी बरामद खेप के पीछे मौजूद पूरे नेटवर्क तक कितनी दूर पहुंच पाती है।



