नई दिल्ली. हार्ट सर्जरी या इलाज पूरा हो जाना दिल की बीमारी की जंग का सिर्फ पहला पड़ाव है — असली चुनौती उसके बाद मरीज को फिर से सामान्य और सक्रिय जिंदगी में लौटाने की होती है। इसी दिशा में शनिवार को वीएमएमसी और सफदरजंग अस्पताल ने एक बड़ी पहल करते हुए भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था के अनुकूल हृदय पुनर्वास के लिए मानक चिकित्सकीय दिशा-निर्देश — कार्डियक रिहैबिलिटेशन गाइडलाइन-2026 — जारी कर दिए। इसे देश में हृदय रोगियों के पुनर्वास को वैज्ञानिक और व्यवस्थित ढांचा देने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
समारोह में जुटे देश के दिग्गज विशेषज्ञ
गाइडलाइन जारी करने के इस कार्यक्रम में देशभर के वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ, चिकित्सक, शिक्षाविद, पुनर्वास विशेषज्ञ और जनस्वास्थ्य के जानकार एक मंच पर मौजूद रहे। प्रख्यात वैज्ञानिक एवं जनस्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. निर्मल कुमार गांगुली कार्यक्रम के मुख्य अतिथि रहे, जबकि डॉ. हर्ष वर्धन और डॉ. विजय मोहन कोहली विशिष्ट अतिथि के तौर पर शामिल हुए। गाइडलाइन विकास समिति के अध्यक्ष डॉ. राकेश कुमार श्रीवास्तव, वीएमएमसी एवं सफदरजंग अस्पताल की निदेशक डॉ. कविता रानी शर्मा और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्रीय कार्यालय की क्षेत्रीय सलाहकार डॉ. ताशी तोबगे भी इस मौके पर उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक दीप प्रज्ज्वलन और स्वागत संबोधन से हुई, जिसके बाद विशेषज्ञों के बीच वैज्ञानिक चर्चा हुई।
सिर्फ शरीर नहीं, पूरी जिंदगी का पुनर्वास
वीएमएमसी एवं सफदरजंग अस्पताल के शारीरिक चिकित्सा एवं पुनर्वास विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. अजय गुप्ता ने कार्डियक रिहैबिलिटेशन के महत्व पर विस्तार से बात रखी। उनके मुताबिक, व्यापक हृदय पुनर्वास का मकसद सिर्फ मरीज की शारीरिक क्षमता वापस लाना भर नहीं है, बल्कि इसमें मरीज की रोजमर्रा की कार्यक्षमता बहाल करना, स्थायी रूप से बेहतर जीवनशैली अपनाना और जीवन की समग्र गुणवत्ता बढ़ाना भी शामिल है। WHO की प्रतिनिधि डॉ. ताशी तोबगे ने भी स्वास्थ्य व्यवस्था के भीतर पुनर्वास सेवाओं को मजबूत करने की जरूरत बताई। उनका कहना था कि व्यवस्थित पुनर्वास सेवाएं मरीजों के दीर्घकालिक स्वास्थ्य परिणामों को बेहतर बनाने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं।
भारत की जमीनी हकीकत के हिसाब से बनी गाइडलाइन
गाइडलाइन की मुख्य विकासकर्ता और प्रोफेसर डॉ. सुमन बादल ने इसे तैयार करने की प्रक्रिया और इसकी खासियतों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि दिशा-निर्देश बनाते समय देश के अलग-अलग हिस्सों में स्वास्थ्य सुविधाओं, चिकित्सकीय मानव संसाधन, बुनियादी ढांचे तथा मरीजों की जागरूकता और सेवाओं तक पहुंच में मौजूद असमानताओं को खास तौर पर ध्यान में रखा गया है।
गाइडलाइन में हृदय रोग विशेषज्ञों के साथ-साथ फिजिकल मेडिसिन एवं रिहैबिलिटेशन विशेषज्ञ, फिजियोथेरेपिस्ट, आहार विशेषज्ञ, मनोवैज्ञानिक और नर्स जैसे कई स्वास्थ्यकर्मियों की संयुक्त भूमिका को अहम माना गया है। इसके चार प्रमुख स्तंभ हैं —
- मरीज के जोखिम का सही आकलन
- हर मरीज के अनुसार अलग व्यायाम योजना
- खान-पान और जीवनशैली में जरूरी बदलाव
- मानसिक-सामाजिक सहयोग और बीमारी की दोबारा रोकथाम
मानक गाइडलाइन से आएगी इलाज में एकरूपता
गाइडलाइन विकास समिति के अध्यक्ष डॉ. राकेश कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि भारत को अपनी परिस्थितियों के अनुकूल व्यवस्थित और व्यापक हृदय पुनर्वास प्रणाली की सख्त जरूरत है। उनके अनुसार, मानक दिशा-निर्देश आने से देशभर में पुनर्वास सेवाओं में एकरूपता आएगी और इन्हें मुख्यधारा की हृदय चिकित्सा व्यवस्था के साथ बेहतर ढंग से जोड़ा जा सकेगा।
वीएमएमसी एवं सफदरजंग अस्पताल की निदेशक डॉ. कविता रानी शर्मा ने इस पहल का स्वागत करते हुए कहा कि किसी भी वैज्ञानिक प्रगति का असली मकसद मरीजों की देखभाल में ठोस सुधार लाना होना चाहिए। उन्होंने प्रमाण-आधारित और मरीज-केंद्रित स्वास्थ्य व्यवस्था को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता भी दोहराई।
मुख्य अतिथि की राय: बढ़ते हृदय रोग के बीच जरूरी पहल
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. निर्मल कुमार गांगुली ने देश में लगातार बढ़ते हृदय रोगों के बोझ का जिक्र करते हुए सुलभ और व्यवस्थित पुनर्वास सेवाओं की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि यह गाइडलाइन भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक जरूरतों और उपलब्ध संसाधनों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है, जो इसे और भी व्यावहारिक बनाती है।
कार्यक्रम में डीजीएचएस (डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ हेल्थ सर्विसेज) और आईसीएमआर (इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च) के प्रतिनिधियों के अलावा देशभर से आए वरिष्ठ चिकित्सक, हृदय रोग विशेषज्ञ, शिक्षाविद, फिजियाट्रिस्ट और पुनर्वास विशेषज्ञ भी मौजूद रहे।
निष्कर्ष
कार्डियक रिहैबिलिटेशन गाइडलाइन-2026 का संदेश साफ है — दिल की बीमारी को हराना सिर्फ शुरुआत है, असली लक्ष्य मरीज को दोबारा स्वस्थ, सक्रिय और बेहतर जिंदगी की राह पर लाना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल आने वाले समय में देशभर के अस्पतालों में हृदय पुनर्वास सेवाओं को एक समान, वैज्ञानिक और मरीज-केंद्रित बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकती है।



