Mining Growth: छत्तीसगढ़ की खनिज संपदा से खुलेगी विकास की नई राह, ₹16,738 करोड़ राजस्व के बीच आदिवासी हितों पर बड़ा जोर
छत्तीसगढ़ की पहचान लंबे समय से कोयला, लौह अयस्क, टिन और चूना पत्थर जैसे खनिज संसाधनों से रही है। अब राज्य के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन संसाधनों से अधिक राजस्व जुटाने के साथ यह सुनिश्चित करना है कि खनन का लाभ उन लोगों तक भी पहुंचे, जिनकी जमीन, जंगल और आजीविका इससे प्रभावित होती है। रायपुर में हुई उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में यही सवाल केंद्र में रहा—खनिज संपदा का उपयोग औद्योगिक विकास के साथ स्थानीय रोजगार, आदिवासी आजीविका और प्रभावित क्षेत्रों की बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने के लिए कैसे किया जाए।
3 नवंबर 2026 को मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और केंद्रीय कोयला एवं खान मंत्री जी. किशन रेड्डी की मौजूदगी में हुई बैठक में खनिज अन्वेषण, कोयला उत्पादन, महत्वपूर्ण खनिजों, खदानों के संचालन, डिजिटल निगरानी और जिला खनिज संस्थान न्यास (DMF) की राशि के उपयोग की समीक्षा की गई। बैठक में प्रस्तुत विभागीय आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2025-26 में छत्तीसगढ़ को खनिजों से 16,738 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ। यह आंकड़ा राज्य की अर्थव्यवस्था में खनन क्षेत्र के महत्व को दिखाता है, लेकिन इसके साथ संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग की जवाबदेही भी बढ़ाता है। <Cite refs={[“turn650910search0”,“turn650910search1”]}/>
16,738 करोड़ का राजस्व और विकास का असली पैमाना
खनिज राजस्व राज्य के लिए महत्वपूर्ण आर्थिक संसाधन है। इससे सरकारी आय, औद्योगिक गतिविधियों और बुनियादी ढांचे के विकास को गति मिल सकती है। लेकिन खनन से प्रभावित गांवों में रहने वाले परिवारों के लिए विकास का मतलब कुछ अलग होता है—साफ पेयजल, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, गुणवत्तापूर्ण स्कूल, रोजगार और सुरक्षित पर्यावरण।
इसीलिए खनिज राजस्व को केवल सरकारी खजाने में आने वाली राशि के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि खनन प्रभावित क्षेत्रों में इसका कितना हिस्सा और किस तरह इस्तेमाल हो रहा है। यदि किसी इलाके में खनन से आर्थिक गतिविधियां बढ़ती हैं, लेकिन वहां के लोगों को स्वास्थ्य, पानी और रोजगार जैसी सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ता है, तो विकास का लाभ समान रूप से नहीं पहुंच रहा है।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने बैठक में खनिज संसाधनों के वैज्ञानिक और जिम्मेदारीपूर्ण उपयोग के साथ स्थानीय लोगों तथा जनजातीय समुदायों को लाभ पहुंचाने पर जोर दिया। वहीं केंद्रीय मंत्री जी. किशन रेड्डी ने खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए DMF की राशि का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करने की बात कही।
DMF फंड: खनन प्रभावित परिवारों के लिए सबसे महत्वपूर्ण कड़ी
जिला खनिज संस्थान न्यास यानी DMF का उद्देश्य खनन से प्रभावित क्षेत्रों और वहां रहने वाले लोगों के जीवन स्तर में सुधार करना है। इस राशि का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, आजीविका और बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों में किया जा सकता है।
बैठक में केंद्रीय मंत्री ने विशेष रूप से कहा कि DMF की राशि स्थानीय जरूरतों के अनुसार खर्च होनी चाहिए। उन्होंने पहले नक्सल प्रभावित रहे जिलों को नियमों के तहत उपलब्ध विशेष छूट का लाभ उठाकर विकास कार्यों को आगे बढ़ाने पर भी जोर दिया।
यहां सबसे अहम सवाल खर्च की गति से ज्यादा उसकी गुणवत्ता का है। किसी जिले में कितनी राशि स्वीकृत हुई, कितनी खर्च हुई और उससे लोगों को वास्तव में क्या लाभ मिला—इन सभी बातों का सार्वजनिक मूल्यांकन होना चाहिए। उदाहरण के लिए, पेयजल परियोजना में केवल निर्माण कार्य पूरा होना पर्याप्त नहीं है; यह भी देखना होगा कि गांवों में नियमित पानी पहुंच रहा है या नहीं।
DMF परियोजनाओं की पारदर्शी निगरानी, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और काम पूरा होने के बाद उसका मूल्यांकन ही इस व्यवस्था को प्रभावी बना सकता है।
बस्तर के टिन संग्राहकों के लिए TIN पोर्टल क्यों महत्वपूर्ण है?
इस बैठक में बस्तर के जनजातीय समुदायों से टिन अयस्क की खरीदी और भुगतान के लिए विकसित TIN पोर्टल को विशेष महत्व मिला। इस व्यवस्था का उद्देश्य संग्रहण से लेकर खरीद, परिवहन, मूल्य निर्धारण और भुगतान तक की प्रक्रिया को डिजिटल बनाना है।
पोर्टल में टिन के मूल्य निर्धारण को लंदन मेटल एक्सचेंज (LME) से जोड़ा गया है। साथ ही, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर यानी DBT के माध्यम से भुगतान सीधे हितग्राहियों के बैंक खातों में भेजने की व्यवस्था की गई है। डिजिटल पंजीयन, QR कोड आधारित सत्यापन और SMS अलर्ट जैसी सुविधाएं भी इसमें शामिल हैं।
बैठक में प्रस्तुत आंकड़ों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2024-25 में 8,707 किलोग्राम से अधिक टिन अयस्क की खरीदी पर करीब 90.82 लाख रुपये का भुगतान किया गया था। 2025-26 में 20,895 किलोग्राम से अधिक अयस्क की खरीदी के लिए लगभग 3.81 करोड़ रुपये का भुगतान हुआ। यानी एक वर्ष में भुगतान की कुल राशि चार गुने से अधिक हो गई। वर्तमान में बस्तर संभाग में छह खरीदी केंद्र संचालित हैं और तीन नए केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं। <Cite refs={[“turn650910search0”,“turn650910search2”]}/>
यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि प्राकृतिक संसाधनों से होने वाली कमाई में स्थानीय संग्रहकर्ताओं की हिस्सेदारी पारदर्शी होनी चाहिए। डिजिटल भुगतान से बिचौलियों की भूमिका कम करने और लेनदेन का रिकॉर्ड रखने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इस व्यवस्था की सफलता का आकलन केवल भुगतान की कुल राशि से नहीं, बल्कि प्रति संग्राहक मिलने वाले वास्तविक मूल्य, भुगतान की नियमितता और अधिक से अधिक पात्र परिवारों की भागीदारी से भी होना चाहिए।
लिथियम, ग्रेफाइट और दुर्लभ खनिजों पर बढ़ेगा ध्यान
बैठक में लिथियम, ग्रेफाइट, दुर्लभ मृदा तत्व, वैनेडियम, गैलियम, फॉस्फोराइट और टिन जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के अन्वेषण पर जोर दिया गया। आधुनिक तकनीक, बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और ऊर्जा से जुड़े उद्योगों में इन संसाधनों की उपयोगिता बढ़ रही है।
भारत के लिए इन खनिजों की घरेलू उपलब्धता और प्रसंस्करण क्षमता मजबूत करना रणनीतिक महत्व रखता है। यदि देश में खोज, उत्पादन और मूल्य संवर्धन की क्षमता बढ़ती है, तो आयात पर निर्भरता कम करने और खनिज आधारित उद्योगों को प्रोत्साहन देने में मदद मिल सकती है।
छत्तीसगढ़ के लिए यह एक आर्थिक अवसर है। लेकिन केवल खनिज भंडार की पहचान कर लेना पर्याप्त नहीं होगा। वैज्ञानिक अन्वेषण, तकनीकी विशेषज्ञता, पर्यावरणीय मंजूरी, स्थानीय समुदायों की सहमति और प्रसंस्करण उद्योगों का विकास भी जरूरी है। राज्य में खनिज आधारित उद्योग स्थापित होते हैं तो स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार और कौशल विकास के अवसर पैदा हो सकते हैं।
डिजिटल निगरानी से अवैध खनन पर नियंत्रण की उम्मीद
खनन क्षेत्र में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए राज्य सरकार ने खनिज ऑनलाइन 2.0, DMF पोर्टल 2.0, ड्रोन आधारित निगरानी और खनिज परिवहन की डिजिटल मॉनिटरिंग जैसी व्यवस्थाओं की जानकारी दी। खनन गतिविधियों की स्टार रेटिंग और तकनीक आधारित निरीक्षण को भी प्रशासनिक सुधारों का हिस्सा बताया गया।
इन तकनीकों का सही इस्तेमाल होने पर खनिज परिवहन, उत्पादन और अनुमति संबंधी रिकॉर्ड की निगरानी बेहतर हो सकती है। ड्रोन से दूरस्थ क्षेत्रों में गतिविधियों पर नजर रखने और डिजिटल डेटा से संदिग्ध परिवहन की पहचान करने में सहायता मिल सकती है।
हालांकि, तकनीक तभी प्रभावी होगी जब निगरानी से मिली जानकारी पर समयबद्ध कार्रवाई भी हो। अवैध खनन की शिकायतों, जांच के निष्कर्षों और कार्रवाई का विवरण सार्वजनिक किया जाना चाहिए। इससे व्यवस्था पर लोगों का भरोसा बढ़ेगा और जवाबदेही तय करना आसान होगा।
खदान बंद होने के बाद जमीन का क्या होगा?
बैठक का एक महत्वपूर्ण विषय उन खदानों का वैज्ञानिक तरीके से समापन भी रहा, जहां खनन पूरा हो चुका है। केंद्रीय मंत्री ने ऐसी खदानों के लिए व्यवस्थित माइन क्लोजर और भूमि के बेहतर पुनः उपयोग की कार्ययोजना बनाने पर जोर दिया।
खनन समाप्त होने के बाद जमीन को छोड़ देना पर्यावरण और स्थानीय समुदायों के लिए लंबे समय तक समस्या पैदा कर सकता है। इसलिए भूमि पुनर्स्थापन, जल स्रोतों की सुरक्षा, हरित क्षेत्र का विकास और भविष्य में जमीन के उपयोग की योजना खनन प्रक्रिया का जरूरी हिस्सा होनी चाहिए।
खनन परियोजनाओं का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उनसे कितना उत्पादन या राजस्व मिला। यह भी देखा जाना चाहिए कि खनन के बाद उस क्षेत्र की पर्यावरणीय स्थिति कैसी है और स्थानीय लोगों के लिए जमीन का उपयोग किस तरह संभव बनाया गया है।
कोयला उत्पादन के साथ पर्यावरणीय जिम्मेदारी भी जरूरी
बैठक में चालू और गैर-संचालित कोयला ब्लॉकों, उत्पादन क्षमता, वैधानिक मंजूरियों और परिचालन संबंधी बाधाओं की समीक्षा हुई। साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) के साथ अलग से हुई बैठक में भी उत्पादन और परियोजनाओं से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की गई।
कोयला देश की ऊर्जा जरूरतों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, लेकिन इसके उत्पादन और उपयोग के साथ पर्यावरणीय प्रभावों को कम करने की चुनौती भी जुड़ी है। इसलिए उत्पादन बढ़ाने की योजनाओं के साथ सुरक्षा मानकों, प्रदूषण नियंत्रण, भूमि पुनर्स्थापन और प्रभावित परिवारों के हितों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
छत्तीसगढ़ के लिए अगली चुनौती: खनिज संपदा का लाभ जमीन तक पहुंचे
खनिज राजस्व, डिजिटल पोर्टल, महत्वपूर्ण खनिजों की खोज और आदिवासी टिन संग्राहकों को भुगतान जैसी पहलें राज्य के खनन क्षेत्र में बदलाव की संभावनाएं दिखाती हैं। लेकिन इनका वास्तविक परिणाम आने वाले समय में सामने आएगा।
राज्य के सामने अब कुछ स्पष्ट प्राथमिकताएं हैं—DMF राशि का स्थानीय जरूरतों के अनुसार उपयोग, खनन प्रभावित परिवारों के लिए रोजगार, आदिवासी संग्राहकों को उचित मूल्य, खनन गतिविधियों की पारदर्शी निगरानी और बंद खदानों का वैज्ञानिक पुनर्वास।
छत्तीसगढ़ खनिज विकास की असली सफलता केवल बढ़ते राजस्व या उत्पादन से तय नहीं होगी। उसका पैमाना यह होगा कि खनिज संपदा से प्रभावित गांवों में जीवन कितना बेहतर हुआ, स्थानीय युवाओं को कितने अवसर मिले और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग भविष्य की पीढ़ियों के हितों को ध्यान में रखकर कितना जिम्मेदारी से किया गया।




