रायपुर ट्रिपल मर्डर के बाद सामने आई दूसरी त्रासदी, बेटी और दो नातियों की अंतिम विदाई के लिए पिता को मांगनी पड़ी मदद
रायपुर। डूमरतराई में पत्नी और दो बच्चों की हत्या की घटना ने एक परिवार को पहले ही गहरे सदमे में डाल दिया था। लेकिन इसके बाद मृतकों के अंतिम संस्कार को लेकर सामने आई परिस्थितियों ने इस त्रासदी को और गंभीर बना दिया। बेटी और दोनों नातियों को अंतिम विदाई देने रायपुर पहुंचे पिता के सामने सवाल सिर्फ शवों को घर ले जाने का नहीं, बल्कि सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार कराने का भी खड़ा हो गया।
उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, मृतका खिलेश्वरी साहू और उसके दो बच्चों की हत्या के बाद उनके मायके पक्ष ने शवों को गांव ले जाने की कोशिश की। लेकिन परिवार के अनुसार, धर्म परिवर्तन को लेकर सामाजिक स्तर पर विरोध के कारण गांव में अंतिम संस्कार के लिए उन्हें सहयोग नहीं मिला। इसके बाद पिता ओंकार साहू ने मोक्ष श्रद्धांजलि सेवा संस्थान से सहायता मांगी। संस्था की मदद से तीनों का रायपुर के जोरा स्थित मुक्तिधाम में अंतिम संस्कार किया गया।
एक परिवार पर लगातार दो आघात
डूमरतराई के साहू पारा में हुई मूल घटना में खिलेश्वरी साहू और उसके दो बच्चों की मौत हुई। पुलिस के अनुसार, महिला के पति भुनेश्वर साहू ने कथित तौर पर उन पर चाकू से हमला किया। घटना के बाद आरोपी खुद भी घायल हुआ और उसे उपचार के लिए अस्पताल ले जाया गया। पुलिस और फॉरेंसिक टीम ने मामले की जांच शुरू की है।
मृतकों की पहचान खिलेश्वरी साहू और उसके दो बच्चों के रूप में हुई है। परिवार के लिए यह घटना सामान्य शोक से कहीं आगे की स्थिति थी—एक मां ने अपनी बेटी और दोनों नातियों को खो दिया, जबकि पिता को अपनी बेटी और नातियों की अंतिम विदाई की व्यवस्था के लिए भी संघर्ष करना पड़ा।
पिता की चिट्ठी ने बताई बेबसी
इस पूरे घटनाक्रम में पिता की ओर से संस्था को लिखा गया पत्र सबसे मार्मिक पहलुओं में से एक है। रिपोर्ट के मुताबिक, ओंकार साहू ने हस्तलिखित पत्र में बेटी और दोनों नातियों के अंतिम संस्कार की व्यवस्था कराने की गुहार लगाई।
पत्र में उन्होंने खुद को गांव और समाज के सामने असमर्थ बताया। यह स्थिति उस सामाजिक दबाव की ओर इशारा करती है, जिसमें किसी परिवार को मृत्यु के बाद भी सामाजिक पहचान और धार्मिक जुड़ाव के सवालों से जूझना पड़ सकता है।
अंतिम विदाई के लिए संस्था बनी सहारा
जब परिवार को अपने स्तर पर अंतिम संस्कार की व्यवस्था में कठिनाई हुई, तब मोक्ष श्रद्धांजलि सेवा संस्थान ने आगे आकर जिम्मेदारी संभाली। परिजनों की मौजूदगी में रायपुर के जोरा मुक्तिधाम में तीनों का अंतिम संस्कार कराया गया।
संस्था के संचालक जमीर अली ने बताया कि उनके सामने ऐसे मामले पहले भी आए हैं, जिनमें धर्म परिवर्तन के बाद परिजनों या सामाजिक समूहों की ओर से अंतिम संस्कार में सहयोग नहीं मिला और संस्था ने अंतिम विदाई की व्यवस्था की।
हत्या की जांच और अंतिम संस्कार का विवाद अलग-अलग पहलू
इस मामले को समझते समय दो घटनाक्रमों को अलग रखना जरूरी है। पहला है तीन लोगों की हत्या, जिसकी पुलिस जांच कर रही है और जिसमें आरोपी पति की भूमिका को लेकर कार्रवाई चल रही है। दूसरा है अंतिम संस्कार को लेकर परिवार और सामाजिक स्तर पर पैदा हुई स्थिति, जिसका विवरण परिजनों और संस्था के हवाले से सामने आया है।
इन दोनों पहलुओं को एक साथ देखने पर घटना का मानवीय पक्ष सामने आता है। हत्या की जांच में पुलिस को अपराध की परिस्थितियों और जिम्मेदारी से जुड़े तथ्यों को स्थापित करना होगा, जबकि अंतिम संस्कार का घटनाक्रम यह सवाल उठाता है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके परिजनों को सम्मानजनक अंतिम विदाई दिलाने में सामाजिक संस्थाओं की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है।
धर्म और सामाजिक पहचान का सवाल भी सामने आया
इस घटना ने एक संवेदनशील सामाजिक प्रश्न को भी सामने ला दिया है। किसी व्यक्ति द्वारा अपनी धार्मिक पहचान बदलने का फैसला उसके परिवार और सामाजिक संबंधों को प्रभावित कर सकता है। लेकिन मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार जैसी स्थिति में विवाद और सामाजिक बहिष्कार का असर सीधे परिवार के सबसे कमजोर सदस्यों पर पड़ सकता है।
यह मामला किसी एक समुदाय पर टिप्पणी करने से ज्यादा इस बात पर विचार करने का अवसर देता है कि असहमति और सामाजिक दूरी के बावजूद मानवीय गरिमा कैसे बनाए रखी जाए। खासकर तब, जब सामने एक शोकग्रस्त परिवार हो जिसने एक साथ कई अपनों को खोया हो।
अंतिम विदाई का अधिकार क्यों महत्वपूर्ण है?
अंतिम संस्कार केवल धार्मिक प्रक्रिया नहीं है। यह परिवार के लिए शोक व्यक्त करने, मृतक को विदाई देने और मानसिक रूप से उस दुख को स्वीकार करने की प्रक्रिया भी होती है। ऐसे समय में यदि परिवार को सामाजिक अस्वीकार्यता या व्यवस्था के अभाव का सामना करना पड़े, तो उसका दुख और बढ़ सकता है।
रायपुर की यह घटना इसी मानवीय पहलू को सामने लाती है। यहां एक संस्था ने आगे बढ़कर अंतिम संस्कार की व्यवस्था की और परिवार को कम से कम अंतिम विदाई का अवसर मिल सका।
घटना आगे भी उठाएगी कई सवाल
डूमरतराई हत्याकांड में पुलिस जांच आगे बढ़ने के साथ हत्या की परिस्थितियां और आरोपी के खिलाफ साक्ष्य स्पष्ट होंगे। दूसरी ओर, अंतिम संस्कार को लेकर सामने आई सामाजिक परिस्थितियां यह सवाल छोड़ती हैं कि पारिवारिक या धार्मिक मतभेदों के बीच संकट की घड़ी में समाज किस तरह मानवीय सहयोग की भूमिका निभा सकता है।



