छत्तीसगढ़ में महिला सशक्तिकरण पर सरकार का फोकस, 68 लाख महिलाओं को आर्थिक संबल से लेकर 13.85 लाख लखपति दीदियों तक
रायपुर,। छत्तीसगढ़ में तीज मिलन का पारंपरिक आयोजन इस बार महिला सम्मान और आर्थिक सशक्तिकरण से जुड़े सरकारी प्रयासों को सामने रखने का मंच भी बना। राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा के रायपुर स्थित निवास पर आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने माताओं-बहनों से मुलाकात की और कहा कि महिलाओं का सम्मान, सुरक्षा तथा आर्थिक आत्मनिर्भरता सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है।
समारोह की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के बीच मुख्यमंत्री ने महिलाओं से जुड़ी योजनाओं और प्रदेश के विकास की दिशा पर भी बात की। खास तौर पर महतारी वंदन योजना और लखपति दीदी के आंकड़ों को महिला सशक्तिकरण के प्रमुख संकेतकों के रूप में प्रस्तुत किया गया।
आर्थिक सहायता से आगे आत्मनिर्भरता पर जोर
मुख्यमंत्री के अनुसार, महतारी वंदन योजना के तहत प्रदेश की 68 लाख से अधिक महिलाओं को हर महीने 1,000 रुपये सीधे बैंक खातों में दिए जा रहे हैं। सरकार के मुताबिक अब तक 31 किस्तों में 20 हजार करोड़ रुपये से अधिक की राशि हितग्राही महिलाओं तक पहुंचाई जा चुकी है।

इस तरह की प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता का महत्व केवल रकम तक सीमित नहीं है। नियमित राशि महिलाओं को घरेलू खर्च, बच्चों की जरूरतों, बचत या छोटे स्तर के आर्थिक कामों में अपने स्तर पर निर्णय लेने का अवसर दे सकती है। हालांकि, महिला सशक्तिकरण का दीर्घकालिक प्रभाव तभी मजबूत होगा जब नियमित सहायता के साथ कौशल, बाजार, बैंकिंग और रोजगार के अवसर भी जुड़ें।
यही कारण है कि सरकार अब 13.85 लाख महिलाओं के लखपति दीदी बनने को भी अपनी महिला-केंद्रित विकास नीति की उपलब्धि के रूप में सामने रख रही है। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाएं छोटे कारोबार, उत्पादन और अन्य आजीविका गतिविधियों से जुड़ रही हैं।
‘लखपति दीदी’ मॉडल में असली चुनौती बाजार तक पहुंच
महिलाओं की आय बढ़ना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन किसी भी स्वरोजगार मॉडल की स्थिरता केवल शुरुआत करने से तय नहीं होती। उत्पाद तैयार होने के बाद बाजार, उचित मूल्य, प्रशिक्षण, डिजिटल भुगतान, ब्रांडिंग और नियमित ग्राहक मिलना उतना ही जरूरी है।
इसलिए आने वाले समय में स्वयं सहायता समूहों को स्थानीय बाजार से आगे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, पर्यटन और बड़े खरीदारों से जोड़ना महिला उद्यमिता को अधिक टिकाऊ बना सकता है। खासकर छत्तीसगढ़ की हस्तशिल्प, वनोपज, खाद्य प्रसंस्करण और पारंपरिक उत्पादों में स्थानीय महिलाओं के लिए व्यापक आर्थिक अवसर बन सकते हैं।
650 करोड़ की फिल्म सिटी से संस्कृति को आर्थिक अवसर
कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ की लोककला और सांस्कृतिक पहचान को भी विकास से जोड़ा गया। मुख्यमंत्री ने बताया कि करीब 650 करोड़ रुपये की लागत से फिल्म सिटी तैयार की जा रही है।

फिल्म निर्माण के लिए आधारभूत ढांचा विकसित होने पर इसका असर केवल मनोरंजन उद्योग तक सीमित नहीं रह सकता। स्थानीय कलाकारों के अलावा कैमरा, मेकअप, सेट डिजाइन, तकनीकी सहायता, परिवहन, होटल, खान-पान और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में भी काम के अवसर बन सकते हैं।
छत्तीसगढ़ की लोककला, लोकगीत और लोकनृत्य को फिल्मों तथा डिजिटल माध्यमों के जरिए व्यापक दर्शक मिलना भी राज्य की सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। इसके लिए स्थानीय प्रतिभाओं को प्रशिक्षण और वास्तविक प्रोजेक्ट से जोड़ना अगला अहम कदम होगा।
तीज मिलन में कलाकारों का सम्मान
समारोह में छत्तीसगढ़ की लोक कला और संस्कृति के क्षेत्र में योगदान देने वाले कलाकारों को सम्मानित किया गया। राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा ने छत्तीसगढ़ी लोकगीत की प्रस्तुति भी दी, जिससे आयोजन का सांस्कृतिक पक्ष और मजबूत हुआ।
ऐसे आयोजन पारंपरिक त्योहारों को केवल धार्मिक या सामाजिक अवसर के रूप में नहीं, बल्कि स्थानीय कला और कलाकारों को मंच देने के माध्यम के रूप में भी सामने लाते हैं।
विकास के साथ सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं का मुद्दा
मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में सड़क, बिजली, पेयजल, खाद्य सुरक्षा और आवास जैसी बुनियादी सुविधाओं के विस्तार का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं के जरिए गरीब, किसान, महिला और युवाओं को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
साथ ही मुख्यमंत्री ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा अभियानों के बाद बन रहे नए विकास अवसरों का जिक्र किया। उनका कहना था कि जिन क्षेत्रों में पहले हिंसा और भय विकास में बाधा थे, वहां अब शांति और विश्वास के साथ विकास गतिविधियों को आगे बढ़ाने की कोशिश हो रही है।
महिला सशक्तिकरण की अगली कसौटी क्या होगी?
छत्तीसगढ़ में महिला-केंद्रित योजनाओं का अगला चरण केवल लाभार्थियों की संख्या बढ़ाने से तय नहीं होगा। असली बदलाव इस बात से मापा जाएगा कि कितनी महिलाएं नियमित आय अर्जित कर रही हैं, कितने स्वयं सहायता समूह टिकाऊ कारोबार में बदल रहे हैं और कितनी महिलाएं परिवार के आर्थिक फैसलों में अधिक सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।



