नवरात्र में बड़ा बदलाव: 15 लाख का पीतल शेर और QR कोड से बढ़ेंगी श्रद्धालुओं की सुविधाएं
छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ में इस बार क्वांर नवरात्र की तैयारियां केवल मंदिरों की सजावट तक सीमित नहीं हैं। श्रद्धालुओं के अनुभव को बेहतर बनाने, धार्मिक परिसर की सुंदरता बढ़ाने और भीड़ के बीच जरूरी सुविधाओं की जानकारी आसानी से उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया जा रहा है। इसी कड़ी में एक भव्य पीतल की शेर प्रतिमा का दान और सीढ़ियों पर QR कोड लगाने की पहल खास चर्चा में है।
मां के दरबार में स्थापित होगी 15 लाख रुपये की शेर प्रतिमा
डोंगरगढ़ स्थित मां बम्लेश्वरी मंदिर में नासिक के श्रद्धालु नंदेश मुरलीधर येंडे ने अपनी माता इंदुमति येंडे की स्मृति में पीतल की शेर प्रतिमा दान की है। करीब 15 लाख रुपये की लागत से तैयार इस प्रतिमा का वजन लगभग डेढ़ क्विंटल और ऊंचाई करीब चार फीट बताई गई है। इसे छोटी बम्लेश्वरी मंदिर में गर्भगृह के सामने स्थापित करने की योजना है।
धार्मिक परंपरा में शेर मां दुर्गा की शक्ति, साहस और संरक्षण का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में यह प्रतिमा मंदिर की शोभा बढ़ाने के साथ श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण बन सकती है। किसी परिजन की स्मृति में दिया गया यह दान यह भी दिखाता है कि धार्मिक स्थलों से लोगों का जुड़ाव केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि भावनात्मक और पारिवारिक स्मृतियों से भी जुड़ा होता है।
सुनहरी रोशनी और सोने की कारीगरी से सजेगा मंदिर परिसर
नवरात्र के दौरान छोटी बम्लेश्वरी मंदिर को ‘अंबर थीम’ के तहत सुनहरी और केसरिया रोशनी से सजाने की तैयारी है। वहीं, पहाड़ी पर स्थित बड़ी बम्लेश्वरी मंदिर के ध्वजदंड और कलश पर सोने की नक्काशी व कारीगरी कराने की योजना भी सामने आई है। इसके लिए लगभग 2,100 ग्राम सोने की जरूरत बताई गई है।
ऐसी सजावट धार्मिक वातावरण को आकर्षक बनाती है, लेकिन बड़े आयोजनों में असली चुनौती सुंदरता के साथ सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखना भी है। खासकर जब बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहाड़ी पर स्थित मंदिर तक पहुंचते हैं, तब आवागमन, साफ-सफाई, पेयजल और आपातकालीन सहायता जैसी व्यवस्थाओं का महत्व और बढ़ जाता है।
सीढ़ियों पर QR कोड से मिलेगी जरूरी जानकारी
इस बार तकनीक का इस्तेमाल श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए भी किया जा रहा है। मंदिर तक जाने वाली सीढ़ियों पर QR कोड लगाने की तैयारी है। इन्हें मोबाइल से स्कैन कर श्रद्धालु पेयजल केंद्रों और स्वास्थ्य सेवाओं जैसी जरूरी सुविधाओं की जानकारी हासिल कर सकेंगे।
भीड़भाड़ वाले धार्मिक आयोजनों में सही जानकारी समय पर मिलना काफी उपयोगी साबित हो सकता है। इससे श्रद्धालुओं को जरूरी सुविधाएं ढूंढने में कम परेशानी हो सकती है और व्यवस्था संभालने वाले कर्मचारियों पर भी दबाव घट सकता है।
हालांकि, इस पहल की वास्तविक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि QR कोड आसानी से स्कैन हों, उनके जरिए मिलने वाली जानकारी अद्यतन रहे और मोबाइल नेटवर्क या इंटरनेट की समस्या होने पर भी वैकल्पिक सूचना व्यवस्था उपलब्ध हो। बुजुर्गों और स्मार्टफोन का इस्तेमाल न करने वाले श्रद्धालुओं के लिए संकेतक बोर्ड और सहायता केंद्र भी जरूरी रहेंगे।
थनौद की दुर्गा प्रतिमाएं बढ़ा रहीं छत्तीसगढ़ की पहचान
नवरात्र का महत्व केवल मंदिरों तक सीमित नहीं है। इससे जुड़े शिल्प और कारोबार भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति देते हैं। दुर्ग जिले के शिल्पग्राम थनौद में पीढ़ियों से दुर्गा प्रतिमाएं बनाने की परंपरा जारी है। यहां तैयार मूर्तियों की मांग छत्तीसगढ़ के अलावा मध्यप्रदेश, ओडिशा, झारखंड, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और तेलंगाना सहित कई क्षेत्रों में बताई गई है।
इस वर्ष गांव की करीब 40 कार्यशालाओं में पांच से 25 फीट तक की लगभग 1,500 से 1,600 प्रतिमाएं तैयार की जा रही हैं। इनकी कीमत आकार और बनावट के अनुसार करीब 15 हजार रुपये से तीन लाख रुपये तक बताई गई है।
स्थानीय कारोबार के अनुमान के मुताबिक, इस शिल्प से हर साल लगभग आठ करोड़ रुपये का व्यवसाय होता है। मूर्ति निर्माण और सजावट के काम में आसपास के गांवों के करीब 700 से 800 कारीगर जुड़े रहते हैं। परिवार की महिलाएं भी सजावट और निर्माण के विभिन्न कामों में सहयोग करती हैं।
इस तरह नवरात्र की मांग कारीगरों के लिए मौसमी रोजगार, छोटे कारोबारियों के लिए आय और स्थानीय बाजार के लिए आर्थिक गतिविधियों का अवसर बनती है। गणेश, शिव और हनुमान जी की प्रतिमाएं भी सालभर तैयार किए जाने से इस पारंपरिक हुनर को त्योहारों के बाद भी काम मिलता रहता है।
आस्था के साथ सुविधा और रोजगार पर भी नजर
डोंगरगढ़ में धार्मिक सजावट और QR कोड जैसी सुविधाओं की तैयारी एक तरफ श्रद्धालुओं के अनुभव को बेहतर बनाने की संभावना रखती है, तो दूसरी तरफ थनौद का मूर्ति उद्योग यह दिखाता है कि धार्मिक आयोजन स्थानीय लोगों की आजीविका से कितनी गहराई से जुड़े हैं।
आने वाले समय में ऐसी पहलों की सफलता केवल भव्य सजावट से नहीं, बल्कि सुरक्षित आवागमन, साफ पेयजल, स्वास्थ्य सहायता, स्पष्ट सूचना और पारंपरिक कारीगरों को मिलने वाले उचित अवसरों से भी तय होगी। यदि तकनीक और बुनियादी सुविधाओं पर बराबर ध्यान दिया जाता है, तो नवरात्र जैसे बड़े आयोजन आस्था के साथ बेहतर प्रबंधन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूत आधार दे सकते हैं।



