संक्षिप्त विवरण: छत्तीसगढ़ के प्रमुख कृषि पर्व पोला के मौके पर आज रायपुर के रावण भाटा दशहरा मैदान में बैल दौड़, बैल सजावट प्रतियोगिता और किसान सम्मान समारोह होगा। कृष्ण मित्र फाउंडेशन इस आयोजन को लगातार 18वें साल आयोजित कर रहा है।

रायपुर। छत्तीसगढ़ की कृषि संस्कृति का प्रमुख पर्व पोला आज एक बार फिर उत्साह और परंपरा के साथ मनाया जाएगा। रावण भाटा दशहरा मैदान में आज बैल दौड़, बैल सजावट प्रतियोगिता और किसान सम्मान समारोह का आयोजन होगा। कृष्ण मित्र फाउंडेशन की ओर से आयोजित यह कार्यक्रम लगातार 18वें साल हो रहा है। सजे-धजे बैल इस आयोजन का मुख्य आकर्षण रहेंगे।
प्रतियोगिताओं में इतना मिलेगा नकद पुरस्कार
आयोजन में दो प्रतियोगिताएं होंगी — बैल सजावट और बैल दौड़। बैल सजावट प्रतियोगिता में पहला स्थान पाने वाले को 5 हजार रुपये, दूसरे स्थान वाले को 3 हजार रुपये और तीसरे स्थान वाले को 2 हजार रुपये का नकद पुरस्कार मिलेगा। वहीं बैल दौड़ जीतने वाले प्रतिभागी को 3 हजार रुपये, दूसरे स्थान पर रहने वाले को 2 हजार रुपये और तीसरे स्थान वाले को 1500 रुपये का इनाम दिया जाएगा।
मुख्य अतिथि सहित इन जनप्रतिनिधियों का होगा सम्मान
कार्यक्रम में संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल होंगे। आयोजन समिति की ओर से उन्हें खुमरी और जैकेट पहनाकर तथा लाठी व मोर पंख भेंट कर सम्मानित किया जाएगा। इसके अलावा रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल, रायपुर दक्षिण विधायक सुनील सोनी और रायपुर ग्रामीण विधायक मोतीलाल साहू का भी नागरिक अभिनंदन किया जाएगा।
बैलों के प्रति आभार जताने की परंपरा है पोला
पोला सिर्फ बैलों की पूजा तक सीमित पर्व नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की कृषि आधारित जीवनशैली और लोक परंपरा से गहराई से जुड़ा है। खरीफ फसल की निंदाई-कोड़ाई का दूसरा चरण पूरा होने और फसलों के बढ़ने की खुशी में किसान इस दिन अपने बैलों के प्रति कृतज्ञता जताते हैं। पंडित चंद्रभूषण शुक्ला और पंडित मनोज शुक्ला के मुताबिक भाद्रपद अमावस्या को पोला मनाने की परंपरा है, जबकि इसकी पिछली रात गर्भ पूजन किया जाता है। मान्यता है कि इसी दौरान ‘अन्न माता’ गर्भ धारण करती हैं और धान के पौधों में दाना भरना शुरू होता है, यही वजह है कि पोला के दिन खेतों में जाने की परंपरा नहीं निभाई जाती।
घरों में सुबह से बनेंगे पारंपरिक पकवान
पोला के मौके पर महिलाएं सुबह से गुड़हा चीला, अनरसा, सोहारी, चौसेला, ठेठरी, खुरमी, बरा, मुरकू, भजिया, मूठिया, गुजिया और तसमई जैसे पारंपरिक पकवान बनाती हैं। किसान अपने बैलों को नहलाकर उनके सींग और खुर सजाते हैं, गले में घुंघरू व घंटियां पहनाकर विधिवत पूजा-आरती करते हैं।
बच्चों के खेल और गांवों की सामुदायिक परंपराएं
पोला पर बच्चों को मिट्टी और लकड़ी के बने बैलों तथा छोटे मिट्टी के बर्तनों से खेलने की परंपरा भी निभाई जाती है। शाम को युवतियां मिट्टी के खिलौने ‘पोरा’ पटकने की रस्म अदा करती हैं, जबकि गांवों में कबड्डी और खो-खो जैसे पारंपरिक खेल भी आयोजित होते हैं। पोला को कुशोत्पाटिनी या कुशग्रहणी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है, इसी दिन धार्मिक कार्यों के लिए कुश एकत्र करने की परंपरा है। इस तरह आज का यह आयोजन प्रतियोगिताओं के साथ-साथ छत्तीसगढ़ की कृषि विरासत, लोक आस्था और सामुदायिक भाईचारे का उत्सव भी बनेगा।


