शेयर बाजार का बड़ा संकट: 8वें हफ्ते भी टूटा निफ्टी, 25 साल का बना रिकॉर्ड; FII बिकवाली और कच्चा तेल बढ़ा रहे डर
मुंबई। भारतीय शेयर बाजार के लिए यह दौर सिर्फ सामान्य उतार-चढ़ाव का नहीं, बल्कि लगातार बढ़ते दबाव का संकेत दे रहा है। निफ्टी 50 में लगातार आठवें सप्ताह गिरावट दर्ज हुई है। उपलब्ध बाजार आंकड़ों के मुताबिक, पिछले आठ सप्ताह में निफ्टी करीब 8.74% नीचे आ चुका है, जबकि अकेले इस सप्ताह इसमें 3.11% की गिरावट रही।
लगातार आठ सप्ताह तक गिरावट का यह सिलसिला बाजार के लिए असामान्य है। दबाव के पीछे घरेलू कंपनियों के प्रदर्शन से ज्यादा वैश्विक पूंजी के रुख, कच्चे तेल की कीमतों, बॉन्ड यील्ड और पश्चिम एशिया से जुड़े जोखिमों की भूमिका दिखाई दे रही है।
बाजार में सिर्फ शेयर नहीं, भरोसा भी दबाव में
गिरावट का सबसे अहम पहलू यह है कि बिकवाली कई सेक्टरों तक फैल गई है। विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी FII की लगातार बिकवाली बाजार में उपलब्ध तरलता पर असर डाल रही है।
दूसरी ओर, अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में बढ़ोतरी से विदेशी निवेशकों के लिए अमेरिकी परिसंपत्तियां अपेक्षाकृत आकर्षक बनी हैं। इसका असर उभरते बाजारों से पूंजी के प्रवाह पर पड़ सकता है।
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, पश्चिम एशिया में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता ने कच्चे तेल की कीमतों को भी ऊंचा रखा है। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए महंगा कच्चा तेल केवल शेयर बाजार की समस्या नहीं है—इसका असर आयात बिल, रुपये, महंगाई और कंपनियों की लागत पर भी पड़ सकता है।
ऑटो शेयरों पर सबसे ज्यादा दबाव
आठ सप्ताह की अवधि में निफ्टी के कई प्रमुख शेयरों में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज हुई। टाटा मोटर्स पैसेंजर व्हीकल्स में करीब 19.48%, मारुति सुजुकी में 18.89% और महिंद्रा एंड महिंद्रा में 18.33% की गिरावट रही।
जियो फाइनेंशियल सर्विसेज के शेयर करीब 17.25% और TCS में लगभग 15.40% की गिरावट दर्ज की गई।
ऑटो शेयरों पर दबाव को केवल एक कंपनी की समस्या के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। जब बाजार में जोखिम से बचने का माहौल बनता है, तब निवेशक अक्सर महंगे वैल्यूएशन वाले या आर्थिक चक्र से जुड़े क्षेत्रों में अपनी स्थिति कम करते हैं। हालांकि किसी खास शेयर की गिरावट के लिए कंपनी-विशिष्ट कारणों का अलग से विश्लेषण जरूरी है।
कुछ शेयरों ने बाजार की आंधी में भी दिखाई मजबूती
पूरे बाजार में गिरावट के बावजूद सभी शेयरों का प्रदर्शन कमजोर नहीं रहा। आठ सप्ताह की अवधि में कोटक महिंद्रा बैंक में 7.06% की तेजी रही। डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज में करीब 2.92%, अडानी पोर्ट्स में 2.62% और कोल इंडिया में 1.24% की बढ़त दर्ज हुई।
यह अंतर बताता है कि मौजूदा दौर में बाजार की हर कंपनी एक जैसी परिस्थितियों से प्रभावित नहीं हो रही। निवेशकों के लिए सेक्टर, वैल्यूएशन, कमाई की क्षमता और कंपनी की बैलेंस शीट जैसे कारक पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
गुरुवार की गिरावट ने तकनीकी चिंता बढ़ाई
गुरुवार के कारोबारी सत्र में भी बिकवाली जारी रही। सेंसेक्स 570.59 अंक यानी 0.79% गिरकर 71,909.70 पर बंद हुआ। निफ्टी 198.50 अंक यानी 0.88% टूटकर 22,421.95 पर बंद हुआ।
रिलिगेयर ब्रोकिंग के वरिष्ठ उपाध्यक्ष अजीत मिश्रा के अनुसार, बाजार में बिकवाली का दबाव दोपहर के कारोबार में तेज हुआ और निफ्टी 22,400-22,600 के बताए गए सपोर्ट क्षेत्र से नीचे चला गया। उनके आकलन में बाजार की दिशा फिलहाल कमजोर बनी हुई है।
मास्टर कैपिटल सर्विसेज के मुख्य अनुसंधान अधिकारी रवि सिंह ने दबाव के लिए FII बिकवाली, बढ़ती वैश्विक बॉन्ड यील्ड और पश्चिम एशिया के तनाव को प्रमुख कारकों में गिनाया है।
अब असली सवाल: गिरावट कितनी लंबी चलेगी?
यहां निवेशकों को एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा—लगातार गिरावट का रिकॉर्ड अपने आप में यह साबित नहीं करता कि बाजार तुरंत पलटेगा या गिरावट आगे भी उसी गति से जारी रहेगी।
बाजार की अगली दिशा कई बाहरी संकेतों पर निर्भर करेगी। सबसे महत्वपूर्ण संकेतों में विदेशी निवेशकों की खरीद-बिक्री, कच्चे तेल की कीमत, रुपये की चाल, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और पश्चिम एशिया की स्थिति शामिल हैं।
अगर तेल महंगा रहता है और रुपया दबाव में आता है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए लागत संबंधी दबाव बढ़ सकता है। वहीं, अगर वैश्विक जोखिम कम होते हैं और विदेशी पूंजी का प्रवाह सुधरता है, तो बाजार के दबाव में बदलाव भी आ सकता है।
छुट्टी से मिली राहत, लेकिन समस्या टली नहीं
2 अक्टूबर को गांधी जयंती के अवसर पर भारतीय शेयर बाजार बंद रहेगा। हालांकि एक कारोबारी अवकाश बाजार की मूल समस्या को हल नहीं करता। छुट्टी के बाद निवेशकों की नजर वैश्विक बाजारों, कच्चे तेल, विदेशी निवेश और रुपये की चाल पर रहेगी।
मौजूदा परिस्थिति में बाजार की असली परीक्षा केवल यह नहीं है कि निफ्टी कितनी तेजी से ऊपर आता है, बल्कि यह है कि विदेशी पूंजी का रुख कब बदलता है और वैश्विक जोखिमों का दबाव कितना कम होता है।
निवेशकों के लिए यह दौर जल्दबाजी में फैसले लेने के बजाय कंपनियों के वास्तविक कारोबार, आय, कर्ज, वैल्यूएशन और जोखिम को अलग-अलग समझने का है। बाजार में गिरावट का दौर कभी-कभी अच्छे व्यवसायों के मूल्यांकन को भी प्रभावित करता है, लेकिन हर गिरता शेयर अपने आप में निवेश का अवसर नहीं बन जाता।



