MP के किसानों के लिए बड़ी राहत! रबी सीजन में यूरिया संकट का खतरा कम, आयात कीमतों में 10% से ज्यादा गिरावट
भोपाल। रबी फसलों की बुआई से पहले खाद की उपलब्धता किसानों के लिए सबसे अहम चिंताओं में से एक होती है। गेहूं, चना और सरसों की खेती में समय पर उर्वरक नहीं मिलने से फसल प्रबंधन प्रभावित हो सकता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की आयात कीमतों में गिरावट मध्य प्रदेश के कृषि क्षेत्र के लिए राहत का संकेत है।
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, केंद्र सरकार की ओर से इंडियन पोटाश लिमिटेड (IPL) के माध्यम से 17 लाख टन यूरिया आयात के लिए जारी टेंडर में कीमतें घटकर 352 से 356 डॉलर प्रति टन पर आ गई हैं। अगस्त में ये दरें 390 से 394 डॉलर प्रति टन थीं। इस बदलाव से सरकार को खाद की खरीद पर होने वाले खर्च और सब्सिडी के दबाव में राहत मिलने की संभावना है।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया सस्ता होने का अर्थ यह नहीं है कि किसानों के लिए खाद की खुदरा कीमत भी घट जाएगी। इसका सीधा असर मुख्य रूप से सरकारी खरीद लागत पर पड़ता है, जबकि किसानों को मिलने वाली राहत इस बात पर निर्भर करेगी कि खाद समय पर और पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होती है या नहीं।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में गिरावट से भारत को क्या फायदा?
यूरिया की कीमतों में बदलाव का असर भारत की उर्वरक आपूर्ति व्यवस्था पर पड़ता है, क्योंकि घरेलू उत्पादन के साथ आयात भी मांग पूरी करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
दिए गए आंकड़ों के अनुसार, अगस्त की 390–394 डॉलर प्रति टन की दरों की तुलना में नई 352–356 डॉलर प्रति टन की दरें लगभग 9 से 11 प्रतिशत तक कम हैं। इससे आयात की लागत घट सकती है। वास्तविक बचत हालांकि खरीद की अंतिम कीमत, माल ढुलाई, विनिमय दर और अन्य खर्चों पर निर्भर करेगी।
भारत में यूरिया की खुदरा कीमत नियंत्रित होने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार की तेजी का पूरा बोझ सीधे किसानों पर नहीं पड़ता। इसी तरह, वैश्विक कीमतें घटने पर किसानों को तत्काल खुदरा मूल्य में कटौती मिलना भी जरूरी नहीं है। इसका लाभ मुख्य रूप से सरकार के उर्वरक सब्सिडी खर्च में राहत के रूप में सामने आ सकता है।
यह राहत महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसानों को सस्ती दर पर उर्वरक उपलब्ध कराने के लिए सरकार को उत्पादन और आयात की लागत तथा निर्धारित खुदरा कीमत के बीच का अंतर वहन करना पड़ता है।
मध्य प्रदेश में खाद की उपलब्धता क्यों है बड़ा मुद्दा?
मध्य प्रदेश में गेहूं, चना और सरसों जैसी रबी फसलें कृषि अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। मालवा, चंबल, नर्मदापुरम और बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों में बुआई के दौरान खाद की मांग बढ़ जाती है।
इस अवधि में किसानों को केवल खाद की कुल उपलब्धता से मतलब नहीं होता। उनके लिए यह भी जरूरी है कि खाद नजदीकी वितरण केंद्र पर सही समय पर मिल जाए। यदि आपूर्ति में देरी होती है, तो किसानों को अतिरिक्त चक्कर लगाने पड़ सकते हैं और खेती से जुड़े दूसरे काम भी प्रभावित हो सकते हैं।
यूरिया की खरीद समय पर होने और पर्याप्त भंडार तैयार रहने से वितरण व्यवस्था को संभालने में मदद मिल सकती है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय टेंडर में कम कीमत मिलना और प्रदेश के प्रत्येक जिले में पर्याप्त खाद पहुंच जाना दो अलग-अलग बातें हैं। इसके लिए परिवहन, भंडारण, जिला स्तर पर आवंटन और वितरण केंद्रों की कार्यक्षमता भी उतनी ही जरूरी है।
किसानों को 45 किलो की बोरी कितने में मिलेगी?
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 45 किलोग्राम यूरिया बैग का नियंत्रित खुदरा मूल्य 242 रुपये है। अंतरराष्ट्रीय आयात कीमतों में गिरावट के बावजूद इस खुदरा दर में बदलाव की जानकारी नहीं दी गई है।
इसलिए किसानों को फिलहाल यूरिया की बोरी सस्ती होने की उम्मीद के बजाय उसकी उपलब्धता और निर्धारित कीमत पर बिक्री पर ध्यान देना चाहिए।
खाद की मांग बढ़ने पर वितरण केंद्रों पर दबाव पैदा हो सकता है। ऐसी स्थिति में पर्याप्त स्टॉक के साथ वितरण की निगरानी भी आवश्यक होती है, ताकि किसानों को अनावश्यक परेशानी न हो और निर्धारित कीमत से अधिक वसूली की शिकायतों पर कार्रवाई की जा सके।
कालाबाजारी रोकने के लिए केवल स्टॉक पर्याप्त नहीं
खाद की किल्लत की शिकायतें हमेशा कुल उपलब्धता में कमी के कारण ही नहीं होतीं। कभी-कभी आपूर्ति और मांग के बीच असमानता, वितरण में देरी, स्थानीय स्तर पर खराब प्रबंधन या निर्धारित प्रक्रिया का पालन न होने से भी किसानों को परेशानी हो सकती है।
इसीलिए रबी सीजन में प्रशासन के लिए तीन काम महत्वपूर्ण होंगे। पहला, जिलों में उपलब्ध स्टॉक और वास्तविक मांग के बीच नियमित मिलान। दूसरा, वितरण केंद्रों तक समय पर खेप पहुंचाना। तीसरा, खाद की बिक्री और स्टॉक का रिकॉर्ड जांचना, ताकि अनियमितताओं की पहचान की जा सके।
यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार से सस्ती दरों पर खाद की खरीद का लाभ समय पर आपूर्ति के रूप में किसानों तक पहुंचता है, तो इसका सकारात्मक असर खेती की तैयारी पर पड़ सकता है। लेकिन यदि वितरण स्तर पर बाधाएं बनी रहती हैं, तो कम आयात कीमतों के बावजूद किसानों को स्थानीय स्तर पर परेशानी झेलनी पड़ सकती है।
आगे क्या रहेगा किसानों के लिए सबसे अहम?
रबी सीजन में यूरिया की उपलब्धता का वास्तविक आकलन तभी किया जा सकेगा, जब राज्य में पहुंचने वाली खेप, जिलावार स्टॉक और वितरण के आंकड़े सामने आएंगे। आयात की कीमतों में गिरावट एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन इससे पूरे सीजन में किसी भी जिले में किल्लत नहीं होगी, इसकी गारंटी नहीं मिलती।
किसानों को भी अपनी फसल की जरूरत के अनुसार कृषि विशेषज्ञों की सलाह से उर्वरक का इस्तेमाल करना चाहिए। यूरिया का जरूरत से अधिक उपयोग खेती की लागत बढ़ा सकता है और पोषक तत्वों के संतुलन को प्रभावित कर सकता है।



