भारतीय आसमान में बढ़ेगी ताकत: 60 ट्रांसपोर्ट विमानों की दौड़ में महिंद्रा-Embraer की जोड़ी, अदाणी के साथ भी बड़ा विमानन प्लान
नई दिल्ली। भारत के विमानन क्षेत्र में अब मुकाबला सिर्फ विमानों की खरीद तक सीमित नहीं रह गया है। भारतीय वायुसेना के लिए प्रस्तावित 60 मल्टी-रोल ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट (MTA) कार्यक्रम के साथ देश में विमान निर्माण, सप्लाई चेन, रखरखाव और एयरोस्पेस तकनीक का एक बड़ा औद्योगिक इकोसिस्टम विकसित करने की संभावना भी जुड़ी हुई है।
इसी दिशा में ब्राजील की विमान निर्माता कंपनी Embraer ने रक्षा क्षेत्र के लिए महिंद्रा ग्रुप को अपना भारतीय साझेदार चुना है। दोनों कंपनियां भारतीय वायुसेना के MTA कार्यक्रम में C-390 Millennium को प्रस्तावित करने की दिशा में काम कर रही हैं। Embraer और Mahindra के बीच यह सहयोग नया नहीं है। दोनों ने 2024 में MTA कार्यक्रम के लिए साथ काम करने का समझौता किया था और अक्टूबर 2025 में रणनीतिक सहयोग समझौते के जरिए इसे आगे बढ़ाया।
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रस्ताव केवल विमान बेचने तक सीमित नहीं दिखता। Embraer और Mahindra ने भारत में C-390 के लिए स्थानीय उत्पादन, सप्लाई चेन और MRO यानी मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहाल क्षमता विकसित करने की दिशा में भी योजना बनाई है। कंपनी ने फरवरी 2026 में कहा था कि चयन होने की स्थिति में भारत में C-390 के लिए MRO क्षमता विकसित करने पर काम किया जाएगा।
पुराने परिवहन बेड़े के बीच क्यों अहम है MTA कार्यक्रम?
वायुसेना के परिवहन विमान किसी भी सैन्य ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। सैनिकों और भारी उपकरणों को तेजी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने के अलावा इनका इस्तेमाल मानवीय सहायता, आपदा राहत, मेडिकल इवैक्यूएशन और रणनीतिक एयरलिफ्ट जैसे मिशनों में भी किया जा सकता है।
यही वजह है कि MTA कार्यक्रम को केवल विमानों की संख्या के नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं होगा। असली सवाल यह होगा कि नया प्लेटफॉर्म कितनी तेजी से उपलब्ध कराया जा सकता है, उसका रखरखाव कितना आसान होगा और लंबे समय तक उसके लिए स्पेयर पार्ट्स तथा तकनीकी सहायता की व्यवस्था कितनी मजबूत रहेगी।
Embraer के C-390 Millennium की अधिकतम पेलोड क्षमता 26 टन तक बताई गई है। कंपनी इसे मल्टी-मिशन प्लेटफॉर्म के रूप में पेश करती है, जिसका इस्तेमाल परिवहन के अलावा मेडिकल इवैक्यूएशन, खोज एवं बचाव, मानवीय मिशन और एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग जैसी भूमिकाओं में भी किया जा सकता है।
मुकाबला सिर्फ विमान का नहीं, औद्योगिक मॉडल का भी होगा
MTA कार्यक्रम में कई भारतीय कंपनियां अपनी-अपनी साझेदारियों और क्षमताओं के साथ मैदान में हैं। ऐसे में अंतिम फैसला केवल विमान की तकनीकी खूबियों पर निर्भर नहीं करेगा। उत्पादन व्यवस्था, स्थानीयकरण, लागत, रखरखाव, डिलीवरी टाइमलाइन और भारतीय एयरोस्पेस उद्योग को मिलने वाला काम भी महत्वपूर्ण कारक होंगे।
भारत पहले ही सैन्य परिवहन विमान के घरेलू निर्माण की दिशा में आगे बढ़ चुका है। C-295 कार्यक्रम में Airbus Defence और Tata समूह के सहयोग से भारत में विमान निर्माण की व्यवस्था बनाई गई है। इस परियोजना के तहत 56 विमानों में से 40 का निर्माण भारत में करने की योजना रखी गई थी।
इस पृष्ठभूमि में C-390 जैसी पेशकश भारत के लिए एक और औद्योगिक विकल्प खोलती है। यदि किसी विदेशी प्लेटफॉर्म का चयन होता है और उसके साथ पर्याप्त स्थानीय उत्पादन तथा MRO क्षमता विकसित होती है, तो इसका असर सिर्फ वायुसेना पर नहीं बल्कि भारतीय एयरोस्पेस सप्लायर कंपनियों और इंजीनियरिंग सेक्टर पर भी पड़ सकता है।
नागरिक विमानन में अदाणी के साथ अलग दिशा
Embraer ने भारत के नागरिक विमानन बाजार के लिए Adani Defence & Aerospace के साथ अलग साझेदारी की है। जनवरी 2026 में दोनों कंपनियों ने भारत में क्षेत्रीय परिवहन विमान इकोसिस्टम विकसित करने के लिए समझौता किया था। इसके तहत विमान निर्माण, सप्लाई चेन, आफ्टरमार्केट सेवाओं और पायलट प्रशिक्षण जैसे क्षेत्रों में सहयोग की योजना है।
फरवरी 2026 में दोनों कंपनियों ने भारत में E175 क्षेत्रीय जेट की Final Assembly Line स्थापित करने की दिशा में भी उन्नत MoU का आदान-प्रदान किया। इसका संबंध भारत की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और Regional Transport Aircraft से जुड़ी संभावनाओं से है।
इस तरह एक ही विमान निर्माता भारत में दो अलग-अलग रास्तों पर आगे बढ़ रहा है—रक्षा विमान के लिए महिंद्रा और नागरिक क्षेत्र के लिए अदाणी के साथ साझेदारी। इससे यह संकेत मिलता है कि भारत को कंपनी केवल एक विमान बिक्री बाजार के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य के उत्पादन, सप्लाई और सर्विस नेटवर्क के संभावित केंद्र के रूप में देख रही है।
भारत के लिए सबसे बड़ा फायदा कहां हो सकता है?
यदि MTA कार्यक्रम के साथ स्थानीय उत्पादन और MRO क्षमता वास्तविक रूप से विकसित होती है, तो लंबे समय में इसका लाभ विमान खरीद से आगे जा सकता है। एयरक्राफ्ट निर्माण में बड़ी संख्या में छोटे और मध्यम स्तर के सप्लायर, कंपोनेंट निर्माता, इंजीनियरिंग कंपनियां और सर्विस प्रदाता जुड़ते हैं।
Embraer ने भी भारत को अपनी वैश्विक सप्लाई चेन और MRO नेटवर्क के लिए संभावित हब के रूप में देखने की बात कही है।
हालांकि अभी इसे अंतिम खरीद का परिणाम मानना जल्दबाजी होगी। MTA कार्यक्रम में प्रतिस्पर्धी प्रस्तावों का तकनीकी और वाणिज्यिक मूल्यांकन होना बाकी है। इसलिए फिलहाल C-390 Millennium को प्रस्तावित विकल्प के रूप में देखना उचित है, न कि भारतीय वायुसेना द्वारा चुना गया विमान मानना।



