वॉशिंगटन: अमेरिकी डॉलर सिर्फ अमेरिका की करेंसी नहीं है, बल्कि दुनिया की वित्तीय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आधार है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार से लेकर कर्ज, निवेश और विदेशी मुद्रा भंडार तक, कई बड़े लेनदेन में डॉलर की भूमिका बनी हुई है। यही वजह है कि दुनिया के केंद्रीय बैंक, सरकारें और बड़ी कंपनियां बड़ी मात्रा में डॉलर और डॉलर आधारित संपत्तियां अपने पास रखती हैं।
अमेरिका को डॉलर की इस वैश्विक भूमिका से कई आर्थिक फायदे मिलते हैं। हालांकि, यह कहना सही नहीं है कि अमेरिका केवल डॉलर छापकर सीधे अरबों डॉलर का मुनाफा कमाता है। असली फायदा उस व्यवस्था से आता है, जिसमें दुनिया भर में डॉलर की लगातार मांग बनी रहती है।
डॉलर से अमेरिका को क्या फायदा होता है?
जब दूसरे देशों को अंतरराष्ट्रीय व्यापार या भुगतान के लिए डॉलर की जरूरत होती है, तो वे अपनी स्थानीय मुद्रा के बदले डॉलर खरीदते हैं। इससे वैश्विक बाजार में अमेरिकी मुद्रा की मांग बनी रहती है।
अमेरिका का एक बड़ा फायदा यह है कि उसकी सरकार अपनी ही मुद्रा यानी डॉलर में कर्ज ले सकती है। अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड दुनिया के सबसे बड़े और सबसे ज्यादा कारोबार वाले सरकारी बॉन्ड बाजारों में शामिल हैं। दुनिया भर के निवेशक इन प्रतिभूतियों में पैसा लगाते हैं, जिससे अमेरिका को बड़े पैमाने पर वित्त जुटाने में मदद मिलती है।
डॉलर की अंतरराष्ट्रीय मांग अमेरिकी वित्तीय संस्थानों के लिए भी महत्वपूर्ण है। बैंक, निवेश कंपनियां और अन्य वित्तीय संस्थान डॉलर आधारित कर्ज, भुगतान, निवेश और दूसरी सेवाओं से कारोबार करते हैं।
क्या डॉलर छापने से अमेरिका को सीधे मुनाफा होता है?
अक्सर कहा जाता है कि अमेरिका जितने चाहे डॉलर छाप सकता है और इससे उसे मुफ्त पैसा मिल जाता है। वास्तविकता इससे ज्यादा जटिल है।
नई मुद्रा जारी करने से सीनियोरेज का लाभ मिल सकता है। इसका सामान्य अर्थ यह है कि मुद्रा जारी करने की लागत की तुलना में उसके उपयोग से अधिक आर्थिक मूल्य प्राप्त होता है। लेकिन हर नया डॉलर अमेरिकी सरकार के लिए सीधा शुद्ध मुनाफा नहीं बन जाता।
जरूरत से ज्यादा मुद्रा और क्रेडिट विस्तार से महंगाई, ब्याज दर और वित्तीय स्थिरता पर असर पड़ सकता है। इसलिए अमेरिकी मौद्रिक व्यवस्था में डॉलर की आपूर्ति और ब्याज दरों का प्रबंधन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
डॉलर दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण मुद्रा कैसे बना?
डॉलर की ताकत एक दिन में नहीं बनी। इसके पीछे कई दशकों की आर्थिक और वित्तीय व्यवस्था है।
इसके प्रमुख कारण हैं:
- अमेरिका की विशाल अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजार।
- अमेरिकी सरकारी बॉन्ड बाजार की गहराई और तरलता।
- दुनिया के कई देशों का डॉलर में व्यापार करना।
- अंतरराष्ट्रीय कर्ज और वित्तीय अनुबंधों में डॉलर का व्यापक इस्तेमाल।
- दुनिया के बड़े बैंकों और वित्तीय संस्थानों में डॉलर की मजबूत भूमिका।
- डॉलर को दुनिया के ज्यादातर प्रमुख बाजारों में आसानी से खरीदने-बेचने की सुविधा।
- द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी ब्रेटन वुड्स व्यवस्था, जिसने डॉलर की अंतरराष्ट्रीय भूमिका को मजबूत किया।
बाद में अमेरिकी डॉलर का सोने से सीधा संबंध समाप्त हो गया, लेकिन अमेरिकी अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजारों का आकार डॉलर की वैश्विक मांग को बनाए रखने में अहम रहा।
BRICS क्यों कम करना चाहता है डॉलर पर निर्भरता?
BRICS देशों में पिछले कुछ वर्षों से डॉलर पर निर्भरता कम करने को लेकर चर्चा तेज हुई है। इसका एक कारण यह है कि अंतरराष्ट्रीय भुगतान में डॉलर पर ज्यादा निर्भर रहने से देशों को अमेरिकी वित्तीय प्रणाली और उसकी नीतियों के प्रभाव का सामना करना पड़ सकता है।
अमेरिकी प्रतिबंधों और वित्तीय नियमों का असर उन देशों पर पड़ सकता है जो डॉलर आधारित भुगतान व्यवस्था का इस्तेमाल करते हैं। इसी वजह से BRICS के सदस्य देश स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, सीमा-पार भुगतान और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं।
भारत भी स्थानीय मुद्राओं में अंतरराष्ट्रीय व्यापार और कम लागत वाले सीमा-पार भुगतान का समर्थन करता रहा है। हालांकि, भारत ने BRICS की अलग साझा मुद्रा बनाने के विचार का समर्थन नहीं किया है।
क्या BRICS डॉलर को खत्म कर सकता है?
फिलहाल डॉलर को पूरी तरह हटाना आसान नहीं है। किसी भी वैकल्पिक मुद्रा या भुगतान व्यवस्था के लिए सिर्फ राजनीतिक सहमति पर्याप्त नहीं होगी। उसके लिए विशाल वित्तीय बाजार, मजबूत संस्थान, भरोसेमंद मौद्रिक नीति, मुद्रा की आसानी से खरीद-बिक्री और दुनिया भर में स्वीकार्य भुगतान नेटवर्क की जरूरत होगी।
BRICS देशों की अर्थव्यवस्थाओं और मौद्रिक नीतियों में भी काफी अंतर है। इसलिए समूह के लिए एक समान मुद्रा या पूरी तरह अलग वैश्विक वित्तीय व्यवस्था बनाना बड़ी चुनौती होगी।
इस समय ज्यादा व्यावहारिक रास्ता डॉलर को पूरी तरह हटाने के बजाय उसके विकल्प बढ़ाना दिखाई देता है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों का विस्तार डॉलर की मांग के कुछ हिस्से को प्रभावित कर सकता है, लेकिन निकट भविष्य में डॉलर के पूरी तरह खत्म होने की संभावना नहीं दिखती।
डॉलर की ताकत आगे भी क्यों बनी रह सकती है?
डॉलर की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ अमेरिकी अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि पूरा वैश्विक वित्तीय नेटवर्क है। दुनिया भर में बैंक, कंपनियां, निवेशक और सरकारें पहले से डॉलर आधारित व्यवस्था का इस्तेमाल करते हैं।
यही वजह है कि किसी दूसरी मुद्रा को डॉलर की जगह लेने के लिए सिर्फ बड़ी अर्थव्यवस्था होना पर्याप्त नहीं होगा। उसे दुनिया के निवेशकों और व्यापारिक संस्थानों का लंबे समय तक भरोसा भी हासिल करना होगा।
इसलिए BRICS की कोशिशों से वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बदलाव जरूर आ सकता है, लेकिन डॉलर का अंत और डॉलर पर निर्भरता में कमी—दोनों अलग-अलग बातें हैं। आने वाले वर्षों में दुनिया एक ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ सकती है, जहां डॉलर महत्वपूर्ण बना रहे, लेकिन अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अन्य मुद्राओं की हिस्सेदारी भी बढ़े।
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