सूरजपुर अस्पताल की शर्मनाक लापरवाही! गेट पर प्रसव, नवजात की मौत से मचा हड़कंप
छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले के गणेशपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में रात के समय चिकित्सा सहायता नहीं मिलने के आरोपों ने ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अस्पताल के बंद दरवाजे के सामने प्रसव, नवजात की मौत और प्रसूता की गंभीर हालत के बाद दो स्वास्थ्यकर्मियों को निलंबित कर दिया गया है।
छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले से सामने आई यह घटना केवल एक अस्पताल की कथित लापरवाही का मामला नहीं है, बल्कि ग्रामीण इलाकों में आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक स्थिति पर भी सवाल उठाती है। जिस स्वास्थ्य केंद्र तक एक गर्भवती महिला को सुरक्षित प्रसव की उम्मीद में लाया गया, वहीं परिजनों को मदद के लिए दरवाजा खटखटाना पड़ा। आरोप है कि बार-बार आवाज लगाने के बावजूद उन्हें तत्काल सहायता नहीं मिली। इसी बीच महिला ने अस्पताल के गेट के सामने ही बच्चे को जन्म दिया, लेकिन कुछ देर बाद नवजात की मौत हो गई।
बंद दरवाजे के बाहर जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष
गणेशपुर (श्रीनगर) निवासी अनिल कुमार सारथी की पत्नी को बुधवार रात प्रसव पीड़ा शुरू हुई। परिजन महिला को लेकर रात करीब 11 बजे गणेशपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे। उन्हें उम्मीद थी कि अस्पताल में मौजूद स्वास्थ्यकर्मी समय पर प्रसव में मदद करेंगे और जच्चा-बच्चा को सुरक्षित रखा जा सकेगा।
परिजनों का आरोप है कि अस्पताल का मुख्य दरवाजा बंद था और उस समय डॉक्टर या नर्स उपलब्ध नहीं थे। परिवार के लोग काफी देर तक दरवाजा खटखटाते रहे और आवाज लगाकर सहायता मांगते रहे, लेकिन उन्हें मदद नहीं मिली।
प्रसव पीड़ा बढ़ने के साथ स्थिति गंभीर होती चली गई। आखिरकार महिला ने स्वास्थ्य केंद्र के प्रवेश द्वार के सामने ही बच्चे को जन्म दिया। जन्म के कुछ ही समय बाद नवजात की मौत हो गई। परिजनों का मानना है कि यदि समय पर चिकित्सकीय सहायता मिलती, तो शायद इस दुखद परिणाम को टाला जा सकता था। हालांकि, नवजात की मौत का सटीक चिकित्सकीय कारण जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
प्रसूता की हालत गंभीर, दूसरे अस्पताल में चल रहा उपचार
प्रसव के बाद महिला की तबीयत बिगड़ने पर परिजन उसे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र रामानुजनगर लेकर पहुंचे। वहां महिला को भर्ती कर उपचार दिया जा रहा है। परिजनों के अनुसार उसकी हालत गंभीर बनी हुई है।
इस घटना ने परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया है। एक ओर नवजात की मौत का दुख है, तो दूसरी ओर मां की सेहत को लेकर चिंता बनी हुई है। ऐसी परिस्थितियों में समय पर चिकित्सा सहायता, सुरक्षित प्रसव और जरूरत पड़ने पर तत्काल रेफरल की व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण होती है।
दो स्वास्थ्यकर्मियों पर गिरी निलंबन की गाज
मामले की जानकारी मिलने के बाद मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. प्रशांत कुमार सिंह ने कार्रवाई करते हुए गणेशपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में पदस्थ ग्रामीण चिकित्सा सहायक राजेश पटेल और सहायक नर्स मिडवाइफ (ANM) प्रमिला गिरी को निलंबित कर दिया।
अधिकारियों के मुताबिक, प्रारंभिक जांच में लापरवाही सामने आने के बाद यह कदम उठाया गया। हालांकि, निलंबन को अंतिम जवाबदेही नहीं माना जा सकता। घटना के समय अस्पताल में ड्यूटी किसकी थी, स्वास्थ्यकर्मियों की उपस्थिति का रिकॉर्ड क्या कहता है, आपातकालीन सहायता क्यों नहीं मिली और प्रसव के बाद महिला को कितनी जल्दी दूसरे अस्पताल पहुंचाया जा सका—इन सभी बिंदुओं की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
ग्रामीणों का आक्रोश, स्वास्थ्य केंद्र के सामने प्रदर्शन
घटना सामने आने के बाद स्थानीय ग्रामीणों में नाराजगी फैल गई। लोगों ने गणेशपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के सामने प्रदर्शन कर जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। विरोध के दौरान स्वास्थ्य केंद्र के गेट पर ताला लगाकर प्रदर्शन किए जाने की भी जानकारी सामने आई है।
ग्रामीणों का आक्रोश इस बात को लेकर है कि जब प्रसव जैसी आपात स्थिति में अस्पताल की जरूरत सबसे अधिक होती है, तब यदि स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं हों, तो लोगों का सरकारी व्यवस्था पर भरोसा कमजोर पड़ना स्वाभाविक है।
सवाल सिर्फ लापरवाही का नहीं, पूरी व्यवस्था का है
ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों का उद्देश्य केवल नियमित जांच या सामान्य बीमारियों का उपचार करना नहीं है। गर्भवती महिलाओं के लिए ये केंद्र सुरक्षित प्रसव, शुरुआती चिकित्सकीय सहायता और जरूरत पड़ने पर उच्च स्तरीय अस्पताल तक पहुंच सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
रात के समय स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता, ड्यूटी की स्पष्ट व्यवस्था, आपातकालीन संपर्क नंबर और एंबुलेंस से समन्वय जैसी सुविधाएं कागजों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। प्रसव की स्थिति तेजी से गंभीर हो सकती है, इसलिए कुछ मिनटों की देरी भी मां और बच्चे की सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है।
यदि अस्पताल में उस समय प्रसव संभालने की पर्याप्त सुविधा नहीं थी, तो भी परिजनों को तत्काल मार्गदर्शन, प्राथमिक सहायता और सुरक्षित रेफरल उपलब्ध कराने की व्यवस्था होनी चाहिए थी। जांच में यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि स्वास्थ्य केंद्र बंद क्यों था और आपात स्थिति में जिम्मेदार कर्मचारियों से संपर्क करने का कोई प्रभावी तंत्र मौजूद था या नहीं।
आगे क्या होना चाहिए?
इस मामले में जवाबदेही तय करने के साथ-साथ प्रशासन को ऐसे कदम उठाने की जरूरत है, जिनसे भविष्य में किसी अन्य परिवार को ऐसी परिस्थिति का सामना न करना पड़े।
- रात की ड्यूटी की जांच: संबंधित कर्मचारियों की उपस्थिति और ड्यूटी रोस्टर का सत्यापन किया जाए।
- आपातकालीन सेवाओं की समीक्षा: प्रसव पीड़ा के मामलों में तत्काल सहायता और रेफरल की व्यवस्था सुनिश्चित हो।
- स्वास्थ्य केंद्रों का नियमित निरीक्षण: अधिकारियों द्वारा रात के समय भी औचक निरीक्षण किए जाएं।
- शिकायत और संपर्क व्यवस्था: अस्पताल के बाहर आपातकालीन नंबर और वैकल्पिक सहायता केंद्र की जानकारी स्पष्ट रूप से प्रदर्शित हो।
- जांच में पारदर्शिता: घटना के कारणों और जिम्मेदारी से जुड़े निष्कर्षों को उचित प्रक्रिया के तहत सामने लाया जाए।
जवाबदेही तय होने से ही लौटेगा भरोसा
सूरजपुर की यह घटना याद दिलाती है कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की सफलता केवल अस्पताल भवन, उपकरण या कर्मचारियों की स्वीकृत संख्या से नहीं मापी जा सकती। असली कसौटी यह है कि जरूरत पड़ने पर मरीज को समय पर सहायता मिलती है या नहीं।
दो स्वास्थ्यकर्मियों का निलंबन प्रशासनिक कार्रवाई की शुरुआत है, लेकिन ग्रामीणों की चिंता का समाधान तभी होगा, जब जांच से घटना की पूरी तस्वीर सामने आए और स्वास्थ्य केंद्रों में आपातकालीन सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
नवजात की मौत और प्रसूता की गंभीर हालत ने एक परिवार को असहनीय पीड़ा दी है। अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या इस घटना से व्यवस्था में स्थायी सुधार होगा, ताकि किसी दूसरी गर्भवती महिला को मदद के लिए अस्पताल के बंद दरवाजे पर इंतजार न करना पड़े।



