CG Teacher News: शर्मनाक लापरवाही! सजा के 24 दिन बाद भी स्कूल में पढ़ा रहा दोषी शिक्षक, शिक्षा विभाग की भूमिका पर सवाल
बिलासपुर: सरकारी स्कूलों में बच्चों को शिक्षा देने वाले शिक्षकों से समाज जिम्मेदारी, अनुशासन और सुरक्षित वातावरण की अपेक्षा करता है। लेकिन छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में एक शिक्षक को महिला सहकर्मी से छेड़छाड़ और मारपीट के मामले में अदालत से दोषी ठहराए जाने के बाद भी उसके स्कूल में काम करते रहने का मामला सामने आया है। इस घटनाक्रम ने शिक्षा विभाग की निगरानी व्यवस्था और न्यायालय के फैसलों पर समय रहते कार्रवाई करने की प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
तखतपुर न्यायालय ने 26 सितंबर 2026 को शिक्षक विवेक गुप्ता को भारतीय दंड संहिता की दो धाराओं के तहत दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। इसके बावजूद 24 दिन बाद भी उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जानकारी सामने नहीं आई। स्कूल के प्रधान पाठक के मुताबिक, शिक्षक 16 अक्टूबर को भी विद्यालय में उपस्थित था।
मामले का सबसे अहम पहलू यह है कि जिला शिक्षा अधिकारी संदीप पांडेय ने शिक्षक को सजा सुनाए जाने की जानकारी नहीं होने की बात कही है। उन्होंने न्यायालय के आदेश के विभाग तक नहीं पहुंचने के संबंध में जानकारी लेकर प्राथमिकता से कार्रवाई करने की बात कही है।
अदालत की सजा के बाद भी नौकरी जारी, व्यवस्था पर उठे सवाल
इस मामले में सवाल केवल एक कर्मचारी के स्कूल में काम करते रहने का नहीं है। यह भी महत्वपूर्ण है कि किसी सरकारी कर्मचारी को आपराधिक मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद संबंधित विभाग तक सूचना पहुंचाने और सेवा नियमों के तहत आगे की प्रक्रिया शुरू करने का तंत्र कितनी प्रभावी तरीके से काम करता है।
न्यायालय का फैसला और विभागीय कार्रवाई दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। अदालत आपराधिक आरोपों पर निर्णय देती है, जबकि संबंधित विभाग लागू सेवा नियमों और निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर कर्मचारी की सेवा से जुड़े परिणामों पर फैसला करता है।
ऐसे मामलों में आदेश की प्रति, दोषसिद्धि का सत्यापन और सक्षम अधिकारी के स्तर पर कार्रवाई की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होती है। यदि सूचना पहुंचने में देरी होती है, तो जवाबदेही तय करने और भविष्य में ऐसी स्थिति रोकने के लिए प्रशासनिक व्यवस्था की समीक्षा जरूरी हो जाती है।
हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि विभाग ने जानबूझकर कार्रवाई रोकी या संबंधित शिक्षक ने सजा की जानकारी छिपाई। इन दोनों पहलुओं की पुष्टि जांच और दस्तावेजों से ही हो सकती है।
2018 की घटना में अदालत ने किन आरोपों को सही माना?
अभियोजन के अनुसार, घटना 17 फरवरी 2018 को शासकीय प्राथमिक शाला चनाडोंगरी में हुई थी। वहां पदस्थ महिला शिक्षिका ने आरोप लगाया था कि शिक्षक ने उनका हाथ पकड़कर खींचा, उनके सीने पर हाथ लगाया और उनके चरित्र को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां कीं। शिकायत के अनुसार, विरोध करने पर उनके साथ मारपीट की गई, जिससे चेहरे और सिर पर चोटें आईं।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पीड़िता की गवाही, अन्य गवाहों के बयान और चिकित्सकीय साक्ष्यों पर विचार किया। न्यायालय ने छेड़छाड़ और मारपीट के आरोप प्रमाणित पाए।
न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी ऋचा यादव की अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के तहत एक वर्ष के सश्रम कारावास और एक हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। धारा 323 के तहत भी एक हजार रुपये जुर्माना लगाया गया। जुर्माना नहीं चुकाने की स्थिति में संबंधित आदेश के अनुसार प्रत्येक धारा के लिए एक-एक महीने का अतिरिक्त सश्रम कारावास निर्धारित किया गया।
दूसरी ओर, पीछा करने, अश्लील गाली-गलौज और आपराधिक धमकी से जुड़े आरोपों में पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने के कारण अदालत ने संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त किया। इसलिए मामले को समझते समय अदालत द्वारा प्रमाणित आरोपों और जिन आरोपों में दोषमुक्ति मिली, उनके बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।
अदालत ने 7 अगस्त से 9 अक्टूबर 2018 तक न्यायिक अभिरक्षा में बिताई गई अवधि को सजा में समायोजित करने का निर्देश भी दिया था।
दोषसिद्धि के बाद विभाग को क्या करना चाहिए?
सरकारी कर्मचारी के खिलाफ आपराधिक मामले में दोषसिद्धि होने पर संबंधित सेवा नियम महत्वपूर्ण हो जाते हैं। अधिवक्ता अनुराग वाजपेयी के अनुसार, छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1966 के नियम 19 के तहत दोषसिद्धि के आधार पर विभागीय दंड की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर मामले में बिना किसी परीक्षण के स्वतः बर्खास्तगी हो जाती है। संबंधित नियमों, दोषसिद्धि की प्रकृति, लागू कानूनी प्रावधानों और सक्षम प्राधिकारी के निर्णय के अनुसार कार्रवाई निर्धारित होती है।
इस प्रकरण में विभाग के सामने सबसे पहले कुछ बुनियादी सवालों का जवाब तलाशना जरूरी है:
- क्या न्यायालय के फैसले की प्रमाणित प्रति शिक्षा विभाग को प्राप्त हुई थी?
- यदि आदेश प्राप्त नहीं हुआ, तो सूचना संबंधित विभाग तक पहुंचाने की प्रक्रिया में देरी कहां हुई?
- क्या शिक्षक ने विभाग को अपनी दोषसिद्धि के बारे में कोई जानकारी दी थी?
- लागू सेवा नियमों के अनुसार अब कौन-सी कार्रवाई और किस अधिकारी के स्तर पर की जानी है?
इन सवालों के जवाब सामने आने पर ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि देरी का कारण प्रशासनिक चूक है, सूचना के आदान-प्रदान में समस्या है या किसी स्तर पर नियमों का पालन नहीं किया गया।
क्या सजा की जानकारी छिपाने पर अलग कार्रवाई हो सकती है?
मामले में यह भी जांच का विषय है कि संबंधित शिक्षक ने अपनी दोषसिद्धि की जानकारी विभाग को दी थी या नहीं। स्कूल के प्रधान पाठक संजय कुमार विश्वकर्मा के अनुसार, शिक्षक ने उन्हें अदालत से सजा मिलने की जानकारी नहीं दी थी और वह 16 अक्टूबर को भी स्कूल में उपस्थित था।
लेकिन प्रधान पाठक को जानकारी नहीं देना और विभाग से जानबूझकर तथ्य छिपाना कानूनी रूप से एक जैसी बातें नहीं हैं। किसी अलग आपराधिक कार्रवाई पर विचार करने से पहले यह साबित करना होगा कि संबंधित कर्मचारी पर लागू नियमों के तहत जानकारी देना आवश्यक था और उसने जानबूझकर ऐसा नहीं किया।
यदि जांच में जानबूझकर तथ्य छिपाने या किसी अन्य कानूनी उल्लंघन के पर्याप्त आधार मिलते हैं, तो सक्षम अधिकारी लागू कानून के अनुसार कार्रवाई पर विचार कर सकते हैं। केवल उपलब्ध आरोपों के आधार पर किसी अतिरिक्त अपराध को पहले से सिद्ध मानना उचित नहीं होगा।
महिला कर्मचारियों की सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल
यह मामला सरकारी स्कूलों में कार्यरत महिला कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर भी महत्वपूर्ण है। किसी संस्थान में सुरक्षित कार्यस्थल केवल शिकायत दर्ज करने की व्यवस्था से नहीं बनता। इसके लिए शिकायतों की निष्पक्ष जांच, न्यायिक फैसलों के बाद आवश्यक कार्रवाई और प्रशासनिक स्तर पर स्पष्ट जवाबदेही भी जरूरी है।
यदि किसी कर्मचारी को अदालत दोषी ठहराती है, तो विभाग को मामले की प्रकृति और लागू सेवा नियमों के अनुसार समय पर निर्णय लेना चाहिए। साथ ही, कार्रवाई का आधार दस्तावेजों और निर्धारित प्रक्रिया पर होना चाहिए, न कि केवल मीडिया रिपोर्ट या मौखिक जानकारी पर।
इस प्रकरण में यह देखना भी जरूरी होगा कि जिला शिक्षा कार्यालय, संबंधित विद्यालय और न्यायालय के बीच सूचना के आदान-प्रदान की व्यवस्था कैसे काम करती है। यदि किसी स्तर पर प्रक्रियागत कमी सामने आती है, तो उसे दूर करने के लिए स्पष्ट समयसीमा और जिम्मेदारी तय करना उपयोगी हो सकता है।
अब आगे क्या हो सकता है?
जिला शिक्षा अधिकारी ने मामले की जानकारी लेकर प्राथमिकता से कार्रवाई करने की बात कही है। अब आगे की प्रक्रिया में न्यायालय के आदेश की पुष्टि, विभागीय अभिलेखों की जांच और संबंधित सेवा नियमों के तहत उचित निर्णय महत्वपूर्ण होंगे।
जांच के निष्कर्षों के आधार पर विभाग तय कर सकता है कि कौन-सी कार्रवाई लागू होती है और सूचना के स्तर पर किसी अधिकारी या कर्मचारी की जवाबदेही बनती है या नहीं।
फिलहाल इस मामले का सबसे बड़ा सवाल यही है कि अदालत से दोषसिद्धि के बाद भी विभागीय कार्रवाई में देरी क्यों हुई। इसका जवाब केवल संबंधित शिक्षक के विरुद्ध कार्रवाई तक सीमित नहीं होना चाहिए। प्रशासन को यह भी स्पष्ट करना होगा कि न्यायिक फैसलों की जानकारी समय पर संबंधित विभाग तक पहुंचाने और उन पर नियमों के अनुसार निर्णय लेने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है। सरकारी संस्थानों में कानून का सम्मान तभी सुनिश्चित होता है, जब न्यायालय के फैसलों के बाद प्रशासनिक प्रक्रिया भी जिम्मेदारी से आगे बढ़े।




