शिंजो आबे की याद में भावुक हुआ वाराणसी, अकी आबे से मिले PM मोदी; भारत-जापान दोस्ती को मिला नया प्रतीक
भारत और जापान के रिश्तों में कुछ रिश्ते सिर्फ राजनयिक दस्तावेजों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि समय के साथ दोनों देशों की साझा स्मृति का हिस्सा बन जाते हैं। पूर्व जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दोस्ती भी ऐसा ही रिश्ता रही है। अब आबे के निधन के चार साल बाद वाराणसी में उनके नाम पर बने स्मृति कॉरिडोर और उनकी पत्नी अकी आबे की भारत यात्रा ने उस रिश्ते को एक बार फिर सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को नई दिल्ली में अकी आबे से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने शिंजो आबे को अपना प्रिय मित्र और दूरदर्शी नेता बताते हुए भारत-जापान संबंधों को मजबूत करने में उनके योगदान को याद किया। मोदी ने अकी आबे के भारत से लंबे जुड़ाव को भी महत्वपूर्ण बताया।
यह मुलाकात ऐसे समय हुई है जब इससे एक दिन पहले वाराणसी में शिंजो आबे मेमोरियल कॉरिडोर का उद्घाटन किया गया था। यह सिर्फ किसी विदेशी नेता की स्मृति में बनाया गया स्थान नहीं है, बल्कि उस दौर का प्रतीक है जब भारत-जापान संबंधों में राजनीतिक भरोसे के साथ सांस्कृतिक और रणनीतिक साझेदारी भी तेजी से आगे बढ़ी।
वाराणसी में लौटी 2015 की वह याद
शिंजो आबे का वाराणसी से रिश्ता महज औपचारिक यात्रा तक सीमित नहीं था। 2015 में भारत दौरे के दौरान आबे ने प्रधानमंत्री मोदी के साथ वाराणसी में गंगा आरती में हिस्सा लिया था। इस यात्रा की तस्वीरें भारत-जापान संबंधों के सबसे चर्चित कूटनीतिक क्षणों में शामिल रही हैं। आबे की पत्नी अकी आबे ने भी वाराणसी में स्मारक के उद्घाटन के दौरान उस यात्रा और अपने पति के काशी से जुड़ाव को याद किया।
यही वजह है कि वाराणसी में आबे की स्मृति को स्थायी रूप देना प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण है। काशी भारत की सभ्यतागत पहचान का प्रतिनिधित्व करती है, जबकि जापान की सांस्कृतिक परंपरा में भी प्राचीन विरासत और आधुनिकता का सह-अस्तित्व दिखाई देता है।
इस संदर्भ में काशी और जापान के बीच सांस्कृतिक संबंध को केवल पर्यटन की दृष्टि से देखना अधूरा होगा।
मेमोरियल कॉरिडोर क्यों खास है?
अबे मेमोरियल कॉरिडोर का उद्घाटन अकी आबे और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर में किया। कॉरिडोर में भारत-जापान संबंधों और मोदी-अबे की मुलाकातों से जुड़ी स्मृतियों को प्रदर्शित किया गया है।
दिलचस्प बात यह है कि रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर स्वयं भारत-जापान सहयोग का प्रतीक है। जापानी सहायता से बने इस केंद्र का उद्घाटन 2021 में मोदी और आबे के बीच विकसित साझेदारी की पृष्ठभूमि में हुआ था।
इस तरह एक ही परिसर में दो स्तर की कहानी दिखाई देती है—एक तरफ जापान की विकास साझेदारी और दूसरी तरफ शिंजो आबे की व्यक्तिगत विरासत।
यानी स्मारक सिर्फ अतीत को याद करने के लिए नहीं है। यह आने वाली पीढ़ी को यह समझाने का माध्यम भी बन सकता है कि दो देशों के बीच संबंध केवल व्यापार या सरकारी समझौतों से नहीं बनते, बल्कि लोगों, संस्कृति और नेतृत्व के बीच बने विश्वास से भी मजबूत होते हैं।
मोदी-अबे की दोस्ती ने बदली थी रिश्तों की दिशा
भारत-जापान संबंधों को आज जिस रणनीतिक स्तर पर देखा जाता है, उसकी नींव कई दशकों में तैयार हुई, लेकिन शिंजो आबे के नेतृत्व में इसमें एक महत्वपूर्ण गति आई।
आबे भारत को जापान की विदेश नीति में एक महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में देखते थे। दूसरी तरफ मोदी सरकार के दौर में जापान को भारत के आर्थिक विकास, बुनियादी ढांचे और इंडो-पैसिफिक रणनीति में अहम साझेदार बनाया गया।
दोनों नेताओं के बीच व्यक्तिगत संवाद ने इस सरकारी रिश्ते को एक मानवीय आयाम भी दिया।
यही कारण है कि मोदी ने अकी आबे से मुलाकात के दौरान आबे को सिर्फ जापान के पूर्व प्रधानमंत्री के रूप में याद नहीं किया, बल्कि उन्हें अपना “प्रिय मित्र” और दूरदर्शी नेता बताया।
दोस्ती से आगे बढ़कर रणनीतिक साझेदारी
मोदी और आबे की दोस्ती की चर्चा अक्सर व्यक्तिगत संबंधों के संदर्भ में होती है, लेकिन इसके पीछे ठोस रणनीतिक बदलाव भी थे।
भारत और जापान के बीच बुनियादी ढांचे, हाई-स्पीड रेल, निवेश, तकनीक, रक्षा और समुद्री सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा। दोनों देशों के रिश्ते आर्थिक साझेदारी से आगे बढ़कर व्यापक रणनीतिक सहयोग तक पहुंचे।
इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच भारत और जापान के बीच समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता पर सहयोग भी महत्वपूर्ण हुआ। क्वाड जैसे बहुपक्षीय मंचों में दोनों देशों की भूमिका ने इस रणनीतिक साझेदारी को और व्यापक बनाया।
इसलिए आबे की विरासत को केवल भारत में उनकी लोकप्रियता या मोदी के साथ उनकी दोस्ती तक सीमित करना उनके राजनीतिक योगदान की व्यापक तस्वीर को छोटा कर देगा।
अकी आबे की भावुकता ने रिश्ते का मानवीय पक्ष सामने रखा
वाराणसी में मेमोरियल कॉरिडोर के उद्घाटन के दौरान अकी आबे भावुक दिखाई दीं। उन्होंने स्मारक के लिए भारत के लोगों और कार्यक्रम से जुड़े लोगों के प्रति आभार जताया। उन्होंने अपने पति की काशी यात्रा की यादों को भी साझा किया।
यहीं इस पूरे घटनाक्रम का सबसे मानवीय पक्ष सामने आता है।
किसी राजनेता के निधन के बाद उनकी राजनीतिक विरासत पर बहस जारी रहती है, लेकिन परिवार के लिए उससे जुड़ी स्मृतियां निजी होती हैं। ऐसे में किसी दूसरे देश द्वारा उस व्यक्ति की याद को सम्मान देना रिश्तों में एक अलग तरह का विश्वास पैदा करता है।
भारत के लिए भी यह संदेश महत्वपूर्ण है कि उसकी विदेश नीति में सांस्कृतिक सम्मान और व्यक्तिगत संबंधों की भूमिका केवल औपचारिक शब्दों तक सीमित नहीं है।
2022 की हत्या ने छोड़ा था गहरा असर
शिंजो आबे की 8 जुलाई 2022 को जापान के नारा शहर में चुनाव प्रचार के दौरान गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उनकी मृत्यु के बाद भारत ने राष्ट्रीय शोक व्यक्त किया था और मोदी ने उनके साथ अपने संबंधों को सार्वजनिक रूप से याद किया था।
चार साल बाद वाराणसी में उनके नाम पर बना स्मारक यह दिखाता है कि उनकी राजनीतिक विरासत भारत-जापान संबंधों की स्मृति में अभी भी मौजूद है।
हालांकि किसी नेता की विरासत का वास्तविक मूल्यांकन केवल स्मारकों से नहीं होता। वह इस बात से तय होता है कि उनके दौर में शुरू हुई साझेदारियां आगे कितनी मजबूत होती हैं।
अब असली परीक्षा अगली पीढ़ी की साझेदारी की
शिंजो आबे का दौर अब इतिहास का हिस्सा है, लेकिन भारत-जापान संबंधों के सामने चुनौतियां वर्तमान की हैं।
दोनों देशों को सप्लाई चेन, सेमीकंडक्टर, रक्षा तकनीक, स्वच्छ ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, डिजिटल तकनीक और समुद्री सुरक्षा जैसे नए क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाना होगा। वैश्विक अर्थव्यवस्था में तेजी से हो रहे बदलावों के बीच जापान के निवेश और भारत के बड़े बाजार तथा विनिर्माण क्षमता का संयोजन दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
ऐसे में आबे मेमोरियल कॉरिडोर का महत्व सिर्फ इसलिए नहीं है कि वहां उनकी तस्वीरें और स्मृतियां मौजूद हैं। इसका बड़ा महत्व तब होगा जब यह नई पीढ़ी को भारत-जापान संबंधों की कहानी समझाने के साथ भविष्य के सहयोग की प्रेरणा भी दे।
विरासत तभी मजबूत होती है जब साझेदारी आगे बढ़े
मोदी और अकी आबे की मुलाकात ने एक पुराने व्यक्तिगत रिश्ते की याद को फिर से सामने ला दिया है। वाराणसी का नया स्मारक उस रिश्ते को एक स्थायी स्थान देता है।
लेकिन भारत-जापान संबंधों की सबसे बड़ी श्रद्धांजलि किसी स्मारक से आगे होगी—वह होगी दोनों देशों के बीच भरोसे, निवेश, तकनीक, संस्कृति और रणनीतिक सहयोग को लगातार मजबूत करना।
शिंजो आबे की विरासत अब सिर्फ इतिहास की किताबों में दर्ज एक अध्याय नहीं है। भारत और जापान के संबंध जिस दिशा में आगे बढ़ते हैं, उसमें उनके दौर में बनाए गए भरोसे और साझेदारी की छाप लंबे समय तक दिखाई देती रहेगी।



