छत्तीसगढ़ में CAT बेंच पर बड़ा सवाल, 25 साल बाद भी स्थायी व्यवस्था नहीं; केंद्र से 3 हफ्ते में जवाब तलब
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के 25 साल बाद भी केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) की स्थायी बेंच स्थापित नहीं होने का मुद्दा अब हाईकोर्ट में पहुंच गया है। सरकारी कर्मचारियों के सेवा संबंधी विवादों की सुनवाई के लिए स्थायी व्यवस्था की मांग पर हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। अदालत ने सक्षम अधिकारी का शपथपत्र तीन सप्ताह के भीतर पेश करने का निर्देश दिया है। अब इस मामले में केंद्र सरकार को बताना होगा कि स्थायी बेंच बनाने की दिशा में क्या कदम उठाए गए हैं और वर्तमान स्थिति क्या है।
यह मामला केवल एक न्यायिक संस्थान की स्थापना तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में उन सरकारी कर्मचारियों और अन्य पक्षकारों की परेशानी है, जिन्हें अपने सेवा संबंधी विवादों की सुनवाई के लिए छत्तीसगढ़ से बाहर जाना पड़ सकता है। यात्रा का खर्च, समय की बर्बादी और सीमित सुनवाई की उपलब्धता उनके लिए न्याय तक पहुंच को कठिन बना सकती है।
हाईकोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब, अब स्थिति स्पष्ट करने की बारी
छत्तीसगढ़ सीनियर लॉयर फोरम की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस कृष्ण राम महापात्रा और जस्टिस संतोष शर्मा की डिवीजन बेंच ने केंद्र सरकार से विस्तृत जानकारी मांगी है।
अदालत ने केवल स्थायी बेंच की मांग पर जवाब देने को नहीं कहा, बल्कि इसके लिए अब तक उठाए गए कदमों और मौजूदा स्थिति का विवरण भी शपथपत्र के माध्यम से प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
यह निर्देश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे मामले में चर्चा केवल मांग और आश्वासन तक सीमित रहने के बजाय सरकारी कार्रवाई की वास्तविक स्थिति पर केंद्रित हो सकती है। हालांकि, हाईकोर्ट के इस निर्देश का अर्थ यह नहीं है कि स्थायी बेंच स्थापित करने का अंतिम आदेश दे दिया गया है। फिलहाल केंद्र सरकार का जवाब और आगे की न्यायिक कार्यवाही महत्वपूर्ण होगी।
साल में पांच बार सुनवाई, कर्मचारियों के सामने व्यावहारिक मुश्किलें
याचिका में बताया गया है कि बिलासपुर में CAT की सर्किट बेंच साल में लगभग पांच बार आती है और प्रत्येक बार करीब एक सप्ताह तक काम करती है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, सीमित अवधि की इस व्यवस्था के कारण पक्षकारों को आवेदन संबंधी औपचारिकताओं, दस्तावेजों में सुधार और अन्य प्रक्रियाओं के लिए जबलपुर जाना पड़ता है।
यह स्थिति उन कर्मचारियों के लिए विशेष रूप से कठिन हो सकती है, जो पहले ही विभागीय विवाद, पदोन्नति, वेतन, सेवा शर्तों या अन्य प्रशासनिक मुद्दों को लेकर कानूनी प्रक्रिया से गुजर रहे हैं।
किसी कर्मचारी के लिए न्यायिक प्रक्रिया का खर्च केवल वकील की फीस तक सीमित नहीं होता। दूसरे शहर तक आने-जाने, ठहरने, काम से छुट्टी लेने और बार-बार दस्तावेजों की प्रक्रिया पूरी करने का खर्च भी जुड़ता है। यदि किसी मामले में कई बार उपस्थित होना पड़े, तो आर्थिक और व्यक्तिगत दबाव बढ़ सकता है।
याचिका के अनुसार, सीमित अवधि में सुनवाई के बाद मामलों की ऑनलाइन सुनवाई भी होती है। डिजिटल सुनवाई से दूरी की समस्या कुछ हद तक कम हो सकती है, लेकिन दस्तावेजों की कमियां दूर करने, आवेदन की औपचारिकताएं पूरी करने और अन्य प्रक्रियाओं के लिए स्थानीय व्यवस्था का महत्व बना रहता है।
जमीन आवंटित, फिर भी स्थायी भवन का इंतजार
इस विवाद का एक अहम पहलू बुनियादी ढांचे से जुड़ा है। याचिका में कहा गया है कि बिलासपुर में CAT भवन के लिए जमीन आवंटित की जा चुकी है, लेकिन सर्किट बेंच अब भी जिला उपभोक्ता फोरम की पहली मंजिल पर स्थित एक छोटे कमरे में संचालित होती है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सीमित जगह के कारण सुनवाई और संबंधित कामकाज में परेशानी आती है।
यदि भवन के लिए जमीन उपलब्ध है, तो आगे की प्रशासनिक प्रक्रिया, संसाधनों की उपलब्धता और संस्थागत मंजूरी जैसे सवाल स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण हो जाते हैं। हालांकि, स्थायी बेंच की स्थापना के लिए जमीन होना अपने आप में पर्याप्त नहीं है। इसके लिए आवश्यक स्वीकृतियां, बजट, पदों की व्यवस्था, न्यायिक और प्रशासनिक संसाधन तथा संचालन संबंधी निर्णय भी जरूरी हो सकते हैं।
इसी कारण केंद्र सरकार से मांगी गई जानकारी इस मामले में महत्वपूर्ण है। इससे यह स्पष्ट करने में मदद मिल सकती है कि स्थायी व्यवस्था की दिशा में वास्तविक प्रगति कहां तक पहुंची है।
CAT की स्थायी बेंच क्यों जरूरी मानी जा रही है?
केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण केंद्र सरकार के कर्मचारियों और उसके अधिकार क्षेत्र में आने वाले सेवा संबंधी मामलों के निपटारे के लिए महत्वपूर्ण संस्था है। इसकी स्थानीय स्थायी बेंच होने से संबंधित पक्षकारों को सुनवाई और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के लिए अधिक नियमित व्यवस्था मिल सकती है।
छत्तीसगढ़ के संदर्भ में इस मांग के तीन प्रमुख पहलू हैं।
पहला, न्याय तक आसान पहुंच। स्थानीय स्तर पर नियमित सुनवाई होने से पक्षकारों को बार-बार दूसरे राज्य जाने की जरूरत कम हो सकती है।
दूसरा, समय और खर्च में राहत। यात्रा, ठहरने और कार्यस्थल से अनुपस्थिति पर होने वाला अतिरिक्त खर्च घटने की संभावना है।
तीसरा, मामलों के प्रबंधन में सुविधा। नियमित सुनवाई और पर्याप्त बुनियादी ढांचे से आवेदन, दस्तावेजों और सुनवाई की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित हो सकती है। इससे मामलों के निपटारे में मदद मिल सकती है, हालांकि केवल स्थायी बेंच बन जाने से तेजी की गारंटी नहीं होगी। इसके लिए पर्याप्त न्यायिक क्षमता और प्रभावी प्रशासन भी आवश्यक है।
राज्य गठन के 25 साल बाद व्यवस्था पर उठे सवाल
छत्तीसगढ़ के गठन से पहले अविभाजित मध्य प्रदेश के समय CAT की मुख्य बेंच जबलपुर में स्थापित थी। राज्य गठन के बाद भी छत्तीसगढ़ में स्थायी बेंच नहीं बनने का मुद्दा अब न्यायिक समीक्षा के दायरे में है।
इस लंबी अवधि के कारण यह सवाल उठता है कि राज्य के कर्मचारियों की जरूरतों के अनुरूप संस्थागत व्यवस्था विकसित करने में अब तक कितनी प्रगति हुई है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि मौजूदा सर्किट व्यवस्था पक्षकारों की जरूरतों को पर्याप्त रूप से पूरा नहीं कर पा रही है।
स्थायी बेंच की मांग को व्यापक प्रशासनिक दृष्टिकोण से भी देखा जाना चाहिए। सरकारी कर्मचारियों को सेवा संबंधी विवादों के समाधान के लिए सुलभ मंच उपलब्ध होना प्रशासनिक जवाबदेही और न्यायिक पहुंच, दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। विवादों का समय पर समाधान कर्मचारियों के साथ-साथ विभागीय कामकाज में भी स्पष्टता लाने में सहायक हो सकता है।
अब आगे क्या होगा?
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से उप सॉलिसिटर जनरल रमाकांत मिश्रा और अधिवक्ता अन्नपूर्णा तिवारी ने पक्ष रखा। केंद्र की ओर से सक्षम अधिकारी का शपथपत्र दाखिल करने के लिए समय मांगा गया, जिसके बाद अदालत ने तीन सप्ताह के भीतर जवाब पेश करने का निर्देश दिया।
राज्य शासन की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता शशांक ठाकुर और उप शासकीय अधिवक्ता अनुजा शर्मा उपस्थित हुए। याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से अधिवक्ता बीपी राव, विकास बाजपेयी, अरविंद सिन्हा और पूजा सिन्हा ने पैरवी की।
आगे की कार्यवाही में केंद्र सरकार का शपथपत्र महत्वपूर्ण रहेगा। उससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि स्थायी बेंच के लिए क्या कदम उठाए गए हैं, किन प्रक्रियाओं पर काम चल रहा है और किन बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है।
फिलहाल हाईकोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा है, लेकिन स्थायी बेंच की स्थापना पर अंतिम निर्णय आना बाकी है। छत्तीसगढ़ के सरकारी कर्मचारियों और अन्य संबंधित पक्षकारों की नजर अब इस बात पर रहेगी कि लंबे समय से चली आ रही मांग पर आगे क्या ठोस प्रगति होती है।



