छत्तीसगढ़ में किसानों का बड़ा आक्रोश, ट्रैक्टर रैली से सड़कें जाम; 1700 करोड़ बकाया समेत 12 मांगों पर सरकार को चेतावनी
रायपुर/कवर्धा। छत्तीसगढ़ में किसानों का गुस्सा अब केवल खेतों तक सीमित नहीं रहा। भारतीय किसान संघ के आह्वान पर प्रदेश के अलग-अलग जिलों में किसानों ने प्रदर्शन किया और कई जगह ट्रैक्टर रैली के जरिए अपनी मांगें सरकार तक पहुंचाईं। कवर्धा में आंदोलन के दौरान सड़कें जाम होने से आम लोगों को परेशानी हुई। अस्पताल जा रहे कुछ लोग भी रास्ते में फंसे नजर आए, जबकि एक एंबुलेंस को भी जाम का सामना करना पड़ा। हालांकि बाद में उसके लिए रास्ता बनाया गया।
इस आंदोलन की असली अहमियत सड़क पर खड़े ट्रैक्टरों से ज्यादा उन 12 मांगों में है, जिनके जरिए किसान धान खरीदी से लेकर लंबित भुगतान, सिंचाई, खाद, बिजली, फसल नुकसान और जमीन अधिग्रहण तक की व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं।
1700 करोड़ रुपये के बकाये ने बढ़ाई नाराजगी
किसान संगठन का सबसे बड़ा मुद्दा साल 2022-23 की धान खरीदी से जुड़ी करीब 1700 करोड़ रुपये की लंबित राशि है। किसानों का कहना है कि उपज बेचने के बाद भुगतान में लंबी देरी सीधे उनकी आर्थिक स्थिति को प्रभावित करती है।
कृषि अर्थव्यवस्था में भुगतान का समय केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं होता। किसान को अगली फसल के लिए बीज, खाद, मजदूरी, सिंचाई और मशीनरी पर खर्च करना पड़ता है। ऐसे में भुगतान अटकने का असर अगले कृषि चक्र पर भी पड़ सकता है।
यही वजह है कि आंदोलन का यह हिस्सा केवल बकाया रकम की मांग नहीं, बल्कि ग्रामीण नकदी प्रवाह से जुड़ा सवाल भी बन गया है।
MSP और धान खरीदी की व्यवस्था पर भी सवाल
भारतीय किसान संघ ने धान की खरीद के लिए 3358 रुपये प्रति क्विंटल की दर की मांग रखी है। संगठन का तर्क है कि किसानों को पिछले वर्षों में समर्थन मूल्य में हुई वृद्धि का पूरा लाभ मिलना चाहिए।
इसके साथ ही धान खरीदी केंद्रों पर वजन और कटौती को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। संगठन ने प्रति बोरी अधिकतम 40 किलो 700 ग्राम धान लिए जाने और अतिरिक्त वजन की कथित कटौती रोकने की मांग की है।
अगर खरीदी व्यवस्था में पारदर्शिता नहीं रहती, तो किसान के लिए घोषित मूल्य और वास्तविक प्राप्ति के बीच अंतर पैदा हो सकता है। इसलिए केवल समर्थन मूल्य घोषित करना पर्याप्त नहीं है; खरीद की पूरी प्रक्रिया भी स्पष्ट और निगरानी योग्य होना जरूरी है।
टोकन व्यवस्था में छोटे किसानों की चिंता
धान खरीदी के दौरान टोकन व्यवस्था भी किसानों की मांगों में शामिल है। संगठन ने बड़े किसानों के लिए पांच, छोटे और सीमांत किसानों के लिए तीन तथा एक टोकन की व्यवस्था की मांग रखी है।
इसके पीछे मूल सवाल यह है कि खरीदी व्यवस्था में किसान की पूरी उपज समय पर बिक पाए। छोटे किसान के पास भंडारण की क्षमता सीमित होती है। यदि खरीदी केंद्र पर बार-बार इंतजार करना पड़े या टोकन की उपलब्धता कम हो, तो उसका आर्थिक दबाव बढ़ सकता है।
बाढ़ से बर्बाद फसलों का सर्वे और मुआवजा
हाल की बाढ़ से प्रभावित किसानों के लिए तत्काल सर्वे और मुआवजे की मांग भी उठाई गई है। किसान संगठन चाहता है कि नुकसान का आकलन खेत स्तर पर किया जाए, ताकि वास्तविक नुकसान सामने आ सके।
प्राकृतिक आपदा के बाद मुआवजा तभी प्रभावी होता है जब सर्वे समय पर हो और नुकसान का आकलन वास्तविक स्थिति के आधार पर किया जाए। देरी होने पर किसान के पास अगली फसल के लिए संसाधन जुटाने का संकट खड़ा हो सकता है।
खाद की कीमत और सिंचाई पर भी नाराजगी
किसानों ने निर्धारित दर पर खाद उपलब्ध कराने और अधिक कीमत पर बिक्री करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कृषि लागत लगातार बढ़ने की स्थिति में खाद जैसे जरूरी इनपुट की कीमत में मामूली अंतर भी किसान की लागत को प्रभावित करता है।
इसी तरह अरपा-भैंसाझार समेत लंबित सिंचाई परियोजनाओं को तेजी से पूरा करने की मांग की गई है। किसान संगठन का तर्क है कि अनियमित बारिश और सूखे के जोखिम के बीच सिंचाई ढांचा मजबूत होना ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी है।
सिर्फ धान नहीं, मक्का-गेहूं और गन्ने पर भी जोर
किसान संगठन ने कृषि नीति को केवल धान तक सीमित न रखने की मांग की है। गन्ने के दाम में 150 रुपये प्रति क्विंटल वृद्धि, मक्का और गेहूं की समर्थन मूल्य पर खरीदी तथा इन फसलों को संबंधित योजनाओं से जोड़ने की मांग भी सामने आई है।
इसका व्यापक अर्थ यह है कि किसानों की आय बढ़ाने के लिए फसल विविधीकरण और अलग-अलग कृषि उपज के लिए बाजार व्यवस्था को मजबूत करना होगा। यदि किसान केवल एक फसल पर निर्भर रहता है तो मौसम, कीमत और सरकारी खरीद व्यवस्था में किसी भी तरह का व्यवधान उसकी आय को प्रभावित कर सकता है।
जमीन अधिग्रहण को लेकर भी स्पष्ट संदेश
आंदोलन में भूमि अधिग्रहण का मुद्दा भी शामिल है। किसान संगठन ने विकास परियोजनाओं के लिए जमीन लेने की प्रक्रिया में किसानों के अधिकारों की रक्षा की मांग की है।
यह मुद्दा आने वाले समय में इसलिए महत्वपूर्ण हो सकता है क्योंकि सड़क, उद्योग, सिंचाई और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के विस्तार के साथ भूमि की जरूरत बढ़ती है। ऐसे मामलों में विकास और किसान हितों के बीच संतुलन, उचित मुआवजा और पारदर्शी प्रक्रिया सबसे महत्वपूर्ण होंगे।
15 नवंबर से 15 फरवरी तक धान खरीदी की मांग
किसान संगठन ने धान खरीदी की अवधि 15 नवंबर से 15 फरवरी तक रखने की मांग की है। साथ ही खरीदी केंद्रों की व्यवस्था और टोकन प्रणाली में सुधार पर जोर दिया गया है।
खरीदी की समयसीमा किसान के लिए इसलिए अहम है क्योंकि कटाई, परिवहन, भंडारण और बिक्री के बीच तालमेल जरूरी होता है। खरीदी अवधि कम होने या केंद्रों पर अत्यधिक दबाव बनने की स्थिति में किसानों को अपनी उपज बेचने में मुश्किल हो सकती है।
कवर्धा का चक्काजाम आंदोलन की दूसरी तस्वीर भी दिखाता है
किसानों की मांगें भले ही कृषि नीति से जुड़ी हों, लेकिन सड़क जाम का असर आम नागरिकों पर भी पड़ा। कवर्धा में अस्पताल जा रहे लोगों के फंसने की शिकायत सामने आई। कुछ राहगीरों ने अपनी परेशानी जाहिर की, जबकि एंबुलेंस को रास्ता दिए जाने की बात भी सामने आई।
यह स्थिति आंदोलन की एक अहम चुनौती दिखाती है। किसानों की समस्याओं को सरकार तक प्रभावी ढंग से पहुंचाना जरूरी है, लेकिन सार्वजनिक रास्तों पर लंबे जाम से मरीजों, विद्यार्थियों, नौकरीपेशा लोगों और दूसरे जरूरी यात्रियों को परेशानी न हो, इसका ध्यान रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
सरकार के सामने अब सिर्फ आंदोलन नहीं, समाधान की चुनौती
भारतीय किसान संघ ने स्पष्ट किया है कि मांगें पूरी नहीं होने पर आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा। संगठन मुख्यमंत्री के नाम कलेक्टर को 12 सूत्रीय ज्ञापन सौंपकर प्रत्येक मुद्दे पर समयबद्ध निर्णय की मांग कर रहा है।
अब सरकार के सामने चुनौती केवल प्रदर्शन समाप्त कराने की नहीं है। असली परीक्षा यह होगी कि बकाया भुगतान, धान खरीदी, सिंचाई, खाद, फसल नुकसान और भूमि अधिग्रहण जैसे अलग-अलग मुद्दों पर क्या ठोस समयसीमा तय होती है।
किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात घोषणाओं से ज्यादा भुगतान की तारीख, खरीदी की पारदर्शिता और खेत तक पहुंचने वाली सुविधाओं का वास्तविक असर होगी। अगर इन मोर्चों पर ठोस कार्रवाई होती है, तो आंदोलन से उठे सवाल समाधान की दिशा में बदल सकते हैं। अगर फैसले फिर प्रक्रिया और बैठकों तक सीमित रहे, तो आने वाले दिनों में आंदोलन का दायरा बढ़ने की संभावना बनी रहेगी।
छत्तीसगढ़ की कृषि अर्थव्यवस्था में धान की बड़ी भूमिका है, लेकिन किसान की स्थिर आय केवल धान के भाव से तय नहीं होती। भुगतान की समयबद्धता, सिंचाई, इनपुट लागत, फसल विविधीकरण, आपदा राहत और बाजार तक पहुंच—इन सभी का संयुक्त असर किसान की आर्थिक स्थिति पर पड़ता है। यही वजह है कि इस आंदोलन की 12 मांगों को केवल तत्काल राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव के रूप में नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े व्यापक सवालों के रूप में देखना जरूरी है।



