मन की बात में छत्तीसगढ़ के मुनगा अभियान की गूंज, घर-घर पोषण पहुंचाने की पहल को मिला राष्ट्रीय मंच
रायपुर, 27 सितंबर 2026: छत्तीसगढ़ में पोषण को लेकर शुरू किया गया ‘हर घर मुनगा-घर-घर मुनगा’ अभियान अब प्रदेश की सीमा से बाहर राष्ट्रीय चर्चा का हिस्सा बन गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को ‘मन की बात’ के 138वें एपिसोड में छत्तीसगढ़ की इस पहल का उल्लेख किया। अभियान का मूल विचार स्थानीय स्तर पर आसानी से उपलब्ध मुनगा यानी मोरिंगा को परिवारों के दैनिक भोजन और पोषण जागरूकता से जोड़ना है।
इस पहल की खासियत केवल मुनगा के पौधे लगाने में नहीं है। इसका व्यापक उद्देश्य यह समझ विकसित करना है कि पोषण की शुरुआत घर की रसोई और आसपास उपलब्ध खाद्य संसाधनों से भी की जा सकती है।
जब पोषण की बात घर के आंगन से शुरू हो
कुपोषण से मुकाबला केवल किसी एक योजना या एक खाद्य पदार्थ के सहारे नहीं किया जा सकता। संतुलित आहार, भोजन की विविधता, नियमित स्वास्थ्य देखभाल और पोषण संबंधी व्यवहार—इन सभी का अपना महत्व है।
यही वजह है कि ‘हर घर मुनगा-घर-घर मुनगा’ अभियान को केवल पौधरोपण कार्यक्रम के रूप में देखना इसके उद्देश्य को सीमित कर देगा। घर में मुनगा का पौधा लगाने के साथ परिवार को उसकी पत्तियों और फलियों के भोजन में उपयोग के बारे में जानकारी देना इस पहल को व्यवहार से जोड़ता है।
मुनगा की पत्तियों और फलियों का उपयोग भारतीय खान-पान में पहले से होता रहा है। पत्तियों का साग या दूसरे व्यंजनों में और फलियों का सब्जी जैसे विभिन्न रूपों में इस्तेमाल किया जाता है। इसकी पत्तियों में आयरन, कैल्शियम और कई विटामिन जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। हालांकि किसी एक खाद्य पदार्थ को संपूर्ण पोषण का विकल्प मानने के बजाय इसे विविध और संतुलित आहार के एक हिस्से के रूप में देखना अधिक उचित है।
आंगनबाड़ी बनी अभियान की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी
इस अभियान को परिवारों तक पहुंचाने में आंगनबाड़ी केंद्रों की भूमिका अहम है। पोषण माह के दौरान इन केंद्रों पर माताओं और समुदाय के साथ संवाद, स्थानीय खाद्य पदार्थों का प्रदर्शन और संतुलित आहार को लेकर जागरूकता जैसी गतिविधियां की जा रही हैं।
आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के माध्यम से परिवारों को मुनगा लगाने, पौधे की देखभाल करने और उपलब्ध पत्तियों तथा फलियों को भोजन में शामिल करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
यहीं से अभियान का सामुदायिक पक्ष सामने आता है। यदि किसी परिवार में पौधा लगाने के साथ उसके उपयोग की जानकारी भी विकसित होती है, तो पोषण का संदेश केवल पोस्टर या कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहता, बल्कि रोजमर्रा की भोजन की आदतों में शामिल होने की संभावना बढ़ती है।
महिलाओं और बच्चों के पोषण पर खास जोर
अभियान में महिलाओं, बच्चों और किशोरियों के पोषण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि परिवार के भोजन और पोषण संबंधी आदतों में महिलाओं की भूमिका अक्सर केंद्रीय होती है।
स्थानीय खाद्य पदार्थों की जानकारी, उन्हें तैयार करने के तरीके और संतुलित भोजन की समझ परिवार के स्तर पर पोषण संबंधी व्यवहार को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में मुनगा अभियान का प्रभाव केवल पौधरोपण की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से भी देखा जाना चाहिए कि कितने परिवार इसे नियमित भोजन का हिस्सा बनाते हैं और पोषण के बारे में उनकी समझ कितनी मजबूत होती है।
मुख्यमंत्री ने सितंबर में शुरू किया था अभियान
छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने सितंबर में ‘हर घर मुनगा-घर घर मुनगा’ अभियान की शुरुआत की थी। अभियान के तहत प्रदेशवासियों को घर और आसपास मुनगा लगाने तथा इसके पोषण संबंधी उपयोग के बारे में जागरूक करने पर जोर दिया गया।
अब प्रधानमंत्री के ‘मन की बात’ में इसका उल्लेख होने से इस पहल को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। स्थानीय स्तर पर शुरू किए गए ऐसे अभियानों के लिए यह मंच जनभागीदारी को प्रोत्साहित करने वाला माध्यम बन सकता है।
स्थानीय संसाधन से पोषण की दिशा में बड़ा संदेश
इस अभियान का सबसे अहम संदेश यह है कि पोषण की चुनौती से निपटने में स्थानीय संसाधनों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में जहां ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में स्थानीय वनस्पतियों, पारंपरिक भोजन और घरेलू बागवानी की अपनी मजबूत परंपरा है, वहां स्थानीय खाद्य पदार्थों को आधुनिक पोषण जागरूकता से जोड़ने की पर्याप्त संभावनाएं हैं।
हालांकि इसका प्रभाव तभी टिकाऊ होगा, जब मुनगा के साथ दालें, अनाज, सब्जियां, फल, दूध या अन्य उपलब्ध पौष्टिक खाद्य पदार्थों को भी संतुलित भोजन की समझ के साथ जोड़ा जाए। पोषण का लक्ष्य किसी एक पौधे को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि परिवार की पूरी भोजन थाली को अधिक विविध और पौष्टिक बनाना होना चाहिए।
आगे बढ़ सकती है पोषण वाटिका की अवधारणा
‘हर घर मुनगा’ जैसी पहल आगे चलकर घरेलू पोषण वाटिकाओं की व्यापक अवधारणा से भी जुड़ सकती है। यदि घरों, आंगनबाड़ी केंद्रों और सामुदायिक स्थानों पर स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग पौष्टिक सब्जियों और फलों का उत्पादन बढ़ाया जाए, तो परिवारों को ताजा खाद्य पदार्थों की उपलब्धता के अतिरिक्त स्थानीय जैव विविधता को भी बढ़ावा मिल सकता है।
इसमें स्व-सहायता समूहों और महिला समूहों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण हो सकती है। पौधों की उपलब्धता, स्थानीय व्यंजन, पोषण संबंधी प्रशिक्षण और सामुदायिक गतिविधियों को जोड़कर इस तरह की पहल को व्यापक सामाजिक अभियान का रूप दिया जा सकता है।
‘मन की बात’ में उल्लेख से बढ़ी उम्मीदें
प्रधानमंत्री द्वारा छत्तीसगढ़ के अभियान का उल्लेख राज्य के महिला एवं बाल विकास विभाग और इससे जुड़े कार्यकर्ताओं के लिए प्रोत्साहन के रूप में देखा जा रहा है। महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े ने भी इसे आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, माताओं, स्व-सहायता समूहों और पोषण अभियान से जुड़े लोगों के लिए उत्साह बढ़ाने वाला बताया है।
अब चुनौती इस पहचान को लंबे समय तक चलने वाली जनभागीदारी में बदलने की होगी। किसी भी पोषण अभियान का वास्तविक परिणाम तभी दिखाई देता है जब जागरूकता कार्यक्रम खत्म होने के बाद भी परिवार अपनी भोजन संबंधी आदतों में सकारात्मक बदलाव बनाए रखते हैं।
पौधा लगाने से आगे, भोजन की आदत बदलने तक
‘हर घर मुनगा-घर-घर मुनगा’ की असली परीक्षा यही होगी कि यह अभियान कितने परिवारों में मुनगा के पौधे लगाने तक सीमित रहता है और कितने घरों में इसे नियमित भोजन तथा संतुलित आहार की व्यापक समझ से जोड़ पाता है।



