SIR विवाद पर संबित पात्रा का विपक्ष को जवाब, बोले- आयुक्तों में चर्चा न हो तो तानाशाही, करें तो सवाल क्यों?
नई दिल्ली। मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर चल रहे राजनीतिक विवाद ने अब आयोग के भीतर होने वाली deliberation यानी विचार-विमर्श को भी बहस के केंद्र में ला दिया है। BJP सांसद संबित पात्रा ने बुधवार को चुनाव आयोग के स्पष्टीकरण का हवाला देते हुए विपक्ष के सवालों पर पलटवार किया और कहा कि तीनों चुनाव आयुक्तों के बीच आधिकारिक संवाद को मतभेद का प्रमाण मानना उचित नहीं है।
पात्रा ने कहा कि अगर चुनाव आयुक्त किसी मुद्दे पर आपस में चर्चा नहीं करते, तो विपक्ष इसे तानाशाही से जोड़ता है और जब अधिकारी किसी निर्णय से पहले विचार-विमर्श करते हैं, तो उसी प्रक्रिया पर सवाल उठाए जाते हैं। उनके अनुसार, तीनों आयुक्तों के बीच हुई बातचीत को संस्थागत deliberation के रूप में देखा जाना चाहिए।
हालांकि, यह विवाद केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है। इसकी पृष्ठभूमि में एक रिपोर्ट है, जिसमें दो चुनाव आयुक्तों द्वारा पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर लिखित आपत्तियां दर्ज किए जाने का दावा किया गया था। चुनाव आयोग ने बाद में इन दावों के संदर्भ में कहा कि सदस्यों की टिप्पणियां और सवाल ड्राफ्ट स्तर की सामान्य प्रक्रिया हैं और अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए।
विवाद की असली धुरी क्या है?
पूरे मामले में दो अलग-अलग बातों को समझना जरूरी है—विचार-विमर्श के दौरान अलग राय होना और अंतिम निर्णय पर संस्थागत असहमति होना एक ही बात नहीं है।
चुनाव आयोग ने अपने स्पष्टीकरण में कहा कि वह एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था है और आंतरिक नोट, सुझाव, तकनीकी टिप्पणियां तथा अलग-अलग विचार उसके निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा हैं। आयोग के मुताबिक अंतिम आदेश और निर्णय कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए लिए जाते हैं और SIR समेत उसके फैसलों को तीनों आयुक्तों की मंजूरी प्राप्त रही है।
यानी मौजूदा विवाद में एक तरफ रिपोर्ट में दर्ज कथित आपत्तियों को लेकर सवाल उठे हैं, जबकि दूसरी तरफ आयोग का कहना है कि इन्हें अंतिम निर्णय में असहमति के तौर पर पेश करना पूरी प्रक्रिया की तस्वीर नहीं दिखाता।
संबित पात्रा ने 14 संवादों को बताया लोकतांत्रिक प्रक्रिया
BJP सांसद संबित पात्रा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में चुनाव आयोग के इसी स्पष्टीकरण को आधार बनाते हुए विपक्ष के आरोपों को चुनौती दी। उन्होंने कहा कि यदि तीनों आयुक्तों के बीच 14 मौकों पर आधिकारिक संवाद हुआ, तो इसे इस रूप में भी देखा जा सकता है कि निर्णय से पहले अलग-अलग विचारों पर चर्चा हुई।
पात्रा ने विपक्ष पर चुनाव आयोग समेत संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने का आरोप भी लगाया। उन्होंने दावा किया कि विपक्ष चुनावी राजनीति में असफल होने के बाद संस्थाओं को निशाना बना रहा है। यह BJP का राजनीतिक आरोप है, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि के तौर पर इसे तथ्य नहीं माना जा सकता।
चुनाव आयोग ने क्या कहा?
चुनाव आयोग ने विवाद के जवाब में कहा कि अलग-अलग विचार, टिप्पणियां और सुझाव किसी बहु-सदस्यीय संस्था के कामकाज में असामान्य नहीं हैं। आयोग के अनुसार, ऐसे विचार अंतिम फैसला बनने से पहले होने वाली जांच और संतुलन की प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
आयोग ने यह भी कहा कि पिछले एक वर्ष में उसके कई फैसले और चुनावी सुधार सर्वसम्मति से किए गए हैं। आयोग के मुताबिक SIR सहित मतदाता सूची संशोधन और अन्य चुनावी गतिविधियां इसी संस्थागत प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ाई गईं।
विपक्ष के सवाल किस आधार पर उठे?
विवाद की शुरुआत उस रिपोर्ट के बाद हुई जिसमें चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी द्वारा कथित तौर पर कई फैसलों पर लिखित आपत्तियां दर्ज करने की बात कही गई। रिपोर्ट में Form 6, मतदाता डेटा के केंद्रीकरण, पश्चिम बंगाल में मतदाता नाम हटाने से जुड़े मामलों और गोवा में पात्र मतदाताओं के नाम जोड़ने जैसे मुद्दों का उल्लेख किया गया।
इस रिपोर्ट के बाद राजनीतिक दलों ने चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली और निर्णय प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए। इसके जवाब में आयोग ने कहा कि चुनिंदा आंतरिक टिप्पणियों को व्यापक संस्थागत निर्णय प्रक्रिया से अलग करके देखने पर तस्वीर अधूरी रह सकती है।
SIR पर विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मामला सीधे मतदाता सूची से जुड़ा है
SIR सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया भर नहीं है। मतदाता सूची में किसी नाम का शामिल होना या हटना सीधे नागरिक के मतदान के अधिकार से जुड़ा विषय है। इसलिए मतदाता सूची में बड़े स्तर पर संशोधन की प्रक्रिया में पारदर्शिता, सत्यापन और अपील का अवसर बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
इसी संदर्भ में दिल्ली में SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल में नोटिस प्रक्रिया पर सवाल उठाए और कुछ मामलों में नोटिस जारी करने के तरीके को लेकर चिंता दर्ज की। कोर्ट ने मतदाताओं को WhatsApp और ईमेल जैसे माध्यमों से जवाब देने की सुविधा पर भी विचार करने का सुझाव दिया।
इसका मतलब यह है कि मौजूदा बहस केवल यह तय करने तक सीमित नहीं है कि आयोग के सदस्यों के बीच कितनी बार बातचीत हुई। बड़ा सवाल यह है कि मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया कितनी स्पष्ट, सत्यापन योग्य और नागरिकों के लिए सुलभ है।
आगे बहस संस्थागत पारदर्शिता पर टिक सकती है
SIR को लेकर राजनीतिक विवाद आने वाले समय में भी जारी रहने की संभावना है, लेकिन इसकी दिशा केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से तय नहीं होगी। चुनाव आयोग की आंतरिक प्रक्रिया, मतदाता डेटा के प्रबंधन, नाम जोड़ने-हटाने के मानदंड और प्रभावित मतदाताओं को दिए जाने वाले अवसर जैसे मुद्दे ज्यादा महत्वपूर्ण रहेंगे।
एक संवैधानिक संस्था में अलग-अलग अधिकारियों द्वारा सवाल या सुझाव दिया जाना अपने आप में अंतिम असहमति साबित नहीं करता। उसी तरह, किसी रिपोर्ट में दर्ज आपत्तियों को पूरी तरह नजरअंदाज करने के बजाय उनके संदर्भ, प्रक्रिया और अंतिम निर्णय को अलग-अलग देखना जरूरी है।



