छत्तीसगढ़ की लोककला को बड़ी पहचान! गेड़ी नर्तक अनिल गढ़ेवाल से मिले राज्यपाल रमेन डेका
रायपुर, 12 अक्टूबर 2026। छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोककलाएं अब राष्ट्रीय मंचों पर अपनी अलग पहचान बना रही हैं। गेड़ी लोकनृत्य को गणतंत्र दिवस समारोह और राष्ट्रपति भवन के ‘एट होम’ कार्यक्रम में प्रस्तुत करने वाले लोक कलाकार अनिल कुमार गढ़ेवाल ने सोमवार को रायपुर स्थित लोकभवन में राज्यपाल रमेन डेका से सौजन्य भेंट की। इस दौरान उनके सहयोगी लक्ष्मी नारायण मांडले भी मौजूद रहे।
यह मुलाकात केवल एक कलाकार और राज्यपाल के बीच औपचारिक संवाद नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक परंपरा की चर्चा का अवसर भी है, जो छत्तीसगढ़ की ग्रामीण जीवनशैली, उत्सवों और सामुदायिक पहचान से जुड़ी हुई है।
कर्तव्य पथ से राष्ट्रपति भवन तक पहुंचा गेड़ी नृत्य
अनिल कुमार गढ़ेवाल के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ के गेड़ी लोकनृत्य दल ने 26 जनवरी 2026 को नई दिल्ली के कर्तव्य पथ पर गणतंत्र दिवस समारोह में प्रस्तुति दी थी। इसके बाद 15 अगस्त 2026 को राष्ट्रपति भवन में आयोजित ‘एट होम’ कार्यक्रम में भी दल ने अपनी कला का प्रदर्शन किया।
राष्ट्रीय स्तर के ऐसे आयोजनों में किसी क्षेत्रीय लोकनृत्य की प्रस्तुति का महत्व इसलिए बढ़ जाता है, क्योंकि यहां देश के विभिन्न हिस्सों की सांस्कृतिक विविधता को एक मंच पर प्रदर्शित किया जाता है। इससे स्थानीय परंपराओं को व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचने का अवसर मिलता है।
राज्यपाल रमेन डेका ने अनिल गढ़ेवाल और उनकी टीम के प्रयासों की सराहना करते हुए लोकनृत्यों को समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। उन्होंने कलाकारों को लोककला के संरक्षण और संवर्धन के लिए आगे भी काम करते रहने की शुभकामनाएं दीं।
आखिर क्या है गेड़ी नृत्य की सांस्कृतिक खासियत?
गेड़ी नृत्य छत्तीसगढ़ की पहचान से जुड़ी पारंपरिक लोककलाओं में शामिल है। इसमें कलाकार गेड़ी यानी पैरों में बांधकर या सहारे के रूप में इस्तेमाल की जाने वाली लंबी लकड़ियों पर संतुलन बनाते हुए नृत्य करते हैं। इस प्रस्तुति में शारीरिक संतुलन, तालमेल, अभ्यास और सामूहिक प्रदर्शन का विशेष महत्व होता है।
ग्रामीण अंचलों में गेड़ी का संबंध पारंपरिक उत्सवों और लोकजीवन से रहा है। समय के साथ ऐसी कलाएं सांस्कृतिक कार्यक्रमों, लोकमंचों और राष्ट्रीय आयोजनों का हिस्सा बनी हैं। जब कोई लोकदल इस कला को बड़े मंच पर प्रस्तुत करता है, तो वह केवल मनोरंजन नहीं करता, बल्कि अपने क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को भी सामने लाता है।
लोक कलाकारों को पहचान के साथ संसाधन भी जरूरी
राष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुति मिलना किसी भी लोक कलाकार के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लेकिन लोककला को लंबे समय तक जीवित रखने के लिए केवल सम्मान और कार्यक्रमों में भागीदारी पर्याप्त नहीं होती।
लोक कलाकारों को नियमित मंच, प्रशिक्षण के अवसर, आर्थिक सहयोग, नई पीढ़ी को सिखाने की व्यवस्था और पारंपरिक कलाओं का दस्तावेजीकरण जैसे सहयोग भी चाहिए। कई लोककलाएं कलाकारों के व्यक्तिगत प्रयासों और स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर निर्भर रहती हैं। यदि युवाओं को इन परंपराओं से जोड़ने के लिए व्यवस्थित प्रयास नहीं किए गए, तो इनके अभ्यास और ज्ञान की निरंतरता प्रभावित हो सकती है।
इस लिहाज से अनिल गढ़ेवाल जैसे कलाकारों की उपलब्धियां एक व्यापक अवसर की ओर संकेत करती हैं। राष्ट्रीय स्तर पर मिली पहचान का उपयोग स्थानीय प्रशिक्षण शिविरों, सांस्कृतिक कार्यशालाओं और विद्यालयों-महाविद्यालयों में लोककला परिचय जैसे कार्यक्रमों को बढ़ावा देने के लिए किया जा सकता है।
छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को मिल सकता है नया विस्तार
छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति में नृत्य, संगीत, पारंपरिक वेशभूषा और सामुदायिक उत्सवों की महत्वपूर्ण भूमिका है। गेड़ी नृत्य को राष्ट्रीय आयोजनों में जगह मिलना इस विविधता को देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंचाने का माध्यम बना है।
भविष्य में यदि ऐसे कलाकारों और लोकदल को लगातार अवसर मिलते हैं, तो इससे सांस्कृतिक पर्यटन, स्थानीय कला समूहों और पारंपरिक प्रशिक्षण को भी प्रोत्साहन मिल सकता है। इसके लिए सरकारी संस्थानों, सांस्कृतिक संगठनों और स्थानीय समुदायों के बीच सहयोग उपयोगी साबित हो सकता है।
अनिल कुमार गढ़ेवाल और उनके सहयोगियों की राज्यपाल से मुलाकात ने एक बार फिर यह रेखांकित किया है कि लोककला किसी प्रदेश की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। इसे संरक्षित रखने का अर्थ केवल पुरानी परंपराओं को दोहराना नहीं, बल्कि उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाना और बदलते समय में उनकी प्रासंगिकता बनाए रखना भी है।



