बस्तर के लिए बड़ी राहत: नक्सल हिंसा के घाव भरने की चुनौती, दिव्यांग पीड़ितों के पुनर्वास पर सरकार का जोर
छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई की सफलता का आकलन केवल सुरक्षा अभियानों और हिंसा की घटनाओं में कमी से नहीं किया जा सकता। दशकों से संघर्ष झेल रहे इस क्षेत्र में उन लोगों की जिंदगी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जिन्होंने विस्फोटों में अपने हाथ-पैर गंवाए, अपनों को खोया या भय के कारण सामान्य जीवन से दूरी बना ली। दंतेवाड़ा में दिव्यांगजनों के लिए आयोजित सहायक उपकरण शिविर के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इसी पहलू पर जोर दिया—हिंसा समाप्त करने के साथ उसके पीड़ितों को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर देना भी सरकार की जिम्मेदारी है।
सेवा संकल्प अभियान के तहत 15 से 17 अक्टूबर तक आयोजित शिविर में दंतेवाड़ा, बीजापुर और सुकमा के कुल 768 दिव्यांगजनों को लाभ पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। इनमें दंतेवाड़ा के 509, बीजापुर के 197 और सुकमा के 62 लोग शामिल हैं। शिविर में कृत्रिम हाथ-पैर, कैलिपर्स, श्रवण यंत्र, ट्राइसाइकिल और दूसरे सहायक उपकरण उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
यह पहल इसलिए अहम है, क्योंकि संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में शांति स्थापित होने के बाद सबसे बड़ी परीक्षा यह होती है कि प्रभावित परिवारों की रोजमर्रा की जिंदगी कितनी बेहतर होती है।
कृत्रिम अंग से आगे की जरूरत: आत्मनिर्भरता और सम्मान
कार्यक्रम में सुकमा के दिव्यांग पुलिस जवान मड़काम मुन्ना ने बताया कि वर्ष 2013 में गश्त के दौरान आईईडी विस्फोट में उनका बायां पैर क्षतिग्रस्त हो गया था और उसे काटना पड़ा। अब कृत्रिम पैर मिलने से वे फिर चल पा रहे हैं। बीजापुर के धर्मारम निवासी चंद्रैया सपका ने भी बताया कि वर्ष 2012 में मछली पकड़ने जाते समय हुए विस्फोट में उन्होंने अपना दायां पैर गंवा दिया था। कृत्रिम पैर मिलने से उनकी चलने-फिरने की क्षमता में मदद मिली है। दंतेवाड़ा के अजय सोरी और कोसी पोडियाम को ट्राइसाइकिल उपलब्ध कराई गई।
ये अनुभव बताते हैं कि सहायक उपकरण किसी व्यक्ति की गतिशीलता बढ़ाने के साथ उसकी स्वतंत्रता और आत्मविश्वास लौटाने में भी मदद कर सकते हैं। लेकिन उपकरण देना पुनर्वास की शुरुआत भर है।
कृत्रिम अंग का नियमित रखरखाव, जरूरत के अनुसार उसका समायोजन, फिजियोथेरेपी, प्रशिक्षण और रोजगार तक पहुंच भी जरूरी है। यदि किसी व्यक्ति को कृत्रिम पैर तो मिल जाए, लेकिन उसके गांव तक सड़क न हो, काम के अवसर सीमित हों या नियमित चिकित्सा सहायता उपलब्ध न हो, तो उसकी स्वतंत्रता अधूरी रह सकती है।
इसलिए ऐसे शिविरों का वास्तविक प्रभाव इस बात से मापा जाना चाहिए कि लाभार्थी कुछ महीने बाद कितनी आसानी से चल-फिर पा रहे हैं, शिक्षा या काम में लौट पा रहे हैं और उन्हें आगे किस तरह की सहायता मिल रही है।
नक्सलवाद खत्म होने के दावे के बाद असली परीक्षा पुनर्वास की
अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद समाप्त करने का संकल्प लिया था और उनके अनुसार अब नक्सलवाद खत्म हो गया है। यह सरकार का दावा है; जमीनी स्थिति का स्वतंत्र आकलन सुरक्षा घटनाओं, प्रभावित इलाकों की परिस्थितियों और स्थानीय लोगों के अनुभवों के आधार पर भी जरूरी रहेगा।
हालांकि, एक बात स्पष्ट है: किसी क्षेत्र में हिंसा कम होने या सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने के बाद भी उसके सामाजिक और आर्थिक परिणाम लंबे समय तक बने रह सकते हैं। विस्फोटों में दिव्यांग हुए लोग, हिंसा में परिवार के सदस्य गंवाने वाले ग्रामीण और वर्षों तक असुरक्षा के बीच रहने वाले समुदाय तत्काल सामान्य स्थिति में नहीं लौटते।
इसीलिए पुनर्वास को सुरक्षा नीति का अलग और स्थायी हिस्सा बनाना जरूरी है। इसमें स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, आजीविका, मनोसामाजिक सहायता और सरकारी योजनाओं तक भरोसेमंद पहुंच शामिल होनी चाहिए।
सरकार के सामने चुनौती यह भी है कि सहायता का लाभ केवल शिविर में पहुंच पाने वाले लोगों तक सीमित न रहे। दूरस्थ गांवों में रहने वाले ऐसे नागरिक, जिन्हें यात्रा करने में कठिनाई होती है या जिनके पास आवश्यक दस्तावेज नहीं हैं, उन्हें भी सेवाओं तक पहुंचाने की व्यवस्था प्रभावी होनी चाहिए।
सुरक्षा कैंपों को सेवा केंद्र बनाने की योजना
गृह मंत्री ने बस्तर में 200 से अधिक सुरक्षा शिविरों को ‘शहीद वीर गुंडाधुर सेवा डेरा’ के रूप में विकसित करने की योजना का उल्लेख किया। प्रस्तावित केंद्रों में बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य सुविधाओं, युवाओं के कौशल विकास, रोजगार और आदिवासी परिवारों की जरूरतों पर ध्यान देने की बात कही गई है। किसानों की धान खरीदी और पात्र परिवारों तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाना भी इस योजना के उद्देश्यों में शामिल बताया गया।
यह बदलाव महत्वपूर्ण हो सकता है। जिन क्षेत्रों में सुरक्षा की चुनौतियों के कारण प्रशासनिक पहुंच कठिन रही, वहां स्थायी नागरिक सेवाएं उपलब्ध होना लोगों के जीवन में सीधा परिवर्तन ला सकता है।
लेकिन किसी केंद्र को सेवा डेरा घोषित कर देना पर्याप्त नहीं होगा। उसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वहां नियमित रूप से स्वास्थ्यकर्मी, शिक्षक और संबंधित विभागों के कर्मचारी पहुंचते हैं या नहीं; शिकायतों का समाधान होता है या नहीं; और ग्रामीणों को वास्तव में कितनी सेवाएं मिलती हैं।
स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी अहम होगी। आदिवासी गांवों की जरूरतें एक जैसी नहीं होतीं। कहीं पेयजल प्राथमिकता हो सकता है, तो कहीं सिंचाई, स्कूल तक पहुंच, स्वास्थ्य सेवा या बाजार से संपर्क। योजनाओं को स्थानीय जरूरतों के अनुसार लागू करने से उनका असर अधिक टिकाऊ हो सकता है।
पुनर्वास के आंकड़े क्या बताते हैं?
अमित शाह के अनुसार, नक्सलवाद से प्रभावित लोगों के पुनर्वास के तहत लगभग 8,526 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। करीब 7,500 लोगों के बैंक खाते खोले गए, 1,625 लोगों को इनामी राशि और 7,882 लोगों को क्षतिपूर्ति दी गई। इसके अलावा 455 लोगों को रोजगार, 129 लोगों को जमीन आवंटित करने और प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 4,014 आवास देने की जानकारी दी गई। 2,300 से अधिक आदिवासियों को कौशल विकास प्रशिक्षण मिलने की बात भी कही गई।
ये आंकड़े पुनर्वास कार्यक्रमों के दायरे का संकेत देते हैं, लेकिन केवल लाभार्थियों की संख्या से यह तय नहीं किया जा सकता कि पुनर्वास कितना सफल रहा। इसके लिए यह देखना भी जरूरी है कि रोजगार पाने वाले कितने लोग लंबे समय तक काम में बने रहे, प्रशिक्षण के बाद कितनों की आय बढ़ी और आवास या क्षतिपूर्ति का लाभ जरूरतमंदों तक किस हद तक पहुंचा।
आत्मसमर्पण करने वाले लोगों के पुनर्वास और हिंसा के शिकार नागरिकों की सहायता की जरूरतें भी अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए दोनों के लिए स्पष्ट पात्रता, पारदर्शी प्रक्रिया और नियमित निगरानी जरूरी है।
सड़क, बिजली और सिंचाई से बदल सकती है ग्रामीण अर्थव्यवस्था
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि लगभग चार दशक तक नक्सलवाद के कारण बस्तर विकास में पीछे रहा और अब क्षेत्र को तेजी से आगे बढ़ाना सरकार की प्राथमिकता है। उनके अनुसार, नियद नेल्लानार योजना के तहत 500 से अधिक गांवों में सड़क और बिजली पहुंची है तथा दूरस्थ इलाकों में स्कूल, अस्पताल, पेयजल और संचार सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है।
मुख्यमंत्री ने इंद्रावती नदी पर देउरगांव और मटनार में सिंचाई परियोजनाओं के लिए करीब 2,000 करोड़ रुपये स्वीकृत होने की जानकारी दी। इन परियोजनाओं से लगभग 80 हजार एकड़ जमीन को सिंचाई सुविधा मिलने की उम्मीद है।
यदि ये परियोजनाएं तय समय पर पूरी होती हैं और किसानों तक पानी प्रभावी ढंग से पहुंचता है, तो कृषि उत्पादन, फसल विविधीकरण और ग्रामीण आय में सुधार की संभावनाएं बन सकती हैं। हालांकि, इसका वास्तविक लाभ निर्माण की गुणवत्ता, पानी के न्यायसंगत वितरण, रखरखाव और किसानों को बाजार उपलब्ध होने पर निर्भर करेगा।
इसी तरह बस्तर ओलंपिक, बस्तर पंडुम और नियद नेल्लानार जैसी पहलों का दीर्घकालिक मूल्य तभी बढ़ेगा, जब उनके साथ शिक्षा, स्थानीय रोजगार और बुनियादी सुविधाओं का विस्तार भी लगातार होता रहे।
शांति का अर्थ भय से मुक्ति के साथ अवसर भी है
दंतेवाड़ा का दिव्यांग सहायता शिविर बस्तर में पुनर्वास की जरूरत को सामने लाता है। हिंसा से प्रभावित व्यक्ति के लिए सम्मानजनक जीवन का अर्थ केवल इलाज या उपकरण पाना नहीं, बल्कि अपने फैसले खुद लेने, परिवार की मदद करने, काम करने और समाज में बराबरी से भाग लेने का अवसर मिलना भी है।
सरकार की योजनाओं की अगली परीक्षा यही होगी कि सहायता कितनी नियमित, सुलभ और जवाबदेह बनती है। सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार को एक-दूसरे से जोड़कर काम किया जाए, तो पुनर्वास केवल राहत वितरण नहीं रहेगा, बल्कि क्षेत्र के भविष्य में निवेश बन सकता है।
बस्तर में स्थायी बदलाव की कसौटी यही होगी कि यहां के बच्चे बिना डर स्कूल जा सकें, युवा अपने कौशल के दम पर आजीविका पा सकें और हिंसा से प्रभावित लोग अपने जीवन को फिर से संवार सकें। शांति की उपलब्धि तभी पूरी मानी जाएगी, जब उसका लाभ गांव-गांव और परिवार-दर-परिवार महसूस किया जा सके।



