सुप्रीम कोर्ट में हंगामा! ‘शेम-शेम’ के नारों पर जज की फटकार, पुलिस कार्रवाई पर वकीलों ने उठाए गंभीर सवाल
नई दिल्ली: दिल्ली में CJP के प्रदर्शन और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने का मामला रविवार, 11 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो सुनवाई के दौरान माहौल गरमा गया। कुछ वकीलों ने अदालत में ‘शेम-शेम’ के नारे लगाए, जिस पर न्यायाधीशों ने नाराजगी जताते हुए अनुशासन बनाए रखने को कहा। दूसरी ओर, वरिष्ठ वकीलों ने पुलिस की कार्रवाई, लोगों की आवाजाही पर प्रतिबंध और वकीलों को हिरासत में लिए जाने जैसे मुद्दे उठाए।
यह सुनवाई ऐसे समय हुई, जब विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चल रहे विवाद और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग के बीच दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई थी। प्रदर्शनकारियों की हिरासत और सार्वजनिक परिवहन पर पाबंदियों को चुनौती देने वाली याचिकाओं ने अब इस विवाद को कानूनी बहस के केंद्र में ला दिया है।
अदालत में नारेबाजी पर जजों ने क्यों जताई नाराजगी?
सुनवाई के दौरान कुछ वकीलों ने ‘शेम-शेम’ के नारे लगाए और कुछ ने अपनी बारी आने से पहले ही दलील रखने की कोशिश की। इस पर न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने हस्तक्षेप किया और वकीलों को कार्यवाही के दौरान अनुशासन बनाए रखने की हिदायत दी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि रविवार को विशेष परिस्थितियों में सुनवाई की जा रही है और सभी पक्षों को प्रक्रिया का सम्मान करना चाहिए। कुछ वरिष्ठ वकीलों ने दूसरे वकीलों के व्यवहार के लिए खेद भी जताया।
यह घटनाक्रम एक महत्वपूर्ण बात सामने रखता है: अदालत में किसी कार्रवाई का विरोध करने और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान मर्यादा बनाए रखने के बीच संतुलन जरूरी है। वकीलों को अपने मुवक्किलों और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए मजबूत दलील रखने का अधिकार है, लेकिन अदालत में सभी पक्षों को सुनने के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन भी करना होता है।
पुलिस कार्रवाई पर वकीलों ने क्या-क्या कहा?
सुनवाई में वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायण ने दिल्ली में लगाए गए बैरिकेड हटाने और लोगों की आवाजाही सुगम बनाने की मांग उठाई। उन्होंने बिना पहचान चिह्न वाले पुलिसकर्मियों की पहचान करने और उनके खिलाफ उचित कार्रवाई की जरूरत भी बताई।
वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने वकीलों को उनके पेशेवर काम से रोके जाने का मुद्दा उठाया। उन्होंने एक वकील के साथ थाने में कथित मारपीट का मामला भी अदालत के सामने रखा।
वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश खन्ना ने दलील दी कि दिल्ली के बाहर से आए आम लोगों को भी हिरासत में लिया गया और प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए जरूरत से ज्यादा कदम उठाए गए। एक महिला वकील ने भी दावा किया कि शांतिपूर्ण मार्च शुरू करने के बाद उन्हें हिरासत में ले लिया गया।
ये सभी बातें सुनवाई में वकीलों की ओर से रखे गए आरोप और दलीलें थीं। इन आरोपों की स्वतंत्र जांच और संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना महत्वपूर्ण होगा। अदालत में किसी दलील का उल्लेख अपने आप में उस आरोप के सही साबित होने के बराबर नहीं है।
पुलिस का पक्ष भी सुनना चाहती है अदालत
कार्यवाही के दौरान पुलिस की ओर से पक्ष रखने की कोशिश किए जाने पर न्यायाधीशों ने कहा कि सरकार और पुलिस का पक्ष सॉलिसिटर जनरल के माध्यम से रखा जाएगा। अदालत ने याचिकाओं की सुनवाई में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करने पर भी जोर दिया।
जिन मामलों को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं किया गया था, उनके संबंध में अदालत ने याचिका का नंबर बताने को कहा, ताकि उन्हें प्रक्रिया के अनुसार सुनवाई के लिए लिया जा सके। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि अलग-अलग पक्षों की शिकायतों को व्यवस्थित तरीके से सुना जाए और आदेश उचित न्यायिक प्रक्रिया के तहत दिए जाएं।
इस मामले में केवल प्रदर्शनकारियों के आरोप सुनना ही पर्याप्त नहीं होगा। पुलिस को यह बताना होगा कि हिरासत किन कानूनी आधारों पर की गई, प्रतिबंधों की जरूरत क्यों पड़ी और क्या उठाए गए कदम लागू कानून के अनुरूप थे।
प्रदर्शन के अधिकार और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन
इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शांतिपूर्ण विरोध और सार्वजनिक व्यवस्था का सवाल है। संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा का अधिकार देता है, हालांकि इन अधिकारों पर कानून के तहत उचित प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं।
प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह संभावित अव्यवस्था को रोकने के लिए जरूरी कदम उठाए। लेकिन किसी प्रदर्शन को नियंत्रित करने के नाम पर लगाए गए प्रतिबंधों का आधार, उनका दायरा और उनका अनुपात भी महत्वपूर्ण है। यदि लोगों की आवाजाही, सार्वजनिक परिवहन या अदालत तक पहुंच प्रभावित होती है, तो उसके औचित्य की समीक्षा जरूरी हो जाती है।
सुप्रीम कोर्ट की इस विशेष सुनवाई से पहले भी प्रदर्शन के दौरान परिवहन संबंधी प्रतिबंधों और हिरासत को लेकर याचिकाएं दायर की गई थीं। अदालत में उठाए गए सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि उनका असर सिर्फ एक संगठन या एक प्रदर्शन तक सीमित नहीं रह सकता
SIR विवाद का कानूनी पहलू क्या है?
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR मतदाता सूची की समीक्षा से जुड़ी प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया को लेकर उठने वाली आपत्तियों का संबंध मतदाता सूची की शुद्धता, नागरिकों की भागीदारी और चुनावी प्रक्रिया पर भरोसे से है।
CJP और प्रदर्शन से जुड़े लोगों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है। हालांकि, यह संगठन की राजनीतिक मांग है। इस मांग और SIR से संबंधित आरोपों का मूल्यांकन तथ्यों, संबंधित रिकॉर्ड और सक्षम संस्थाओं की प्रक्रिया के आधार पर किया जाना चाहिए।
यदि मतदाता सूची में किसी योग्य मतदाता का नाम छूटने या गलत तरीके से हटने की शिकायत है, तो उसके लिए पारदर्शी आपत्ति और सुधार प्रक्रिया बेहद जरूरी है। इसी तरह, चुनावी व्यवस्था पर लगाए गए आरोपों की जांच भी प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए।
आगे क्या होगा?
अब आगे की कार्रवाई इस बात पर निर्भर करेगी कि सुप्रीम कोर्ट हिरासत, पुलिस की भूमिका, सार्वजनिक आवाजाही और संबंधित याचिकाओं पर क्या निष्कर्ष निकालता है। अदालत के सामने पुलिस और याचिकाकर्ताओं, दोनों पक्षों की दलीलें महत्वपूर्ण होंगी।
फिलहाल सुनवाई से यह स्पष्ट है कि विवाद केवल प्रदर्शन की अनुमति तक सीमित नहीं रहा। इसमें नागरिक स्वतंत्रता, पुलिस की जवाबदेही, न्यायिक प्रक्रिया और चुनावी संस्थाओं पर भरोसे जैसे व्यापक प्रश्न शामिल हो गए हैं।
अदालत में लगे नारे सुनवाई की सबसे चर्चित तस्वीर जरूर बने, लेकिन मामले का वास्तविक महत्व उन सवालों में है जिनका जवाब कानूनी प्रक्रिया से मिलना बाकी है। आने वाले दिनों में अदालत की टिप्पणियां और आदेश यह तय करने में अहम होंगे कि प्रदर्शन के दौरान की गई कार्रवाई को किस तरह परखा जाता है और संबंधित शिकायतों पर आगे क्या कदम उठाए जाते हैं।



