Ebola Virus : अफ्रीका के कुछ हिस्सों में फैले इबोला वायरस ने एक बार फिर दुनिया की चिंता बढ़ा दी है. हाल ही में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और युगांडा में फैल रहे इबोला इंफेक्शन को इंटरनेशनल लेवल पर सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किया है. रिपोर्ट के मुताबिक, 16 मई तक डीआरसी के इटुरी प्रांत में 246 संदिग्ध मामले और 80 संदिग्ध मौतें दर्ज की गईं, जबकि कुछ मामलों की लैब में पुष्टि भी हो चुकी है.
क्या एक नई महामारी की हो चुकी शुरुआत?
डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस अधानोम घेब्रेयसस ने कहा है कि मौजूदा स्थिति अभी महामारी के स्तर तक नहीं पहुंची है, लेकिन इंफेक्शन की गंभीरता को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय सहयोग बेहद जरूरी है. डीआरसी के स्वास्थ्य मंत्री सैमुअल-रोजर काम्बा ने बताया कि इस बार जो स्ट्रेन सामने आया है, उसका फिलहाल कोई प्रभावी वैक्सीन या विशेष इलाज उपलब्ध नहीं है और इसकी मृत्यु दर 50 प्रतिशत तक पहुंच सकती है.
क्या है इबोला बीमारी?
इबोला एक बेहद खतरनाक और जानलेवा बीमारी है, जो ऑर्थोइबोलावायरस परिवार के वायरस से होती है. अब तक इसके छह अलग-अलग प्रकार पहचाने जा चुके हैं, लेकिन इनमें से तीन स्ट्रेन बड़े प्रकोप की वजह बने हैं, जो इंसानों में गंभीर इंफेक्शन फैलाती है। यह वायरस आमतौर पर जानवरों से इंसानों में पहुंचता है. एक्सपर्ट के मुताबिक, फल खाने वाले चमगादड़ों को इसका नेचुरल फैलने का तरीका माना जाता है. इंफेक्शन जानवरों के खून, शरीर के तरल पदार्थ या इंफेक्टेड व्यक्ति के सीधे संपर्क में आने से यह वायरस तेजी से फैल सकता है. यही वजह है कि अस्पतालों में इलाज के दौरान स्वास्थ्यकर्मियों के इंफेक्टेड होने का खतरा भी काफी अधिक रहता है. यहां तक कि इंफेक्टेड व्यक्ति के अंतिम संस्कार के दौरान सीधे संपर्क में आने से भी वायरस फैलने का खतरा रहता है.
कैसे होते हैं इसके लक्षण?
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक, इबोला के शुरुआती लक्षण सामान्य वायरल बुखार जैसे लगते हैं, जिससे इसकी पहचान मुश्किल हो जाती है. इंफेक्शन के दो से 21 दिनों के भीतर अचानक तेज बुखार, अत्यधिक थकान, शरीर दर्द, सिरदर्द और गले में खराश शुरू हो सकती है. इसके बाद मरीज को उल्टी, दस्त, पेट दर्द, त्वचा पर चकत्ते और किडनी-लिवर से जुड़ी समस्याएं होने लगती हैं. कई मामलों में मरीज मानसिक भ्रम, चिड़चिड़ापन और आक्रामक व्यवहार भी दिखाने लगता है. हालांकि आम लोगों के बीच यह धारणा है कि इबोला में हमेशा खून बहता है, लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि ब्लीडिंग हर मरीज में नहीं होती और यह बीमारी के बाद के चरणों में दिखाई देती है.
इसके अलावा इबोला की पहचान करना भी आसान नहीं होता, क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण कई दूसरी इंफेक्शन बीमारियों जैसे मलेरिया, टाइफाइड, मेनिनजाइटिस और सामान्य वायरल बुखार से काफी मिलते-जुलते हैं. यही वजह है कि कई बार शुरुआती चरण में मरीज की बीमारी पकड़ में नहीं आ पाती. डॉक्टरों के मुताबिक, अगर समय रहते सही जांच और पहचान न हो, तो इंफेक्शन तेजी से गंभीर रूप ले सकता है.
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कब-कब दिखा इसका प्रकोप?
इबोला का इतिहास भी बेहद डरावना रहा है. इसका पहला बड़ा प्रकोप साल 1976 में सामने आया था, जब सूडान और कांगो में लगातार दो बड़े इंफेक्शन दर्ज किए गए. इसके बाद 2000-01 में युगांडा में वायरस तेजी से फैला. लेकिन सबसे भयावह प्रकोप 2013 से 2016 के बीच पश्चिम अफ्रीका में देखने को मिला. उस दौरान गिनी, लाइबेरिया और सिएरा लियोन जैसे देशों में 28 हजार से ज्यादा मामले सामने आए और 11 हजार से अधिक लोगों की मौत हो गई. यह अब तक का सबसे घातक इबोला प्रकोप माना जाता है. इंफेक्शन बाद में अमेरिका और यूरोप तक भी पहुंचा, जहां कुछ मामले अफ्रीका से लौटे यात्रियों और स्वास्थ्यकर्मियों में पाए गए. इसके बाद 2018 से 2020 के बीच डीआरसी और युगांडा में फिर बड़े स्तर पर इंफेक्शन फैला और हाल ही में 2025 में युगांडा में नए मामले सामने आए.
क्या है इसका इलाज?
रिसर्चर्स का कहना है कि इबोला का इलाज अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है. लंदन के इम्पीरियल कॉलेज के मेडिकल एक्सपर्ट के मुताबिक, फिलहाल जो इलाज उपलब्ध हैं, वे केवल जायर स्ट्रेन पर असर करते हैं. वहीं मौजूदा बंडीबुग्यो स्ट्रेन के लिए न तो कोई स्वीकृत वैक्सीन है और न ही प्रभावी एंटीवायरल दवा. ऐसे में इलाज मुख्य रूप से शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बनाए रखने, ऑक्सीजन स्तर स्थिर रखने और मरीज की हालत संभालने पर आधारित है.


