हाल ही में प्रस्तावित फिल्मों के टाइटल—‘घूसखोर पंडित’ और ‘केरल स्टोरी 2’—को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। ‘केरल स्टोरी 2’ का नाम सुनते ही लोग 2023 में आई फिल्म The Kerala Story से तुलना करने लगे, जिसने रिलीज के समय देशभर में बहस छेड़ दी थी। जानकारों का कहना है कि फिल्म का टाइटल केवल रचनात्मक फैसला नहीं होता, बल्कि इसके पीछे कानूनी और संस्थागत प्रक्रिया भी शामिल होती है।
फिल्म इंडस्ट्री में किसी भी शीर्षक को तय करने से पहले निर्माता संबंधित फिल्म एसोसिएशन में उसका पंजीकरण कराते हैं, ताकि एक ही नाम से दो प्रोजेक्ट न बनें। इसके अलावा, अगर टाइटल किसी समुदाय, धर्म या क्षेत्र से जुड़ा हो, तो विवाद की संभावना बढ़ जाती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, निर्माता अक्सर चर्चा और प्रचार को ध्यान में रखकर भी नाम चुनते हैं, लेकिन सेंसर प्रक्रिया में आपत्तिजनक या भ्रामक शीर्षकों पर आपत्ति उठ सकती है।
कानूनी जानकारों का कहना है कि किसी भी फिल्म का नाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आता है, लेकिन यह पूर्णतः निरंकुश नहीं है। यदि शीर्षक से सामाजिक सौहार्द प्रभावित होने की आशंका हो, तो आपत्तियां दर्ज की जा सकती हैं। ऐसे में ‘घूसखोर पंडित’ और ‘केरल स्टोरी 2’ जैसे टाइटल यह सवाल खड़ा करते हैं कि रचनात्मक स्वतंत्रता और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।


