Bastar Dussehra: 600 साल पुरानी परंपरा का भव्य आगाज, फूल रथ टूटने से मचा बवाल
जगदलपुर। बस्तर की सांस्कृतिक पहचान और आदिवासी आस्था का सबसे बड़ा पर्व बस्तर दशहरा एक बार फिर अपनी ऐतिहासिक परंपराओं के साथ चर्चा में है। मां दंतेश्वरी की पावन डोली दंतेवाड़ा से जगदलपुर के लिए रवाना हो चुकी है। सोमवार को जिया डेरा में डोली के भव्य स्वागत की तैयारी है। दूसरी ओर, दशहरा की फूल रथ परिक्रमा के दौरान रथ का पहिया और मुख्य लकड़ी टूटने से विवाद की स्थिति बन गई। रथ को आगे बढ़ाने के लिए जेसीबी के इस्तेमाल की कोशिश ने ग्रामीणों की नाराजगी बढ़ा दी और सीरहासार चौक पर तनाव पैदा हो गया।
मां दंतेश्वरी की डोली के साथ आगे बढ़ी सदियों पुरानी आस्था
बस्तर दशहरा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि स्थानीय समाज की सांस्कृतिक स्मृति और सामुदायिक एकजुटता का प्रतीक है। करीब 600 साल पुरानी परंपरा के तहत मां दंतेश्वरी की डोली और छत्र को रविवार, अष्टमी के दिन दंतेवाड़ा मंदिर से जगदलपुर के लिए रवाना किया गया।
डोली को जिया परिवार और पुजारियों ने कंधों पर उठाया। मां के दर्शन के लिए डंकिनी पुल तक बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। इसके बाद डोली को विशेष वाहन से लगभग 80 किलोमीटर दूर जगदलपुर भेजा गया। सोमवार सुबह जिया डेरा पहुंचने पर उसके भव्य स्वागत की तैयारी है।
इस यात्रा का महत्व केवल डोली के एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने में नहीं है। यह बस्तर के उन पारंपरिक संबंधों को भी सामने लाती है, जिनमें देवी की आराधना, स्थानीय परिवारों की भूमिका और सामुदायिक सहभागिता एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।
फूल रथ टूटने से क्यों बढ़ा विवाद?
बस्तर दशहरा की फूल रथ परिक्रमा के दौरान रविवार को उस समय परेशानी खड़ी हो गई, जब रथ का एक पहिया और ढांचे की मुख्य लकड़ी टूट गई। इसके कारण परिक्रमा शुरू करने में देरी हुई। रथ को ठीक करने के प्रयास किए गए, लेकिन पहिया दोबारा नहीं जोड़ा जा सका।
इसके बाद प्रशासन ने जेसीबी की सहायता से रथ को परिक्रमा मार्ग पर आगे बढ़ाने की कोशिश की। रथ खींचने के लिए पहुंचे ग्रामीणों ने इस कदम पर नाराजगी जताई। उनके लिए रथ केवल एक भारी लकड़ी का ढांचा नहीं, बल्कि परंपरा, आस्था और सामूहिक भागीदारी से जुड़ा आयोजन है।
सीरहासार चौक पर प्रशासन और पुलिस ने लोगों को समझाने का प्रयास किया, लेकिन विवाद बढ़ गया। इसी दौरान भीड़ के बीच ट्रैफिक डीएसपी अचानक गिर पड़े। स्थिति बिगड़ने पर पुलिस ने हल्का बल प्रयोग किया।
घटना ने यह सवाल खड़ा किया है कि परंपरागत धार्मिक आयोजनों में तकनीकी समस्या आने पर समाधान किस तरह निकाला जाए, ताकि व्यवस्था भी बनी रहे और श्रद्धालुओं की भावनाओं का भी सम्मान हो।
बस्तर दशहरा में रथ की भूमिका इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?
देश के कई हिस्सों में दशहरा पर्व रावण दहन और भगवान राम से जुड़ी परंपराओं के लिए जाना जाता है। लेकिन बस्तर दशहरा की अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान है। यहां उत्सव का केंद्र स्थानीय देवी परंपराएं, आदिवासी रीति-रिवाज और पीढ़ियों से चली आ रही सामुदायिक रस्में हैं।
फूल रथ की परिक्रमा इसी विशिष्ट परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसमें ग्रामीणों की भागीदारी केवल दर्शक के रूप में नहीं, बल्कि आयोजन को आगे बढ़ाने वाले सहभागी के रूप में होती है। यही वजह है कि रथ संचालन से जुड़ा कोई निर्णय सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई से कहीं अधिक संवेदनशील हो सकता है।
ऐसे आयोजनों में सुरक्षा और समय प्रबंधन जरूरी हैं, लेकिन परंपरा के जानकारों, रथ निर्माण से जुड़े लोगों और आयोजन में सक्रिय समुदायों की राय भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
प्रशासन के सामने व्यवस्था और आस्था के बीच संतुलन की चुनौती
रथ का पहिया टूटने जैसी तकनीकी समस्या किसी भी बड़े आयोजन में उत्पन्न हो सकती है। असली चुनौती यह होती है कि उसके बाद स्थिति को किस तरह संभाला जाए। भारी रथ को आगे बढ़ाने के लिए मशीनों का इस्तेमाल व्यावहारिक विकल्प लग सकता है, लेकिन धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भ में उसके स्वीकार्य होने पर पहले विचार करना आवश्यक है।
भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचने के लिए रथ की परिक्रमा से पहले उसके पहियों, धुरी, मुख्य लकड़ी और अन्य संरचनात्मक हिस्सों की विशेषज्ञों से जांच कराई जा सकती है। वैकल्पिक मरम्मत व्यवस्था, प्रशिक्षित तकनीकी दल और आपातकालीन योजना भी तैयार रहनी चाहिए।
इसके साथ ही, प्रशासन को स्थानीय परंपराओं से जुड़े प्रतिनिधियों के साथ पहले से संवाद करना चाहिए, ताकि आपात स्थिति में फैसले अचानक और एकतरफा महसूस न हों। स्पष्ट संवाद तनाव कम करने और भीड़ प्रबंधन को प्रभावी बनाने में मदद कर सकता है।
बस्तर की पहचान को बचाने की जिम्मेदारी सबकी
मां दंतेश्वरी की डोली का जगदलपुर पहुंचना और फूल रथ की परिक्रमा से जुड़ा विवाद एक ही आयोजन के दो अलग पहलू सामने लाते हैं। एक ओर सदियों से चली आ रही आस्था और परंपरा है, तो दूसरी ओर इतने बड़े आयोजन को सुरक्षित और व्यवस्थित ढंग से संचालित करने की चुनौती।
बस्तर दशहरा की असली ताकत उसकी ऐतिहासिक विरासत के साथ लोगों की सक्रिय भागीदारी में है। इसलिए इस पर्व को सुरक्षित बनाए रखने का अर्थ केवल भीड़ नियंत्रित करना या कार्यक्रम समय पर पूरा कराना नहीं है। इसका अर्थ उन सांस्कृतिक प्रक्रियाओं का सम्मान करना भी है, जिनके कारण यह उत्सव आज तक जीवित है।
आने वाले समय में आयोजन की सफलता इस बात से भी आंकी जाएगी कि परंपरा की गरिमा, श्रद्धालुओं की सुरक्षा और प्रशासनिक जिम्मेदारी के बीच कितना बेहतर तालमेल बनाया जाता है।




