रायगढ़ में नाबालिग से दुष्कर्म के दोषी को कड़ी सजा, कोर्ट ने सुनाया 20 साल का फैसला
रायगढ़। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में पॉक्सो कोर्ट ने आरोपी को 20 साल के कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने दोषी पर 6 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। यह फैसला नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों के मामलों में न्यायिक जवाबदेही और बच्चों की सुरक्षा के महत्व को रेखांकित करता है।
मामले में दोषी ठहराया गया व्यक्ति मनीष सारथी (31), पूंजीपथरा थाना क्षेत्र के बगचबा का निवासी है। अभियोजन के अनुसार, उसने 15 वर्षीय लड़की को शादी का झांसा देकर घर से ले जाने और उसके साथ दुष्कर्म करने का अपराध किया। मामले की सुनवाई अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश देवेंद्र साहू की पॉक्सो अदालत में हुई।
घर से लापता हुई किशोरी, शिकायत के बाद शुरू हुई जांच
मामला पुसौर थाना क्षेत्र का है। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, 28 जून 2025 की रात परिवार के सदस्य भोजन करने के बाद सो गए थे। अगली सुबह किशोरी घर में नहीं मिली। परिजनों ने आसपास और रिश्तेदारों के यहां उसकी तलाश की, लेकिन जब उसका पता नहीं चला तो पिता ने पुलिस से शिकायत की।
शिकायत के आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की। इस दौरान गवाहों के बयान लिए गए और घटनास्थल का निरीक्षण किया गया। बाद में 30 सितंबर 2025 को किशोरी को थाने लाया गया, जहां उसकी मौजूदगी से संबंधित कानूनी प्रक्रिया पूरी की गई।
बयान के आधार पर बढ़ीं आरोपी के खिलाफ धाराएं
जांच के दौरान महिला पुलिस अधिकारी ने किशोरी का बयान दर्ज किया। अभियोजन के अनुसार, उसने बताया कि आरोपी शादी का वादा करके उसे अपने साथ ले गया था और उसके साथ लगातार शारीरिक संबंध बनाए।
इसके बाद पुलिस ने मामले में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 65(1), धारा 87 तथा पॉक्सो अधिनियम की धारा 4 और 6 जोड़ीं। इन प्रावधानों के तहत नाबालिग के साथ यौन अपराध और उससे संबंधित परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कानूनी कार्रवाई की गई।
20 साल की सजा क्यों है महत्वपूर्ण?
नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराध केवल एक व्यक्ति के विरुद्ध अपराध नहीं, बल्कि बच्चे की सुरक्षा, गरिमा और भविष्य से जुड़ा गंभीर विषय हैं। ऐसे मामलों में न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुरूप दंड देना और बच्चों के अधिकारों की रक्षा करना है।
इस मामले में 20 साल की सजा यह बताती है कि नाबालिग से जुड़े यौन अपराधों में अदालतें लागू कानूनी प्रावधानों के तहत गंभीर दंड दे सकती हैं। हालांकि, हर मामले में सजा अपराध की प्रकृति, लागू धाराओं, उपलब्ध साक्ष्यों और न्यायालय के निष्कर्षों पर निर्भर करती है।
शादी का झांसा और नाबालिग की सुरक्षा का सवाल
इस प्रकरण का एक अहम पहलू शादी का झांसा देकर किशोरी को घर से ले जाने का आरोप है। कानून के तहत नाबालिग की उम्र और उसकी सुरक्षा से जुड़े प्रावधान विशेष महत्व रखते हैं। नाबालिगों के मामलों में कथित सहमति को वयस्कों के मामलों की तरह नहीं देखा जा सकता; लागू कानून के अनुसार उम्र और अपराध की परिस्थितियां निर्णायक होती हैं।
माता-पिता और अभिभावकों के लिए भी यह मामला सतर्कता की जरूरत को सामने लाता है। बच्चों के साथ भरोसेमंद संवाद, उनकी सुरक्षा संबंधी चिंताओं को गंभीरता से लेना और किसी के बहलाने-फुसलाने या दबाव डालने की आशंका पर समय रहते सहायता लेना महत्वपूर्ण है। साथ ही, किसी घटना के बाद पीड़ित बच्चे को दोष देने के बजाय उसे सुरक्षित माहौल और आवश्यक सहयोग देना चाहिए।
न्याय के साथ पीड़िता की सुरक्षा भी जरूरी
अदालत द्वारा सजा सुनाया जाना न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण चरण है, लेकिन ऐसे मामलों में पीड़िता की दीर्घकालिक सुरक्षा और पुनर्वास भी उतना ही जरूरी है। बच्चों को जरूरत के अनुसार मनोसामाजिक सहयोग, शिक्षा जारी रखने का अवसर और निजता की सुरक्षा मिलनी चाहिए।
यौन अपराधों से जुड़े मामलों की रिपोर्टिंग में पीड़िता की पहचान उजागर करने वाले विवरणों से बचना भी आवश्यक है। इससे बच्चे की गरिमा और भविष्य की सुरक्षा बनी रहती है।
इस मामले में विशेष लोक अभियोजक गोविंद नारायण दुबे ने अभियोजन पक्ष की ओर से पैरवी की। सुनवाई के बाद पॉक्सो कोर्ट ने आरोपी को 20 साल के कारावास और 6 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई। यह फैसला बाल सुरक्षा, समय पर शिकायत और कानून के तहत जवाबदेही सुनिश्चित करने की अहमियत को सामने लाता है।



