पाकिस्तान में आतंकियों पर बड़ा शिकंजा, 9 ढेर; TTP नेटवर्क के खिलाफ सेना का अभियान तेज
पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा में आतंकवाद के खिलाफ सैन्य दबाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। उत्तरी वजीरिस्तान में सुरक्षा बलों ने खुफिया जानकारी के आधार पर की गई कार्रवाई में 9 आतंकियों को मार गिराने का दावा किया है। पाकिस्तानी सेना की मीडिया शाखा आईएसपीआर के मुताबिक, कार्रवाई के दौरान चार कथित कमांडर भी मारे गए और बड़ी मात्रा में हथियार तथा गोला-बारूद बरामद किया गया।
यह कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब खैबर पख्तूनख्वा में आतंकवादी हिंसा पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा के लिए लगातार चुनौती बनी हुई है। खासकर उत्तरी वजीरिस्तान लंबे समय से ऐसे संगठनों की गतिविधियों का केंद्र रहा है, इसलिए यहां किसी सैन्य अभियान का महत्व केवल मारे गए आतंकियों की संख्या तक सीमित नहीं रहता।
एक ऑपरेशन, लेकिन निशाने पर पूरा नेटवर्क
आईएसपीआर के अनुसार सेना ने उत्तरी वजीरिस्तान के पलंगजई, नदीम कोट और कोट खिजरी क्षेत्रों में खुफिया सूचना के आधार पर अभियान चलाया। सेना का दावा है कि मारे गए लोगों में खालिद रजा, कामरान, मूसा और मफतून नाम के चार प्रमुख कमांडर शामिल थे।
कार्रवाई में हथियार और गोला-बारूद भी मिलने की बात कही गई है। सुरक्षा अभियानों में यह हिस्सा इसलिए महत्वपूर्ण होता है क्योंकि किसी आतंकी ठिकाने को नष्ट करने के साथ उसके हथियार भंडार और लॉजिस्टिक नेटवर्क पर प्रहार करना संगठन की आगे की गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है।
हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों से आने वाली सैन्य सूचनाओं को संबंधित पक्षों के आधिकारिक दावों के रूप में देखना अधिक उचित होता है।
TTP के खिलाफ लड़ाई क्यों कठिन है?
खैबर पख्तूनख्वा में आतंकवाद की समस्या को समझने के लिए तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी TTP की भूमिका को देखना जरूरी है। TTP पाकिस्तान में सक्रिय एक प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन है, जिसका विभिन्न आतंकी गुटों के साथ संबंध और प्रभाव लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती रहा है।
संगठन की गतिविधियां खास तौर पर पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा से जुड़े इलाकों में चिंता का विषय रही हैं। पहाड़ी भूगोल, सीमावर्ती इलाकों में आवाजाही और स्थानीय नेटवर्क सुरक्षा अभियानों को जटिल बनाते हैं।
यही वजह है कि किसी एक ऑपरेशन में कुछ आतंकियों के मारे जाने के बावजूद सुरक्षा चुनौती खत्म नहीं मानी जा सकती। किसी नेटवर्क को कमजोर करने के लिए उसके नेतृत्व, भर्ती, वित्तीय संसाधन, हथियार आपूर्ति और सुरक्षित ठिकानों—सभी पर लगातार दबाव बनाना पड़ता है।
पाकिस्तान के लिए सिर्फ सैन्य समाधान काफी नहीं
प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने सैन्य कार्रवाई की सराहना करते हुए आतंकवाद को समाप्त करने और देश में स्थायी शांति स्थापित करने की क्षमता पर भरोसा जताया है।
लेकिन पाकिस्तान के सामने चुनौती इससे कहीं बड़ी है।
सैन्य अभियान तत्काल खतरे को कम कर सकते हैं, मगर लंबे समय की सुरक्षा के लिए खुफिया तंत्र, सीमा प्रबंधन, स्थानीय प्रशासन और आतंकियों की वित्तीय सप्लाई पर नियंत्रण भी उतना ही जरूरी है। अगर किसी इलाके में सुरक्षा बल कार्रवाई करते हैं लेकिन आतंकवादी नेटवर्क नए सदस्यों की भर्ती और संसाधन जुटाने में सक्षम रहता है, तो कुछ समय बाद हिंसा दोबारा उभर सकती है।
इसलिए इस कार्रवाई का वास्तविक असर आने वाले हफ्तों और महीनों में इस बात से तय होगा कि क्या आतंकवादी गतिविधियों की क्षमता वास्तव में कमजोर होती है।
उत्तरी वजीरिस्तान फिर क्यों महत्वपूर्ण हो गया?
उत्तरी वजीरिस्तान का नाम पाकिस्तान के आतंकवाद विरोधी अभियानों के इतिहास में पहले भी प्रमुखता से सामने आता रहा है। अफगानिस्तान से लगी सीमा के नजदीक होने के कारण यह इलाका लंबे समय से विभिन्न सशस्त्र समूहों की गतिविधियों से प्रभावित रहा है।
इस क्षेत्र में अभियान का एक अलग रणनीतिक महत्व भी है। यदि किसी संगठन के कमांडरों और हथियारों के ठिकानों पर लगातार कार्रवाई होती है तो उसके स्थानीय नेटवर्क के बीच समन्वय कमजोर हो सकता है।
लेकिन इसके साथ नागरिक आबादी की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण है। आतंकवाद विरोधी अभियान जितने प्रभावी होंगे, उतना ही जरूरी होगा कि उनके दौरान आम नागरिकों को कम से कम नुकसान हो और विस्थापन जैसी समस्याओं को नियंत्रित किया जाए।
अफगानिस्तान सीमा का पहलू भी अहम
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के संबंधों में सुरक्षा एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। इस सीमा क्षेत्र में सक्रिय आतंकवादी नेटवर्क को लेकर दोनों देशों के बीच समय-समय पर आरोप-प्रत्यारोप सामने आते रहे हैं।
TTP की गतिविधियों के संदर्भ में भी सीमा पार मौजूदगी का मुद्दा पाकिस्तान लगातार उठाता रहा है। दूसरी तरफ अफगानिस्तान के तालिबान प्रशासन ने पाकिस्तान के आरोपों पर अलग-अलग मौकों पर आपत्ति जताई है।
इसलिए पाकिस्तान का सैन्य अभियान केवल घरेलू सुरक्षा नीति का विषय नहीं है। इसका असर पाकिस्तान-अफगानिस्तान संबंधों पर भी पड़ सकता है।
आगे क्या बदल सकता है?
इस कार्रवाई के बाद पाकिस्तान की सेना पर दोहरी जिम्मेदारी होगी। पहला, आतंकियों के खिलाफ दबाव बनाए रखना और दूसरा, यह सुनिश्चित करना कि अभियान केवल अस्थायी सफलता तक सीमित न रह जाए।
यदि चार कथित कमांडरों समेत 9 आतंकियों के मारे जाने की जानकारी सही साबित होती है, तो यह संबंधित नेटवर्क के लिए सामरिक नुकसान हो सकता है। लेकिन किसी संगठन की वास्तविक क्षमता का आकलन उसके बाद होने वाली हिंसा, भर्ती और हमले की क्षमता से किया जाता है।
आने वाले समय में इसलिए केवल कितने आतंकी मारे गए यह आंकड़ा महत्वपूर्ण नहीं होगा। ज्यादा अहम यह होगा कि क्या उत्तरी वजीरिस्तान और पूरे खैबर पख्तूनख्वा में आतंकी हमलों की आवृत्ति घटती है, क्या हथियारों की सप्लाई बाधित होती है और क्या स्थानीय सुरक्षा ढांचा पहले से ज्यादा मजबूत होता है।
पाकिस्तान ने एक बार फिर सैन्य कार्रवाई के जरिए आतंकवाद के खिलाफ अपनी रणनीति का संकेत दिया है। अब इस अभियान की असली परीक्षा उसके तत्काल नतीजे नहीं, बल्कि स्थायी सुरक्षा पैदा करने की क्षमता होगी।



