छत्तीसगढ़ के बाल संप्रेक्षण गृहों की सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए राज्य सरकार ने पूर्व सैनिकों की सेवाएं लेने का निर्णय लिया है। बाल देखरेख और संप्रेक्षण गृहों में सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवालों के बाद उच्च न्यायालय में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने इस संबंध में शपथ-पत्र प्रस्तुत किया है। अतिरिक्त मुख्य सचिव द्वारा दायर हलफनामे में बताया गया है कि सैनिक कल्याण बोर्ड को पत्र लिखकर पूर्व सैनिकों की नियुक्ति की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी गई है।
बाल संप्रेक्षण गृहों की सुरक्षा का मुद्दा 11 जुलाई की रात बिलासपुर के नूतन चौक स्थित संस्थान में हुई हिंसा के बाद सामने आया था। वहां चार किशोरों ने चौकीदार की हाथ-पैर बांधकर और गला दबाकर हत्या कर दी थी। इसके बाद हुए प्रदर्शनों और उपजे विवाद का संज्ञान लेते हुए उच्च न्यायालय ने स्वयं जनहित याचिका के रूप में सुनवाई शुरू की। सरकार ने अदालत को यह भी बताया कि महासमुंद संस्थान से भागे आठ बच्चों में से पांच को तलाश लिया है और तीन की तलाश जारी है। बिलासपुर से भागे चार में से तीन बच्चों को वापस लाया जा चुका है, जबकि एक बालक की खोज की जा रही है।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को याचिका में पक्षकार बनाने का आदेश दिया है। केंद्र सरकार की ओर से बताया गया था कि इन गृहों का प्रबंधन केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में आता है। अदालत ने सुरक्षा व्यवस्था और 156 सुरक्षा गार्डों की तैनाती पर आने वाले वित्तीय भार के संबंध में मंत्रालय से व्यक्तिगत शपथ-पत्र प्रस्तुत कर स्थिति स्पष्ट करने के निर्देश दिए हैं। उच्च न्यायालय याचिका पर अगली सुनवाई 24 सितंबर को करेगा।



