थाली भरी फिर भी शरीर खाली! 73% भारतीयों में प्रोटीन की खतरनाक कमी, रिपोर्ट ने खोली पोल
भारत में भोजन की कमी की तस्वीर पिछले कुछ दशकों में काफी बदली है, लेकिन एक दूसरी चुनौती अब ज्यादा स्पष्ट होकर सामने आ रही है—क्या हमारी थाली पेट भरने के साथ शरीर की पोषण जरूरत भी पूरी कर रही है?
‘द स्टेट ऑफ प्रोटीन एंड फाइबर इन अर्बन इंडिया’ रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 73 प्रतिशत लोगों के रोज के आहार में पर्याप्त प्रोटीन नहीं पहुंच रहा। यह आंकड़ा इस ओर इशारा करता है कि समस्या सिर्फ खाना कम मिलने की नहीं, बल्कि भोजन की गुणवत्ता और संतुलन की भी है।
यानी थाली भरपूर दिख सकती है, लेकिन उसमें शरीर के लिए जरूरी पोषक तत्वों का संतुलन कमजोर हो सकता है।
प्रोटीन की कमी सिर्फ गांवों की समस्या नहीं
आमतौर पर पोषण की कमी की चर्चा ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर आबादी के संदर्भ में ज्यादा होती है। लेकिन रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण संकेत यह है कि शहरों में भी प्रोटीन की पर्याप्त मात्रा हासिल करना बड़ी चुनौती बना हुआ है।
रिपोर्ट में शहरी आबादी के 44 प्रतिशत और ग्रामीण आबादी के 36 प्रतिशत लोगों के रोजाना प्रोटीन सेवन को अपर्याप्त बताया गया है।
इस अंतर से एक अहम बात समझ आती है—पैसे या भोजन की उपलब्धता अकेले पर्याप्त नहीं हैं।
खाने की आदत, सुविधा, कीमत, जागरूकता और जीवनशैली भी यह तय करते हैं कि थाली में प्रोटीन कितना पहुंचेगा।
शहरों में लंबे कामकाजी घंटे, बाहर का खाना और जल्दी तैयार होने वाले भोजन पर बढ़ती निर्भरता इस समस्या को और जटिल बना सकती है।
महंगा प्रोटीन खरीदना जरूरी नहीं
प्रोटीन को लेकर एक आम धारणा है कि इसे बढ़ाने के लिए महंगे सप्लीमेंट या विशेष खाद्य उत्पाद खरीदने पड़ेंगे। रोजमर्रा की भारतीय रसोई को देखें तो तस्वीर कुछ अलग है।
दाल, चना, राजमा, सोयाबीन, दूध, दही, पनीर, अंडे, मछली और दूसरे प्रोटीन स्रोत आसानी से भोजन का हिस्सा बनाए जा सकते हैं।
मसलन, केवल चावल या रोटी पर निर्भर रहने के बजाय उसके साथ दाल, चना, दही या अन्य प्रोटीन स्रोत जोड़ना भोजन को ज्यादा संतुलित बना सकता है।
यानी बदलाव हमेशा पूरी डाइट बदलने से नहीं आता। कई बार मौजूदा थाली में सही चीज जोड़ना ही ज्यादा व्यावहारिक समाधान होता है।
कीमत और सुविधा भी बड़ी बाधा
रिपोर्ट में सामने आया कि करीब 60 प्रतिशत लोगों को प्रोटीन वाले खाद्य उत्पाद महंगे लगते हैं, जबकि 57 प्रतिशत लोगों ने सुविधाजनक विकल्पों की कमी को समस्या बताया।
यह आंकड़ा पोषण को केवल व्यक्तिगत पसंद का मुद्दा मानने के बजाय व्यापक खाद्य व्यवस्था से जोड़ता है।
अगर किसी व्यक्ति के पास खाना बनाने का समय कम है, बजट सीमित है और आसपास आसानी से मिलने वाले भोजन में प्रोटीन कम है, तो सिर्फ उसे ‘स्वस्थ खाना खाइए’ कहना पर्याप्त समाधान नहीं होगा।
पोषण संबंधी सलाह तभी प्रभावी होगी जब वह सस्ती, स्थानीय और रोजमर्रा की जिंदगी में लागू करने योग्य हो।
बच्चों के मामले में खतरा और गंभीर
इस रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक पहलू बच्चों से जुड़ा पोषण है। इसमें पांच वर्ष से कम उम्र के करीब 35 प्रतिशत बच्चों में स्टंटिंग और लगभग 32 प्रतिशत में कम वजन की समस्या का उल्लेख किया गया है।
बच्चों के मामले में पोषण की कमी का असर सिर्फ वजन या लंबाई तक सीमित नहीं माना जा सकता। बचपन शरीर और मस्तिष्क के विकास का महत्वपूर्ण चरण है। लंबे समय तक पोषण की कमी रहने पर विकास, सीखने और भविष्य की स्वास्थ्य स्थिति पर असर पड़ सकता है।
इसीलिए बच्चों की थाली में सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं कि उन्होंने कितना खाना खाया। सवाल यह भी होना चाहिए कि उस खाने से उन्हें प्रोटीन, फाइबर और दूसरे जरूरी पोषक तत्व कितने मिले।
मिलेट्स से बढ़ सकती है थाली की पोषण क्षमता
ज्वार, बाजरा और रागी जैसे मिलेट्स यानी श्रीअन्न को भी इस संदर्भ में उपयोगी माना जा सकता है। इनमें फाइबर सहित कई पोषक तत्व पाए जाते हैं और ये भारतीय भोजन परंपरा का हिस्सा भी रहे हैं।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है—सिर्फ मिलेट्स को भोजन में शामिल कर लेने से प्रोटीन की पूरी जरूरत अपने आप पूरी नहीं हो जाती।
बेहतर तरीका यह है कि मिलेट्स को दाल, दूध, दही, अंडे या अन्य प्रोटीन स्रोतों के साथ भोजन का हिस्सा बनाया जाए। इस तरह भोजन में अलग-अलग पोषक तत्वों का संतुलन बेहतर किया जा सकता है।
‘प्रोटीन’ को सिर्फ जिम और फिटनेस से जोड़ना गलत
प्रोटीन की चर्चा अक्सर जिम जाने वाले लोगों, बॉडीबिल्डिंग या मसल्स बनाने से जोड़कर देखी जाती है। जबकि इसकी भूमिका इससे कहीं व्यापक है।
शरीर में ऊतकों के निर्माण और मरम्मत समेत कई जैविक प्रक्रियाओं में प्रोटीन की भूमिका होती है। इसलिए इसकी पर्याप्त मात्रा सिर्फ एथलीट या जिम जाने वाले व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण नहीं है।
बच्चे, युवा, बुजुर्ग और सामान्य रूप से सक्रिय व्यक्ति—हर आयु वर्ग के लिए संतुलित आहार जरूरी है। हालांकि वास्तविक प्रोटीन जरूरत उम्र, शरीर के वजन, गतिविधि, स्वास्थ्य और अन्य परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
भारतीय थाली को बदलने की नहीं, संतुलित करने की जरूरत
इस रिपोर्ट से निकलने वाला सबसे व्यावहारिक संदेश यह है कि स्वस्थ भोजन हमेशा महंगा या विदेशी नहीं होना चाहिए।
भारतीय रसोई में मौजूद दालें, चना, दूध, दही, सोया और अन्य खाद्य पदार्थ पहले से ही पोषण बढ़ाने के रास्ते उपलब्ध कराते हैं। जरूरत है इन्हें नियमित भोजन में सही तरीके से शामिल करने की।
विशेष रूप से बच्चों और किशोरों के भोजन में केवल पेट भरने वाले खाद्य पदार्थों के बजाय विविधता और पोषण संतुलन पर ध्यान देना जरूरी है।
आगे की चुनौती सिर्फ जागरूकता नहीं, पहुंच की भी है
प्रोटीन की कमी का समाधान केवल विज्ञापनों या सोशल मीडिया पर स्वास्थ्य संदेशों से नहीं होगा। जरूरत ऐसी रणनीति की है जिसमें पोषण शिक्षा के साथ किफायती खाद्य विकल्प, स्कूल स्तर पर बेहतर भोजन और स्थानीय खाद्य पदार्थों का इस्तेमाल भी शामिल हो।
मिलेट्स जैसे पारंपरिक अनाज इस दिशा में उपयोगी भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन उन्हें दाल, दूध और अन्य प्रोटीन स्रोतों के साथ संतुलित तरीके से जोड़ना होगा।
आखिरकार, पोषण का सवाल यह नहीं है कि थाली कितनी भरी हुई है, बल्कि यह है कि उसमें शरीर की जरूरत के मुताबिक क्या-क्या मौजूद है। 73 प्रतिशत का आंकड़ा इसी अंतर की ओर ध्यान खींचता है—और आने वाले वर्षों में भारत के लिए भूख के साथ-साथ ‘छिपी पोषण कमी’ से निपटना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।



