Raipur Cyber Fraud: बॉस का एक WhatsApp मैसेज और कंपनी के 2.93 करोड़ साफ! अंतरराज्यीय गिरोह के 5 आरोपी गिरफ्तार
किसी कंपनी में जब मालिक या वरिष्ठ अधिकारी की तरफ से पैसे ट्रांसफर करने का निर्देश आता है, तो कर्मचारी आमतौर पर उसे सामान्य कारोबारी प्रक्रिया समझते हैं। लेकिन अगर वही निर्देश किसी साइबर अपराधी की बनाई फर्जी पहचान से आए तो कंपनी को करोड़ों रुपये का नुकसान हो सकता है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में सामने आया साइबर ठगी का मामला इसी खतरे की गंभीर तस्वीर पेश करता है।
यहां साइबर अपराधियों ने कंपनियों के मालिक और अधिकृत अधिकारियों की पहचान का इस्तेमाल कर उनके अकाउंटेंट को WhatsApp पर संदेश भेजे और अलग-अलग बैंक खातों में करोड़ों रुपये ट्रांसफर करा लिए। दोनों मामलों की कुल कथित ठगी 2.93 करोड़ रुपये बताई गई है। पुलिस ने महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में कार्रवाई करते हुए पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया है। हालांकि, ठगी की पूरी रकम की बरामदगी अभी बाकी है।
कंपनी के भीतर भरोसे को बनाया साइबर अपराध का हथियार
इस ठगी का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि अपराधियों को किसी कंपनी के बैंकिंग सिस्टम को सीधे हैक करने की जरूरत नहीं पड़ी। उन्होंने कर्मचारियों के बीच मौजूद भरोसे और वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों का पालन करने की कार्यप्रणाली का फायदा उठाया।
कंपनी के मालिक या वित्तीय अधिकारी के नाम और प्रोफाइल फोटो का इस्तेमाल करके फर्जी WhatsApp पहचान बनाई गई। इसके बाद अकाउंटेंट को संदेश भेजकर तत्काल बैंक ट्रांसफर करने के निर्देश दिए गए।
ऐसे मामलों को साइबर सुरक्षा की भाषा में बिजनेस ईमेल कॉम्प्रोमाइज (BEC) या CEO Fraud जैसी धोखाधड़ी की श्रेणी से जोड़ा जाता है। इसमें अपराधी किसी वरिष्ठ अधिकारी की पहचान बनाकर कर्मचारियों से वित्तीय लेनदेन करवाते हैं। WhatsApp जैसे माध्यमों का इस्तेमाल होने पर भी इसका मूल तरीका यही रहता है।
पहला मामला: 93 लाख रुपये का ट्रांसफर
टिकरापारा थाना क्षेत्र में सामने आए पहले मामले में कमल विहार निवासी विजय राठी की कंपनी राठी बंधुस कमर्शियल प्राइवेट लिमिटेड को निशाना बनाया गया।
19 से 21 अक्टूबर के बीच एक अज्ञात व्यक्ति ने कंपनी के निदेशक विजय राठी के नाम और प्रोफाइल फोटो का इस्तेमाल करके अकाउंटेंट लेखराम चक्रधारी को WhatsApp संदेश भेजे।
संदेशों में बैंक खाते में रकम ट्रांसफर करने के निर्देश दिए गए थे। अकाउंटेंट ने संदेशों को वास्तविक समझ लिया और कंपनी के यूनियन बैंक ऑफ इंडिया खाते से 93 लाख रुपये बताए गए बैंक खाते में भेज दिए।
बाद में जब फर्जीवाड़े का पता चला तो पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई। जांच के दौरान इस मामले में 24 लाख रुपये होल्ड कराए गए।
दूसरा मामला: अधिकारी की फर्जी पहचान से उड़ाए 2 करोड़
तेलीबांधा थाना क्षेत्र में भी लगभग इसी तरीके से एक कंपनी को निशाना बनाया गया।
ट्रांसफॉर्मर एंड ट्रांसमिशन लिमिटेड के मुख्य वित्त अधिकारी ओमकार वरु की शिकायत के अनुसार, कंपनी के अधिकृत अधिकारी अंशुल शर्मा के नाम और पहचान का दुरुपयोग कर अकाउंटेंट बिरेश तिवारी को WhatsApp संदेश भेजा गया।
संदेश में टीके कंस्ट्रक्शन के बैंक खाते में दो करोड़ रुपये ट्रांसफर करने का निर्देश दिया गया था।
अकाउंटेंट ने इसे कंपनी के अधिकारी का वास्तविक निर्देश समझकर बैंक ऑफ बड़ौदा की पंडरी शाखा स्थित कंपनी के खाते से दो करोड़ रुपये ऑनलाइन भेज दिए।
इस मामले में पुलिस ने 1.14 करोड़ रुपये विभिन्न बैंक खातों में होल्ड कराए हैं।
महाराष्ट्र से प्रयागराज तक फैला था आरोपियों का नेटवर्क
दोनों मामलों में ठगी का तरीका लगभग एक जैसा होने के कारण पुलिस ने तकनीकी जांच को आगे बढ़ाया। संदिग्ध मोबाइल नंबरों, WhatsApp प्रोफाइल, बैंक खातों और डिजिटल लेनदेन की कड़ियों को जोड़ने का प्रयास किया गया।
जांच के दौरान पुलिस को महाराष्ट्र के ठाणे जिले के उल्हासनगर और उत्तर प्रदेश के प्रयागराज तक आरोपियों के संबंध मिले।
इसके बाद पुलिस की अलग-अलग टीमें दोनों राज्यों में भेजी गईं। बैंकिंग रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज और अन्य तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया।
गिरफ्तार आरोपियों की पहचान इस प्रकार बताई गई है:
- आकाश कन्हैयालाल चुथ (20)
- साहिल रमेश नथानी (23)
- राज चंदरलाल जुमानी (23)
- विनय श्रीवास्तव (47)
- विनोद कुमार (49)
पुलिस के अनुसार, उल्हासनगर से गिरफ्तार तीन आरोपियों की भूमिका दोनों मामलों में सामने आई है। उनके कब्जे से छह मोबाइल फोन, तीन एटीएम कार्ड, तीन बैंक पासबुक और 25 हजार रुपये नकद जब्त किए गए। प्रयागराज से गिरफ्तार दो आरोपियों के पास से दो मोबाइल फोन भी बरामद किए गए।
पुलिस के मुताबिक, प्रयागराज में गिरफ्तार दोनों आरोपियों को न्यायालय से जमानत पर रिहा किया गया है। आगे की जांच के लिए उन्हें रायपुर लाने की प्रक्रिया की जा रही है।
2.93 करोड़ की ठगी, लेकिन 1.38 करोड़ रुपये ही हो पाए होल्ड
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल ठगी की रकम की बरामदगी को लेकर है।
विवरण
रकम
टिकरापारा में ठगी
93 लाख रुपये
तेलीबांधा में ठगी
2 करोड़ रुपये
कुल कथित ठगी
2.93 करोड़ रुपये
पुलिस द्वारा होल्ड रकम
1.38 करोड़ रुपये
इसका मतलब है कि कुल कथित ठगी की रकम में से अभी 1.55 करोड़ रुपये ऐसी राशि है जिसके बारे में पुलिस को आगे जांच करनी होगी। होल्ड की गई रकम का मतलब अंतिम रूप से वापस मिल जाना नहीं है। इसके लिए बैंकिंग प्रक्रिया और संबंधित कानूनी कार्रवाई पूरी होना जरूरी है।
पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि पैसा किन-किन खातों में भेजा गया, उसे आगे कहां ट्रांसफर किया गया और इस नेटवर्क में अन्य लोग भी शामिल हैं या नहीं।
कंपनियों के लिए बड़ा सबक: WhatsApp पर आया आदेश भुगतान की मंजूरी नहीं
इस घटना से कारोबारी संस्थानों के लिए एक महत्वपूर्ण सीख सामने आती है। केवल किसी वरिष्ठ अधिकारी का नाम, फोटो या WhatsApp संदेश देखकर बड़ी रकम ट्रांसफर करना सुरक्षित प्रक्रिया नहीं है।
कंपनियों को वित्तीय लेनदेन के लिए कुछ अनिवार्य सुरक्षा नियम लागू करने चाहिए:
1. दो स्तर की मंजूरी: बड़ी रकम के ट्रांसफर के लिए कम से कम दो अधिकृत व्यक्तियों की स्वीकृति होनी चाहिए।
2. अलग माध्यम से पुष्टि: WhatsApp पर भुगतान का निर्देश मिलने पर अधिकारी को उसके आधिकारिक नंबर या पहले से सत्यापित माध्यम से फोन करके पुष्टि करनी चाहिए।
3. भुगतान की सीमा: अकाउंटेंट को बिना अतिरिक्त अनुमति के बड़ी रकम ट्रांसफर करने का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए।
4. बैंक खाते का सत्यापन: किसी नए बैंक खाते में रकम भेजने से पहले उसके विवरण की स्वतंत्र रूप से पुष्टि होनी चाहिए।
5. कर्मचारियों का प्रशिक्षण: वित्तीय और अकाउंटिंग विभाग के कर्मचारियों को फर्जी पहचान, संदिग्ध संदेश और साइबर ठगी के नए तरीकों के बारे में नियमित जानकारी दी जानी चाहिए।
आगे की जांच में इन सवालों के जवाब अहम
अब पुलिस की जांच केवल गिरफ्तार आरोपियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह पता लगाना भी जरूरी है कि कंपनियों की आंतरिक जानकारी अपराधियों तक कैसे पहुंची, फर्जी WhatsApp प्रोफाइल किस तरह तैयार की गईं और रकम प्राप्त करने वाले बैंक खातों का संचालन कौन कर रहा था।
अगर इस गिरोह के पीछे कोई बड़ा संगठित नेटवर्क है, तो उसकी पहचान से भविष्य में दूसरी कंपनियों को होने वाले नुकसान को रोका जा सकता है।
निष्कर्ष: रायपुर में सामने आया यह मामला बताता है कि साइबर अपराधी अब तकनीकी सेंधमारी के साथ-साथ इंसानी भरोसे का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। कंपनियों के लिए अब केवल मजबूत पासवर्ड और एंटीवायरस पर्याप्त नहीं हैं। वित्तीय निर्णयों की पुष्टि और भुगतान की बहुस्तरीय प्रक्रिया भी उतनी ही जरूरी है। पुलिस की कार्रवाई से पांच आरोपी पकड़े गए हैं, लेकिन इस मामले की असली सफलता तभी होगी जब ठगी की अधिकतम रकम बरामद हो और पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश किया जा सके।




