Success Story
बांका, बिहार। किसी सरकारी प्राथमिक स्कूल की कक्षा में अगर ब्लैकबोर्ड और किताबों के साथ बच्चों के हाथ, उंगलियां, खेल और गीत भी पढ़ाई के साधन बन जाएं, तो सीखने का तरीका बदल सकता है। बिहार के बांका जिले की प्रधान शिक्षिका खुशबू कुमारी ने इसी सोच को अपनी कक्षा में प्रयोग किया और अब उनके इन प्रयासों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। 5 सितंबर 2026 को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2026 से सम्मानित किया।
खुशबू कुमारी वर्तमान में बांका के उर्दू प्राथमिक विद्यालय, बिदायडीह में प्रधान शिक्षिका हैं। देशभर से चुने गए 48 शिक्षकों में उनका नाम शामिल था और बिहार से इस वर्ष केवल दो शिक्षकों का चयन हुआ। उनका चयन केवल किसी एक गतिविधि के लिए नहीं, बल्कि बच्चों को सीखने की प्रक्रिया से जोड़ने वाली नवाचारी शिक्षण शैली और स्कूल से समुदाय के जुड़ाव के प्रयासों के लिए हुआ।
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किताब से बाहर निकली कक्षा
खुशबू की शिक्षण पद्धति की खास बात यह है कि वह हर अवधारणा के लिए महंगी शिक्षण सामग्री पर निर्भर नहीं रहतीं। कई बार बच्चों की अपनी उंगलियां ही गणित का साधन बन जाती हैं और शरीर की गतिविधियां हिंदी सीखने का माध्यम।
पहाड़े को केवल रटने के बजाय उंगलियों के इस्तेमाल से समझाना और हिंदी की मात्राओं को शारीरिक गतिविधियों के साथ जोड़ना इसी प्रयोग का हिस्सा है। खेल और गीतों को भी कक्षा में जगह दी जाती है, जिससे बच्चे केवल सुनने वाले नहीं रहते, बल्कि सीखने की प्रक्रिया में सक्रिय भाग लेते हैं।
शिक्षा की दृष्टि से यह बदलाव महत्वपूर्ण है। प्राथमिक स्तर पर बच्चों के लिए किसी अमूर्त अवधारणा को सिर्फ शब्दों में समझना कठिन हो सकता है। जब उसी बात को देखने, बोलने, करने और दोहराने के अनुभव से जोड़ा जाता है, तो बच्चा पाठ के साथ अधिक सक्रिय रूप से जुड़ता है। खुशबू ने इसी सिद्धांत को अपने स्थानीय संसाधनों के साथ प्रयोग में उतारा।
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2013 में शुरू हुआ सफर, धीरे-धीरे बदली शिक्षण शैली
खुशबू कुमारी ने 2013 में बांका के कटोरिया प्रखंड के प्रोन्नत मध्य विद्यालय कठौन से शिक्षक के रूप में अपना सफर शुरू किया। शुरुआती अनुभवों में उन्हें यह महसूस हुआ कि कक्षा में मौजूद सभी बच्चे एक ही तरीके से नहीं सीखते। इसके बाद उन्होंने पाठ्यक्रम बदलने के बजाय पढ़ाने के तरीके में बदलाव करने पर जोर दिया।
यह प्रयोग किसी एक दिन में तैयार हुई योजना नहीं थी। छोटे-छोटे तरीकों को कक्षा में आजमाया गया, बच्चों की प्रतिक्रिया देखी गई और जो तरीका काम आया उसे आगे बढ़ाया गया। यही वजह है कि उनके लिए नवाचार किसी अलग प्रोजेक्ट की तरह नहीं, बल्कि रोज की कक्षा का हिस्सा बन गया।
जब शिक्षक के पास महंगा TLM न हो तो शरीर ही बन सकता है साधन
शिक्षण सामग्री यानी TLM को आमतौर पर चार्ट, मॉडल, फ्लैश कार्ड या दूसरे संसाधनों से जोड़ा जाता है। खुशबू की कक्षा इस धारणा को थोड़ा अलग तरीके से दिखाती है।
बच्चे का हाथ, उंगली, आवाज, शरीर की गतिविधि और आसपास उपलब्ध सामान्य वस्तुएं भी सीखने के उपकरण बन सकती हैं। इसका एक व्यावहारिक फायदा यह है कि ऐसे प्रयोग सीमित संसाधनों वाले स्कूलों में भी अपनाए जा सकते हैं।
यही इस कहानी का वह हिस्सा है जो राष्ट्रीय पुरस्कार से भी आगे जाता है। यदि किसी शिक्षण तकनीक को दोहराने के लिए महंगा उपकरण जरूरी न हो, तो दूसरे शिक्षक भी उसे अपने स्थानीय संदर्भ के अनुसार अपना सकते हैं।
‘चहक’ से सोशल मीडिया तक पहुंचा कक्षा का प्रयोग
2022 में ‘चहक’ कार्यक्रम से जुड़ने के बाद खुशबू ने अपनी कक्षा की गतिविधियों के वीडियो रिकॉर्ड करना शुरू किया। शुरुआत में इसका उद्देश्य अपने शिक्षण प्रयोगों को दर्ज करना था। बाद में ये वीडियो अभिभावकों, शिक्षकों और अधिकारियों के समूहों के जरिए आगे पहुंचे और सोशल मीडिया ने उनकी पहुंच और बढ़ा दी।
उनके एक चर्चित वीडियो में ‘गुड टच-बैड टच’ के जरिए बच्चों को शरीर की निजता और असहज परिस्थितियों में भरोसेमंद वयस्क से बात करने जैसी बातों को सरल तरीके से समझाने का प्रयास किया गया। इससे उनकी शिक्षण गतिविधियां सिर्फ पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि बच्चों की सुरक्षा और जागरूकता जैसे विषयों तक भी पहुंचीं।
बिदायडीह में चुनौती सिर्फ पढ़ाई की नहीं थी
21 जुलाई 2025 को खुशबू की पोस्टिंग उर्दू प्राथमिक विद्यालय बिदायडीह में प्रधान शिक्षिका के रूप में हुई। यहां उनकी भूमिका केवल कक्षा में पढ़ाने तक सीमित नहीं थी। बच्चों के साथ-साथ अभिभावकों का विश्वास जीतना और स्कूल के साथ उनका जुड़ाव मजबूत करना भी जरूरी था।
उन्होंने अभिभावकों से संवाद बढ़ाने और बच्चों के साथ लगातार काम करने पर जोर दिया। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, स्कूल में बच्चों की उपस्थिति में भी उल्लेखनीय बदलाव आया। खुशबू के अनुसार शुरुआती दौर में उपस्थिति करीब 40 प्रतिशत थी, जो बाद में 90 प्रतिशत से अधिक तक पहुंची। यह आंकड़ा उनके स्वयं के बताए अनुभव पर आधारित है, इसलिए इसे आधिकारिक राज्यव्यापी मूल्यांकन के आंकड़े के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
यहीं उनकी कहानी का एक दूसरा पहलू सामने आता है—अच्छी शिक्षा केवल पाठ पढ़ाने से नहीं बनती, बच्चे को स्कूल आने के लिए प्रेरित करने से भी बनती है।
गांव में स्कूल की भूमिका किताबों से बड़ी हुई
बिदायडीह से जुड़ी हालिया रिपोर्टों में स्कूल में बच्चों की उपस्थिति, यूनिफॉर्म, अभिभावकों की भागीदारी और सामाजिक मेल-जोल में बदलाव का भी उल्लेख किया गया है। स्थानीय रिपोर्ट के अनुसार, मजदूरी करने वाले परिवारों के बच्चों को भी नियमित रूप से स्कूल से जोड़ने के प्रयास किए गए और स्कूल का माहौल अधिक सक्रिय हुआ।
इस तरह खुशबू की कहानी सिर्फ “अनोखे तरीके से पढ़ाने वाली शिक्षिका” की कहानी नहीं रह जाती। यह दिखाती है कि प्राथमिक स्कूल किसी गांव में शिक्षा, अनुशासन, संवाद और सामाजिक भरोसे का केंद्र भी बन सकता है।
राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार ने काम को दी पहचान
खुशबू कुमारी का चयन 2026 के राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग की ओर से जारी सूची में किया गया था। देशभर के 48 शिक्षकों में बिहार से खुशबू कुमारी और गोपालगंज की शिक्षिका पुष्पा प्रसाद का चयन हुआ।
इसके बाद 5 सितंबर को विज्ञान भवन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें पुरस्कार प्रदान किया। राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार का उद्देश्य शिक्षकों के उत्कृष्ट योगदान और प्रतिबद्धता को सार्वजनिक मान्यता देना है।
लेकिन पुरस्कार मिलने के बाद भी उनकी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वही कक्षा है, जहां बच्चे सीखने के लिए आते हैं।
इस कहानी से शिक्षा व्यवस्था को क्या सीख मिलती है?
खुशबू कुमारी का प्रयोग यह बताता है कि शिक्षा में नवाचार हमेशा तकनीक या महंगे संसाधनों से नहीं आता। कई बार बदलाव पढ़ाने के नजरिए से शुरू होता है।
अगर किसी शिक्षक को यह समझने की स्वतंत्रता मिले कि बच्चे किस तरह बेहतर सीखते हैं, तो स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार छोटे प्रयोग भी असरदार हो सकते हैं। खासकर प्राथमिक शिक्षा में गतिविधि, दोहराव, बातचीत और खेल को सीखने से जोड़ना बच्चों की भागीदारी बढ़ाने का एक व्यावहारिक तरीका हो सकता है।
अब उनके काम की अगली चुनौती यह होगी कि कक्षा में सफल रहे इन प्रयोगों को दूसरे शिक्षक किस तरह अपने स्कूलों में अपनाते हैं। राष्ट्रीय पुरस्कार उनके व्यक्तिगत काम की पहचान जरूर है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी उपयोगिता तब होगी जब उनके अनुभव एक शिक्षक की उपलब्धि से निकलकर दूसरे स्कूलों के लिए सीख बनें।



